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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-५७ देवता—इंद्र

हे धन देने वाले इंद्र! तुम्हारे जो मार्ग द्युलोक से नीचे वर्तमान हैं, उन विश्व प्रेरक मार्गों के
द्वारा हमें सुख में स्थापित करो. अर्थात् हमें सुख प्रदान करो. (१)
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोज़ो यजुर्बलम्.
एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते.. (१)
हम ऋग्वेद और सामवेद को हवि के द्वारा पूजते हैं. यजमान ऋग्वेद और सामवेद के
द्वारा यज्ञ कर्म करते हैं. ये दोनों वेद सदस नामक मंडप में शोभा देते हैं तथा यज्ञ को देवों तक
पहुंचाते हैं. (१)
ये ते पन्थानो ऽ व दिवो येभिर्विश्वम्मैरयः. तेभिः सुम्नया धेहि नो वसो.. (२)
मैं ने ऋग्वेद से हवि, सामवेद से ओज और यजुर्वेद से बल के विषय में पूछा था. अर्थात्
ऋग्वेद आदि में हवि आदि का अध्ययन किया था. हे शची के पति और व्याकरण के नियम
बनाने वाले इंद्र! इस प्रकार सुविचारित ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मुझ अध्यापक के
अध्ययनअध्यापन में बाधा न डाल कर मनचाहा फल दें. (२)
सूक्त-५८ देवता—बिच्छू
तिरश्चिराजेरसितात् पृदाकोः परि संभृतम्.
तत् कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्.. (१)
तिरश्चिराजी अर्थात् तिरछी रेखाओं वाले काले और पृदाकू अर्थात् अपने द्वारा काटे हुए
प्राणियों को रुलाने वाले सर्पों के विष को तथा कंकपर्व नामक काटने वाले विषैले जंतु के
विष को यह मधु नाम की जड़ीबूटी नष्ट करे. (१)
इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चुन्मधुला मधूः.
सा विह्रुतस्य भेषज्यथो मशकजम्भनी.. (२)
यह प्रयोग की जाती हुई ओषधि मधु अर्थात् शहद से निर्मित है, इसलिए इस से शहद
टपकता है. मधु युक्त तथा मधूक नाम वाली यह जड़ीबूटी कुटिलता करने वाले विष का नाश
करने वाली तथा मच्छरों को समाप्त करने वाली है. (२)
यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि.
अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्.. (३)
विषैले जंतु द्वारा काटे गए पुरुष से कहा जा रहा है—हे सर्प द्वारा काटे गए पुरुष!
तुम्हारे जिस अंग में विषैले सर्प ने काटा है अथवा तुम्हारे जिस अंग को सर्प आदि ने पिया है,
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उस अंग से मैं सर्प का विष निकालता हूं तथा मुख, पूंछ और चरण-इन तीन अंगों से काटने
वाले मच्छर के विष को भी मैं प्रभावहीन बनाता हूं. (३)
अयं यो वक्रो विपरुर्व्यङ्गो मुखानि वक्रा वृजिना कृणोषि.
तानि त्वं ब्रह्मणस्पत इषीकामिव सं नमः.. (४)
हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस
के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि
अंग टेढ़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी
सींक को सरल बनाया जाता है. (४)
अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः. विषं ह्य१ स्यादिष्यथो
एनमजीजभम्.. (५)
विष रहित, नीचे की ओर मुंह किए हुए एवं तेरे समीप आते हुए शर्कोटक नाम के सांप
के मैं ने टुकड़े कर दिए हैं अर्थात् मैं ने इस का विष समाप्त कर दिया है तथा इस सर्प को मैं
ने नष्ट कर दिया है. (५)
न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः.
अथ किं पापया ऽ मुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम्.. (६)
बिच्छू को संबोधन कर के कहा जा रहा है - हे बिच्छू! तेरे हाथों में दूसरों को पीड़ा
पहुंचाने वाला बल नहीं है. तेरे सिर में भी बल नहीं है. तेरे मध्य भाग अर्थात् कमर में भी बल
नहीं है. तू अपनी, परपीड़ाकारिणी बुद्धि के द्वारा थोड़ा विष अपनी पूंछ में क्यों धारण करता
है? (६)
अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः.
सर्वे भल ब्रवाथ शर्कोटमरसं विषम्.. (७)
हे सर्प! तुझे चीटियां खा लेती हैं और मोरनियां तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं. हे सर्प का
विष दूर करने में समर्थ जड़ीबूटियो! तुम शर्कोटक सर्प के विष को सामर्थ्यहीन कर देती हो,
यह बात भलीभांति कही जाती है. (७)
य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्ये न च.
आस्ये ३ न ते विषं किमु ते पुच्छधावसत्.. (८)
हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग
और मुख में विष नहीं है. तेरे रोओं वाले भाग अर्थात् पूंछ में विष क्यों हो. (८)
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सूक्त-५९ देवता—सरस्वती
यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद् याचमानस्य चरतो जनाँ अनु.
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद् घृतेन.. (१)
मांगने के लिए दाताओं से स्पष्ट बात कहने वाला मेरा जो अंग क्षुब्ध था तथा मांगने के
लिए जनजन के समीप मेरा जो अंग व्याकुल था, मेरे शरीर का वह बाधित अंग सरस्वती
क्षोभ रहित करें तथा उसे घृत से पूर्ण करें. (१)
सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृत्न्र्तानि.
उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः.. (२)
मरुतों से युक्त एवं जलों के पुत्र वरुण के लिए सात नदियां बहती हैं. द्युलोक में स्थित
इंद्र के निमित्त मनुष्य यज्ञ आदि कर्म करते हैं. वे यज्ञकर्म देवों और मानवों के संघ के निवास
स्थान होते हैं एवं आकाश और धरती इन देवों और मनुष्यों के ऐश्वर्य बनते हैं. आकाश और
धरती इन देवों तथा मनुष्यों के लिए प्रयत्न करते हैं तथा अन्न, जल आदि से पोषण करते हैं.
(२)
सूक्त-६० देवता—इंद्र, वरुण
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ.
युवो रथो अध्वरो देववीतये प्रति स्वसरमुप यातु पीतये.. (१)
हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद
करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने
वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के
समीप ले जाए. (१)
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्.
इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्.. (२)
हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल
देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है,
इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२)
सूक्त-६१ देवता—शत्रु नाशन
यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्.
वृक्ष इव विद्युता हत आ मूलादनु शुष्यतु.. (१)