अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि
सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं. (४)
सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि
सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः.
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (१)
नदियां हमारे अनुकूल बहें, पवन हमारे अनुकूल चले एवं पक्षी हमारी इच्छा के अनुसार
(गति करें). पुरातन देव मेरे इस यज्ञ को स्वीकार करें, क्योंकि मैं घी, दूध आदि का संग्रह कर
के यह यज्ञ कर रहा हूं. (१)
इहैव हवमा यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः.
इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन् तिष्ठतु या रयिः.. (२)
हे देवो! आप सब को त्याग कर मेरे इस यज्ञ में पधारें. इस में आज्य आदि का होम है.
हे स्तुतियों द्वारा बढ़ाए जाते हुए देवो! आप इस यजमान की वृद्धि करें. हे देवो! हमारी
स्तुतियों को सुन कर प्रसन्न हुए आप की कृपा से हमारे घर में गाय, अश्व आदि पशु एवं अन्य
संपत्ति निवास करे. (२)
ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदमक्षिताः.
तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (३)
गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में
कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो. (३)
ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च.
तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (४)
घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों
के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे. (४)
सूक्त-१६ देवता—अग्नि, वरुण आदि
ये ऽ मावास्यां ३ रात्रिमुदुस्थुर्वाजमत्त्रिणः.
अग्निस्तुरीयो यातुहा सो अस्मभ्यमधि ब्रवत्.. (१)
मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते
हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें. (१)
सीसायाध्याह वरुणः सीसायाग्निरुपावति.
सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत् तदङ्ग यातुचातनम्.. (२)
वरुण देव ने फेन के विषय में कहा है. सीसे जस्ते के विषय में अग्नि ने भी यही कहा है.
परम ऐश्वर्ययुक्त इंद्र ने मुझे सीसा प्रदान किया है. इंद्र ने कहा है कि हे प्रिय! यह सीसा राक्षसों
का संहार करने वाला है. (२)
इदं विष्कन्धं सहत इदं बाधते अत्रिणः.
अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्याः.. (३)
यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है.
यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. मैं इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों
को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं. (३)
यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्.
तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो ऽ सो अवीरहा.. (४)
हे शत्रु! यदि तू हमारी गायों, घोड़ों एवं सहायता करने वाले सेवकों की हत्या करता है
तो मैं सीसे से तुझे मारूंगा. तू मेरे वीरों की हत्या नहीं कर सकेगा. (४)
सूक्त-१७ देवता—स्त्रियां एवं धर्मपत्नियां
अमूर्या यन्ति योषितो हिरा लोहितवाससः.
अभ्रातर इव जामयस्तिष्ठन्तु हतवर्चसः.. (१)
स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं,
वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें
ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं. (१)
तिष्ठावरे तिष्ठ पर उत त्वं तिष्ठ मध्यमे.
कनिष्ठिका च तिष्ठति तिष्ठादिद्धमनिर्मही.. (२)
हे शरीर के निचले भाग में वर्तमान नाड़ी! हे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित नाड़ी! हे
शरीर के मध्य भाग में वर्तमान नाड़ी! तू भी स्थिर हो जा. रुधिर का प्रवाह बंद करने के लिए
छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं. (२)
शतस्य धमनीनां सहस्रस्य हिराणाम्.
अस्थूरिन्मध्यमा इमाः साकमन्ता अरंसत.. (३)
हृदय संबंधी सैकड़ों धमनियां, हजारों शिराएं एवं उन की मध्यवर्ती रक्तवाहिनी
नाड़ियां इस मंत्र के प्रभाव से खून बहाना बंद कर दें. शेष नाड़ियां पूर्ववत रक्त प्रवाह
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चालू रखें. (३)
परि वः सिकतावती धनूर्बृहत्यक्रमीत्.
तिष्ठतेलयता सु कम्.. (४)
हे पथरी रोग उत्पन्न करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के
सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनो तथा इस जन का
सुख बढ़ाओ. (४)
सूक्त-१८ देवता—सावित्री आदि
निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं १ निररातिं सुवामसि.
अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि.. (१)
हम ललाट के असौभाग्य सूचक चिह्न को शत्रु के समान अपने शरीर से दूर करते हैं. जो
सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों. हम ने अपने शरीर से बुरे चिह्न दूर
किए हैं, वे हमारे शत्रुओं को प्राप्त हों. (१)
निररणिं सविता साविषक् पदोर्निहस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा.
निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभाग्याय.. (२)
सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे हाथों और
पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, ‘भय मत करो’, कहती
हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति
देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है. (२)
यत्त आत्मनि तन्वां घोरम् अस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा.
सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु.. (३)
हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से
उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें. (३)
रिश्यपदीं वृषदतीं गोषेधां विधमामृत.
विलीढ्यं ललाम्यं १ ता अस्मन्नाशयामसि.. (४)
हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के
समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों
को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने
मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं. (४)
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सूक्त-१९ देवता—इंद्र आदि
मा नो विदन् विव्याधिनो मो अभिव्याधिनो विदन्.
आराच्छरव्या अस्मद्विषूचीरिन्द्र पातय.. (१)
अस्त्रशस्त्र आदि से ताड़ित करने वाले जो शत्रु हैं, वे हमें प्राप्त न कर सकें. सामने आ
कर हिंसा करने वाले हमें न पा सकें. हे परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र देव! शत्रुओं द्वारा बारबार छोड़े
गए अनेक प्रकार के मुखों वाले जो बाण हैं, उन्हें हम से दूर स्थान में गिराओ. (१)
विष्वञ्चो अस्मच्छरवः पतन्तु ये अस्ता ये चास्याः.
दैवीर्मनुष्येषवो ममामित्रान् वि विध्यत्.. (२)
जो बाण शत्रुओं द्वारा धनुष से छोड़े जा रहे हैं अथवा जो बाण छोड़ने के लिए तरकस
में सुरक्षित हैं, वे हम से दूर रहें. जो दैवी एवं मानवीय अस्त्रशस्त्र हैं, वे जा कर हमारे शत्रुओं
को वेध डालें. (२)
यो नः स्वो यो अरणः सजात उत निष्ट्यो यो अस्माँ अभिदासति.
रुद्रः शरव्य यैतान् ममामित्रान् वि विध्यतु.. (३)
हमारी जाति का अधिक बली, शत्रु समान शक्ति वाला अथवा निकृष्ट बलशाली जो
मनुष्य हमें दास बनाना चाहता है, हमारे उन अमित्रों को, सब को रुलाने वाले संहार कर्ता देव
रुद्र अपने बाणों से बींध डालें. (३)
यः सपत्नो यो ऽ सपत्नो यश्च द्विषञ्छपाति नः.
देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्.. (४)
जो हमारी जाति का अथवा भिन्न जाति का पुरुष हम से द्वेष रखने के कारण हमें शाप
देता है, इंद्र आदि सभी देव उस का विनाश करें. मेरे द्वारा प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से
मेरी रक्षा करें. (४)
सूक्त-२० देवता—सोम, मरुत् आदि
अदारसृद् भवतु देव सोमास्मिन् यज्ञे मरुतो मृडता नः.
मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मो नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (१)
हे सोम देव! हमारा शत्रु अपने स्थान से भागा हुआ होने के कारण कभी भी अपनी स्त्री
के पास न पहुंच सके. हे मरुत् देव! इस यज्ञ में आप हमारी रक्षा करें. सामने से आता हुआ
तेजस्वी शत्रु मुझे प्राप्त न कर सके. कीर्ति और उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी
हमें न पा सकें. (१)
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यो अद्य सेन्यो वधो ऽ घायुनामुदीरते.
युवं तं मित्रावरुणावस्मद् यावतं परि.. (२)
आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुध हमारी ओर
आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से
इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके. (२)
इतश्च यदमुतश्च यद् वधं वरुण यावय.
वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्.. (३)
हे वरुण! हमारे समीपवर्ती शत्रु द्वारा चलाया हुआ जो आयुध हम तक आता है अथवा
दूरवर्ती शत्रु का जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो. हमें महान सुख
प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग आदि के कारण असफल न होने वाले शस्त्रास्त्रों से हमें दूर रखो.
(३)
शास इत्था महाँ अस्यमित्रसाहो अस्तृत:.
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदा चन.. (४)
हे इंद्र! आप शासक और नियंता होने के कारण महान गुणों से युक्त हैं. आप शत्रुओं को
पराजित करने वाले हैं. आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता.
शत्रु कभी भी उस का अपमान नहीं कर पाते. (४)
सूक्त-२१ देवता—इंद्र
स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी.
वृषेन्द्रः पुर एतु नः सोमपा अभयङ्करः.. (१)
विनाश रहित, क्षोभ न देने वाले, सभी प्रजाओं के पालनकर्ता, वृत्र नामक राक्षस अथवा
जल के आधार मेघ को नष्ट करने वाले, शत्रुओं की विशेष रूप से हिंसा करने वाले, सभी
प्राणियों को वश में रखने वाले, मनोकामनाओं की वर्षा करने वाले एवं सोमरस को पीने वाले
इंद्र देव हमारे लिए अभय करने वाले बन कर संग्राम में हमारे नेता बनें. (१)
वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति.. (२)
हे परम ऐश्वर्य युक्त इंद्र देव! हमारी विजय के लिए हम से संग्राम करने वाले शत्रुओं का
विनाश करो. जो युद्ध का प्रयत्न करने वाले शत्रु हैं, उन को पराजित करो. हमारे खेत, धन
आदि छीन कर हमें हानि पहुंचाने वाले शत्रु को अवनति रूपी अंधकार में पहुंचाओ. (२)
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज.
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वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (३)
हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय
प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो. (३)
अपेन्द्र द्विषतो मनो ऽ प जिज्यासतो वधम्.
वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्.. (४)
हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए.
जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख
प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो. (४)
सूक्त-२२ देवता—सूर्य और हृदय रोग
अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते.
गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि.. (१)
हे रोग ग्रसित पुरुष! तेरे हृदय को संताप पहुंचाने वाला हृदय रोग एवं कामला आदि
रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए. हे रोगी! गाय के लाल वर्ण से
पहचाने जाने वाले के रूप में मैं तुझे स्वस्थ कराता हूं. (१)
परि त्वा रोहितैर्वर्णैर्दीर्घायुत्वाय दध्मसि.
यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्.. (२)
हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं.
यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट
जाए. (२)
या रोहिणीर्देवत्या ३ गावो या उत रोहिणीः.
रूपंरूपं वयोवयस्ताभिष्ट्वा परि दध्मसि.. (३)
देवों की जो लाल रंग की कामधेनु आदि गाएं एवं मनुष्यों की जो लाल रंग की गाएं हैं,
इन दोनों प्रकार के लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हे रोगी पुरुष! हम तुझे ढकते हैं.
(३)
शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि.
अथो हारिद्रवेषु ते हरिमाणं नि दध्मसि.. (४)
हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा
रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हल्दी के समान पीले रंग को गोपीतनक
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