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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१२९ देवता—

देवों के द्वारा नमस्कार के योग्य तथा महिमाशाली हो. (१४)
सूक्त-१२९ देवता—
एता अश्वा आ प्लवन्ते.. (१)
यह घोड़ी अच्छी तरह उछलती है. (१)
प्रतीपं प्राति सुत्वनम्.. (२)
सुवा प्रतीप को संपन्न करता है. (२)
तासामेका हरिक्निका.. (३)
उन में एक हरिक्निका है. (३)
हरिक्निके किमिच्छसि.. (४)
हे हरिक्निका! तेरी क्या इच्छा है? (४)
साधुं पुत्रं हिरण्ययम्.. (५)
हे पुत्र! साधु को स्वर्ण दो. (५)
क्वाहतं परास्यः.. (६)
अवाहत अर्थात् घायल हुआ परास्य कहां है? (६)
यत्रामूस्तिस्रः शिंशपाः.. (७)
इस स्थान पर तीन शिंशिपा वृक्ष हैं. (७)
परि त्रयः.. (८)
सभी ओर तीन हैं. (८)
पृदाकवः.. (९)
बहुत से पृदाकू हैं. (९)
शृङ्गं धमन्त आसते.. (१०)
वे सींगों को नष्ट कर के बैठे हैं. (१०)
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अयन्महा ते अर्वाहः.. (११)
यह दिवस तुम्हारा महान अश्व है. (११)
स इच्छकं सघाघते.. (१२)
वह कामना करने वालों का समाधान कर्ता है. (१२)
सघाघते गोमीद्या गोगतीरिति.. (१३)
गोमीठ गायों की गति को एकत्र करता है. (१३)
पुमां कुस्ते निमिच्छसि.. (१४)
पुरुष और पृथ्वी तुझे प्रसन्न करते हैं. (१४)
पल्प बद्ध वयो इति.. (१५)
हे वृद्ध पल्प! यह तेरा अन्न है. (१५)
बद्ध वो अघा इति.. (१६)
बंधा होना पाप है. (१६)
अजागार केविका.. (१७)
सेविकाएं जागी नहीं हैं. (१७)
अश्वस्य वारो गोशपद्यके.. (१८)
अश्व के सवार हो कर गाय के खुर के गड्ढे में पड़े हैं. (१८)
श्येनीपती सा.. (१९)
यह श्येनीपति अर्थात् मादा बाज का स्वामी है. (१९)
अनामयोपजिह्विका.. (२०)
उप जिह्विका रोग रहित है. (२०)
सूक्त-१३०
को अर्य बहुलिमा इषूनि.. (१)
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बहुत से बाणों पर अधिकार करने वाला कौन है? (१)
को असिद्याः पयः.. (२)
रजोगुणी प्रकृति का पोषक कौन है? (२)
को अर्जुन्याः पयः.. (३)
अर्जुनी अर्थात् प्रकृति का पय अर्थात् दूध कौन सा है? (३)
कः काष्ण्याः पयः.. (४)
तमोगुणी प्रकृति का दूध क्या है. (४)
एतं पृच्छ कुहं पृच्छ.. (५)
यदि जानते नहीं हो तो पूछो. (५)
कुहाकं पक्वंकं पृच्छ.. (६)
कुशल एवं परिपक्व मनुष्य से पूछो. (६)
यवानो यतिस्वभिः कुभिः.. (७)
यत्नकर्ता समान पृथ्वियों से युक्त हुआ. (७)
अकुप्यन्तः कुपायकुः.. (८)
पृथ्वी का मर्म न जानने वाला क्रोधित हो गया. (८)
आमणको मणत्सकः.. (९)
आमणक मणत्सक है. (९)
देव त्वप्रतिसूर्य.. (१०)
हे सूर्य देव. (१०)
एनश्विपङ्क्तिका हविः.. (११)
यह पापनाशक हवि है. (११)
प्रदुद्दुदो मघाप्रति.. (१२)
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यह ऐश्वर्य के प्रति गति दे. (१२)
शृङ्ग उत्पन्न.. (१३)
सींग उत्पन्न हुआ. (१३)
मा त्वाभि सखा नो विदन्.. (१४)
मेरा मित्र मुझे और तुझे मिले. (१४)
वशायाः पुत्रमा यन्ति.. (१५)
वशा गौ के पुत्र को लाते हैं. (१५)
इरावेदुमयं दत्त.. (१६)
ज्ञानपूर्ण इरा उसे दो. (१६)
अथो इयन्नियन्निति.. (१७)
इस के पश्चात यह इस प्रकार का है. (१७)
अथो इयन्निति.. (१८)
फिर यह इस प्रकार है. (१८)
अथो श्वा अस्थिरो भवन्.. (१९)
इस के बाद श्वा अर्थात् कुत्ता अस्थिर हुआ. (१९)
उयं यकांशलोकका.. (२०)
कष्टकारी लोक वाला हो. (२०)
सूक्त-१३१
आमिनोनिति भद्यते.. (१)
यह परम तत्त्व कहा जाता है. (१)
तस्य अनु निभञ्जनम्.. (२)
उस के बाद विभाजन है. (२)
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वरुणो याति वस्वभिः.. (३)
वरुण रात्रि के साथ जाते हैं. (३)
शतं वा भारती शवः.. (४)
वाणी के सौ बल हैं. (४)
शतमाश्वा हिरण्ययाः.
शतं रथ्या हिरण्ययाः. शतं कुथा हिरण्ययाः. शतं निष्का हिरण्ययाः.. (५)
सुनहरे रंग के सौ घोड़े, सोने के बने सौ रथ, सोने के बने सौ गछे और सोने के सौ निष्क
अर्थात् सिक्के या आभूषण हैं. (५)
अहल कुश वर्त्तक.. (६)
उत्तम कुश वर्तमान है. (६)
शफेन इव ओहते.. (७)
वह शफ अर्थात् खुर से वहन करता है. (७)
आय वनेनती जनी.. (८)
आप झुकने वाली माता की तरह आएं. (८)
वनिष्ठा नाव गृह्यन्ति.. (९)
जल में स्थित नाव ग्रहण की जाती है. (९)
इदं मह्यं मद्दूरिति.. (१०)
यह मुझे प्रसन्न करता है. (१०)
ते वृक्षाः सह तिष्ठति.. (११)
वे वृक्षों के साथ बैठते हैं. (११)
पाक बलिः.. (१२)
बलि पक गई है. (१२)
शक बलिः.. (१३)
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बलि सशक्त है. (१३)
अश्वत्थ खदिरो धवः.. (१४)
पीपल, खैर, धव नाम के वृक्ष हैं. (१४)
अरदुपरम.. (१५)
विराम प्राप्त करो. (१५)
शयो हत इव.. (१६)
सोने वाला मृतक के समान होता है. (१६)
व्याप पूरुषः.. (१७)
पुरुष सर्वत्र व्याप्त है. (१७)
अदूहमित्यां पूषकम्.. (१८)
मैं पूषा का दोहन करता हूं. (१८)
अत्यर्धर्चं परस्वतः.. (१९)
अर्धर्च अर्थात् आधी ऋचा प्रवृत्त हो. (१९)
द्वौ हस्तिनो दृती.. (२०)
हाथियों के लिए दो मशकें बनाओ. (२०)
सूक्त-१३२ देवता—
आदलाबुकमेककम्.. (१)
एक अलाबुक अर्थात् रामतोरई है. (१)
अलाबुकं निखातकम्.. (२)
रामतोरई खोदी गई है. (२)
कर्करिको निखातकः.. (३)
ककड़ी को खोदा गया. (३)
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तद् वात उन्मथायति.. (४)
वह वायु को उखाड़ता है. (४)
कुलायं कृणवादिति.. (५)
घौंसला बनाता है. (५)
उग्रं वनिषदाततम्.. (६)
विस्तृत उग्र की सेवा करता है. (६)
न वनिषदनाततम्.. (७)
जिस का विस्तार नहीं है, उस की सेवा नहीं करता. (७)
क एषां कर्करी लिखत्.. (८)
इन में से कौन कर्करी को लिखता है. (८)
क एषां दुन्दुभिं हनत्.. (९)
इन में दुदुंभि राक्षस को किस ने मारा. (९)
यदीयं हनत् कथं हनत्.. (१०)
यदि यह वध करती है तो किस प्रकार करती है. (१०)
देवी हनत् कुहनत्.. (११)
देवी ने वध किया, बुरी तरह वध किया. (११)
पर्यागारं पुनः पुनः.. (१२)
निवास स्थान के चारों ओर बारबार शब्द करती है. (१२)
त्रीण्युष्ट्रस्य नामानि.. (१३)
ऊंट के तीन नाम हैं. (१३)
हिरण्यं इत्येके अब्रवीत्.. (१४)
कुछ लोगों ने हिरण्य, ऐसा कहा. (१४)
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