अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे इंद्र और सोम! तुम दोनों अग्नि के द्वारा तपाए हुए, फौलाद के बने हुए, संतापकारी
एवं पुराने न होने वाले अपने आयुधों को अंतरिक्ष में घुमाओ तथा उन के द्वारा मानवभक्षी
राक्षसों को समीपवर्ती प्रदेश में भेज दो, जहां जा कर वे मर जाएं. (५)
इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मतिः कक्ष्याश्वेव वाजिना.
यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपती इव जिन्वतम्.. (६)
हे इंद्र तथा सोम! तुम दोनों हमारे द्वारा की गई स्तुति को उसी प्रकार सब ओर से
स्वीकार करो, जिस प्रकार रस्सी शक्तिशाली घोड़ों को बांध लेती है. हम आह्वान के योग्य
बुद्धि से तुम दोनों को प्रेरित करते हैं. हमारे मंत्र तुम्हें उसी प्रकार प्रसन्न करें, जिस प्रकार
राजा चारणों के वचन सुन कर प्रसन्न होते हैं. (६)
प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः.
इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद् यो मा कदा चिदभिदासति द्रुहः.. (७)
हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शक्तिशाली एवं गमन के साधन अश्वों के द्वारा हमारा स्मरण
करते हुए आओ तथा आ कर हम से द्रोह करने वाले और विनाशकारी राक्षसों की हिंसा करो.
हे इंद्र एवं सोम! बुरे कर्म करने वाले राक्षस को सुख न मिले. जो दुष्ट एक बार भी मुझे बाधा
पहुंचाए, उसे तुम दुःख दो. (७)
यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः.
आप इव काशिना संगृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता.. (८)
हे इंद्र! जो राक्षस सच्चे मन से कार्य करने वाले मुझ ब्राह्मण को शाप देता है और मुझ
से असत्य वचन बोलता है, उस की बात अंजलि से निकल जाने वाले जल के समान सारहीन
है. असत्य बोलने वाला वह स्वयं ही शून्य हो जाए अर्थात् नष्ट हो जाए. (८)
ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्यै वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभिः.
अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निर्ऋतेरुपस्थे.. (९)
जो राक्षस मुझ सत्यवादी की इच्छानुसार निंदा करते हैं और जो राक्षस मुझ
कल्याणकारी के यज्ञ कर्म को अन्नों के द्वारा दूषित करते हैं—इन दोनों प्रकार के राक्षसों को
सोमदेव सर्प के लिए दे दें अथवा पाप देवता निर्ऋति की गोद में बैठा दें. (९)
यो नो रसं दिप्सति पित्वो अग्ने अश्वानां गवां यस्तनूनाम्.
रिपु स्तेन स्तेयकृद् दभ्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा ३ तना च.. (१०)
हे अग्नि देव! जो राक्षस हमारे शरीर के सार को नष्ट करना चाहता है तथा जो हमारे
घोड़ों, गायों और पुत्र, पौत्र आदि के शरीर के रस को दूषित करना चाहता है, इस प्रकार का
शत्रु तस्कर और लुटेरा है. वह नष्ट हो जाए. वह अपने शरीर से और अपनी संतान से नष्ट हो
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जाए. (१०)
परः सो अस्तु तन्वा ३ तना च तिस्रः पृथिवीरधो अस्तु विश्वाः.
प्रति शुष्यतु यशो अस्य देवा यो मा दिवा दिप्सति यश्च नक्तम्.. (११)
हे देवो! वह राक्षस अपने शरीर से और अपने पुत्रों से अलग हो जाए. वह तीनों प्रकार
की पृथ्वी के नीचे पहुंचे अर्थात् नरक को प्राप्त हो. उस पापी का अन्न एवं यश नष्ट हो जाए.
जो द्वेषकर्ता दिन अथवा रात में मुझे मारना चाहता है, उस का विनाश करो. (११)
सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच वचसी पस्पृधाते.
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमो ऽ वति हन्त्यासत्.. (१२)
विद्वान् को सत्य और असत्य वचन जानना सरल होता है. सत्य और असत्य वचन
परस्पर विरुद्ध होते हैं. इन सत्य और असत्य वचनों में जो यथार्थ है और जो सरल है,
सोमदेव उस की रक्षा करते हैं तथा असत्य वचन का विनाश करते हैं. (१२)
न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्.
हन्ति रक्षो हन्त्यासद् वदन्मुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते.. (१३)
सोमदेव पापी राक्षस को जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. असत्य को धारण करने
वाले पापी राक्षस को भी सोमदेव जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. सोमदेव राक्षस का
विनाश करते हैं और असत्यवादी का भी विनाश करते हैं. ये दोनों इंद्र के पाश में बंध जाते हैं.
(१३)
यदि वा हमनृतदेवो अस्मि मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने.
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोधवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्.. (१४)
हे अग्नि देव! न तो मैं देवों की निंदा करने वाला हूं तथा न मैं स्तुति योग्य देवों के प्रति
व्यर्थ धारण करता हूं. हे जातवेद अग्नि देव! फिर मुझ पर तुम क्रोध क्यों करते हो? मुझ से
अतिरिक्त जो देव विरोधी राक्षस हैं, वे नाश को प्राप्त हों. (१४)
अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य.
अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५)
हे मिथ्या आरोप लगाने वाले पुरुष! मैं यदि दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला हूं अथवा मैं
ने किसी पुरुष के जीवन की हिंसा की है तो मैं इसी दिन मर जाऊं. तुम ने मुझे व्यर्थ ही
राक्षस कहा है. ऐसे तुम अपने दसों वीर पुत्रों से बिछुड़ जाओ. (१५)
यो मायातूं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह.
इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६)
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जिस मिथ्या आरोप लगाने वाले ने मुझ अराक्षस को राक्षस कहा है, अथवा जिस ने
राक्षस होते हुए भी अपनेआप को शुद्ध बताया है—इन दोनों असत्यवादियों को इंद्र देव अपने
वध साधन वज्र के द्वारा मारें. ये दोनों प्रकार के जन संसार के सभी प्राणियों से अधम हो कर
नष्ट हों. (१६)
प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहुस्तन्वं १ गूहमाना.
वव्रम्रनन्तमव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७)
जो राक्षसी उलूकी के समान हमें मारने को आती है तथा जो द्रोह करने वाली राक्षसी
अपने शरीर को छिपाती हुई आती है, वह दुष्ट राक्षसी अंतहीन गड्ढे में नीचे मुंह किए हुए
गिरे. सोमलता को पीसने वाले पत्थर अपनी ध्वनियों से राक्षसों का विनाश करें. (१७)
वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वी ३ च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन.
वयो ये भूत्वा पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८)
हे मरुतो! तुम सब प्रजाओं के मध्य अनेक प्रकार से स्थित रहो तथा राक्षसों का विनाश
करने की इच्छा करो. तुम पकड़े हुए राक्षसों को भलीभांति चूर्ण कर दो. जो राक्षस पक्षी बन
कर रात में घूमते हैं अथवा जो देव संबंधी यज्ञों में हिंसा करते हों, उन राक्षसों का विनाश
करो. (१८)
प्र वर्तय दिवो ऽ श्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्तसं शिशाधि.
प्राक्तो अपाक्तो अधरादुदक्तो ३ भि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९)
हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र नीचे गिराओ. उस वज्र को तुम ऐसा तेज करो, जैसा
सोमदेव ने किया था. तुम उस तेज किए हुए वज्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण सभी
दिशाओं में राक्षसों का विनाश करो. (१९)
एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवो ऽ दाभ्यम्.
शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०)
इस प्रकार के जो राक्षस कुत्तों के समान खाते हुए घूमते हैं और आ कर हिंसा की इच्छा
करते हुए अपराजित इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं, इंद्र उन राक्षसों का वध करने के लिए
अपना वज्र तेज करते हैं. वे इंद्र हिंसक राक्षसों के निमित्त निश्चय ही अपना वज्र तैयार करें.
(२०)
इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्या ३ विवासताम्.
अभीदु शक्रः परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन्तसत एतु रक्षसः.. (२१)
इंद्र देवों के निमित्त दिए गए हवि को चुराने वाले तथा विरोधी गतिविधि करने वाले
राक्षसों का विनाश करें. इंद्र राक्षसों को मारने के लिए इस प्रकार आक्रमण करें, जिस प्रकार
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कुल्हाड़ी वृक्षों को काटने के लिए उठती है. प्राप्त होने वाले राक्षसों को इंद्र देव मिट्टी के
बर्तनों के समान काटते हुए आएं. (२१)
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्.
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र.. (२२)
हे इंद्र! जो राक्षस परिवारों के साथ आते हैं, जो अकेले आते हैं, जो कुत्तों, चकवों,
गरुड़ एवं गिद्ध के समान आक्रमण करते हैं, उन का विनाश करो. जिस प्रकार पत्थर से
मिट्टी का पात्र तोड़ा जाता है, उसी प्रकार अनेक आकारों में वर्तमान राक्षसों को मारो. (२२)
मा नो रक्षो अभि नड् यातुमावदपोच्छन्तु मिथुना ये किमीदिनः.
पृथिवी नः पार्थिवात् पात्वंहसो ऽ न्तरिक्षं दिव्यात् पात्वस्मान्.. (२३)
हमें हिंसक राक्षस जाति प्राप्त न करे. अब किसे खाएं, अब किसे खाएं— ऐसा कहते
हुए जो राक्षस जोड़े अर्थात् स्त्रीपुरुष घूमते हैं, वे दूर चले जाएं. पृथ्वी माता हमें राक्षस,
पिशाच आदि द्वारा किए गए पाप से बचाएं. (२३)
इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम्.
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन्त्सूर्यमुच्चरन्तम्.. (२४)
हे इंद्र! तुम पुरुष रूपधारी राक्षस का वध करो तथा दूसरों को माया के द्वारा हिंसित
करने वाली स्त्री रूप धारिणी राक्षसी का वध करो. मृत्यु जिन के लिए खेल है, ऐसे राक्षसों
की गरदनें कट जाएं और वे मर जाएं. वे उदय होते हुए सूर्य को न देखें. (२४)
प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम्.
रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्भ्यः.. (२५)
हे इंद्र एवं सोम! तुम प्रत्येक राक्षस को अपने प्रतिकूल देखो तथा विविध राक्षसों को
अपने विपरीत समझो. तुम दोनों हमारी रक्षा के लिए जाग्रत रहो और हिंसक राक्षसों के वध
के लिए अपना आयुध वज्र चलाओ. (२५)
सूक्त-५ देवता—मंत्र में बताए गए
अयं प्रतिसरो मणिवीरो वीराय बध्यते.
वीर्यवान्त्सपत्नहा शूरवीरः परिपाणः सुमङ्गलः.. (१)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि कृत्या राक्षसी को उसी के पास लौटा देती है, जो उसे
किसी पर जादू टोने के रूप में भेजता है. यह वीरकर्म करने वाले शत्रुओं को भगाने में समर्थ
है. यह मणि अतिशय शक्तिशालीनी, शत्रु घातक एवं यजमान की रक्षा करने वाले पुरोहित
का मंगल करने वाली है. (१)
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अयं मणिः सपत्नहा सुवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः.
प्रत्यक् कृत्या दूषयन्नेति वीरः.. (२)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि शत्रु घातक, संतान देने वाली, शक्तिशालिनी, वेगवती,
शत्रुओं को पराजित करने वाली, उग्र तथा दूसरे के द्वारा भेजी गई कृत्या राक्षसी को उसी के
विरोध में भेजने वाली है. शत्रुओं को अनेक प्रकार से दूषित करने वाली यह मणि हमारे
सामने आती है. (२)
अनेनेन्द्रो मणिना वृत्रमहन्नेनासुरान् पराभावयन्मनीषी.
अनेनाजायद् द्यावापृथिवी उभे इमे अनेनाजयत् प्रदिशश्चतस्रः.. (३)
किसी भी उपाय से वृत्रासुर को मारने में असफल होने पर इंद्र ने इसी मणि को बांधने
के प्रभाव से विजय के उपाय जाने एवं राक्षसों को पराजित एवं नष्ट किया था. इंद्र ने इसी
मणि के प्रभाव से धरती और आकाश पर विजय प्राप्त की है. इसी मणि के प्रभाव से इंद्र ने
पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण-चारों दिशाओं को जीता है. (३)
अयं स्रक्त्यो मणिः प्रतीवर्तः प्रतिसरः.
ओजस्वान् विमृधो वशी सो अस्मान् पातु सर्वतः.. (४)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि, विरोधियों को लौटाने वाली तथा रोग आदि का विनाश
करने वाली है. शत्रु विनाशक तेज से युक्त, शत्रुओं को भगा कर युद्ध का अभाव करने वाली
एवं सब को वश में करने वाली यह मणि सभी से हमारी रक्षा करे. (४)
तदग्निराह तदु सोम आह बृहस्पतिः सविता तदिन्द्रः.
ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (५)
उस अग्नि देव ने कृत्या राक्षसी को वापस लौटाने वाली मणि के विषय में मुझे बताया
है. सोम, बृहस्पति, सविता एवं इंद्र ने भी मणि के विषय में यही कहा है. अन्य प्रसिद्ध देवों
एवं पुरोहितों ने भी इस मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस लौटाया है. (५)
अन्तर्दधे द्यावापृथिवी उताहरुत सूर्यम्.
ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (६)
मैं धरती और आकाश को तथा दिवस और सूर्य को अपने तथा कृत्या राक्षसी के मध्य
में स्थापित करता हूं. धरती, आकाश आदि देव एवं यजमान को कृत्या से बचाने वाले
पुरोहित तिलक वृक्ष से मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस करें. (६)
ये स्रक्त्यं मणिं जना वर्मणि कृण्वते.
सूर्य इव दिवमारुह्य वि कृत्या बाधते वशी.. (७)
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कृत्या राक्षसी से बचाने वाले लोग तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को अपना कवच बना
लेते हैं. यह मणि दूसरे द्वारा भेजी गई कृत्या का उसी प्रकार विनाश करती है, जिस प्रकार
सूर्य आकाश में पहुंच कर अंधकार का विनाश करते हैं. (७)
साक्त्येन मणिन ऋषिरणेव मनीषिणा.
अजैषं सर्वाः पृतना वि मृधो हन्मि रक्षसः.. (८)
मुझ साधक ने तिलक वृक्ष द्वारा निर्मित मणि की सहायता से पूतना नामक सभी
राक्षसियों को उसी प्रकार जीत लिया है, जिस प्रकार विद्वान् ऋषि अथवा ने जीता था. मैं
उपद्रवकारी राक्षसों को तिलक वृक्ष से निर्मित मणि के द्वारा नष्ट करता हूं. (८)
याः कृत्या आङ्गिरसीर्याः कृत्या आसुरीर्याः कृत्याः स्वयंकृता या
उचान्येभिराभृताः.
उभयीस्ताः परा यन्तु परावतो नवतिं नाव्या ३ अति.. (९)
जो कृत्या राक्षसियां अंगिरा ऋषि द्वारा बताई हुई विधि से प्रयुक्त हैं, जो कृत्या
राक्षसियां असुरों द्वारा निर्मित हैं, जो कृत्या राक्षसियां चित्त विकलता के कारण किसी के
द्वारा अपने ऊपर की गई हैं अथवा अन्य अभिचारकों द्वारा की गई हैं, ये दोनों प्रकार की
कृत्याएं दूर चली जाएं. कृत्याएं नौ नदियों के पार चली जाएं. (९)
अस्मै मणिं वर्म बध्नन्तु देवा इन्द्रो विष्णुः सविता रुद्रो अग्निः.
प्रजापतिः परमेष्ठी विराट् वैश्वानर ऋषयश्च सर्वे.. (१०)
इंद्र, विष्णु, सविता, रुद्र एवं अग्नि कृत्या से बचने के इच्छुक इस यजमान को कवच के
स्थान पर तिलक वृक्ष से निर्मित मणि बांधें अथवा सर्वोच्च स्थान पर विराजमान प्रजापति एवं
सभी ऋषि यजमान की रक्षा के लिए यह मणि बांधें. प्रजापति संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी तथा
सभी मनुष्यों के हितकारी हिरण्यगर्भ हैं. (१०)
उत्तमो अस्योषधीनामनड्वाञ्जगतामिव व्याघ्रः श्वपदामिव.
यमैच्छामाविदाम तं प्रतिस्पाशनमन्तितम्.. (११)
हे मणि के उपादान तिलक वृक्ष! तू सभी वृक्षों में उत्तम है, क्योंकि अन्य वृक्ष सीमित
फल के साधक हैं और तू समस्त अभिमत फल देने वाला होने के कारण उसी प्रकार श्रेष्ठ है,
जिस प्रकार बैल पालतू चौपायों में और बाघ हिंसक जंगली पशुओं में श्रेष्ठ है. हम ने जिस
की इच्छा की थी, उसे तेरी सहायता से पा लिया. मेरी इच्छित वस्तु विरोधी अभिचारक की
बाधक एवं मेरे अत्यंत समीप रहने वाली है. (११)
स इद् व्याघ्रो भवत्यथो सिंहो अथो वृषा.
अथो सपत्नकर्शनो यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१२)
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जो पुरुष तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को बांधता है, वह बाघ और सिंह के समान दूसरों
को पराजित करने वाला होता है. वह गायों में सांड़ के समान स्वच्छंद घूमने वाला होता है एवं
शत्रु का विनाश करता है. (१२)
नैनं घ्नन्त्यप्सरसो न गन्धर्वा न मर्त्या:.
सर्वा दिशो वि राजति यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१३)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि धारण करने वाले को अप्सराएं, गंधर्व और मनुष्य कोई नहीं
मार पाता है, वह सभी दिशाओं का स्वामी होता है. (१३)
कश्यपस्त्वामसृजत कश्यपस्त्वा समैरयत्.
अबिभस्त्वेन्द्रो मानुषे बिभ्रत् संश्रेषिणे ऽ जयत्.
मणिं सहस्रवीर्यं वर्म देवा अकृण्वत.. (१४)
हे मणि! कश्यप ऋषि ने तुम्हारा निर्माण किया था और उन्हीं ने तुम्हें सब के उपकार
करने की प्रेरणा दी थी. सभी देवों के अधिपति इंद्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए तुम्हें धारण
किया था. इसी कारण मनुष्यों में जो तुम्हें धारण करता है, वह संग्राम में विजयी होता है.
प्राचीन काल में असीमित सामर्थ्य वाली इस मणि को देवों ने अपना कवच बनाया था. (१४)
यस्त्वा कृत्याभिर्यस्त्वा दीक्षाभिर्यज्ञैर्यस्त्वा जिघांसति.
प्रत्यक् त्वमिन्द्र तं जहि वज्रेण शतपर्वणा.. (१५)
हे शांति की कामना करने वाले पुरुष! जो तुझे कृत्या संबंधीनी हिंसक क्रियाओं द्वारा
एवं यज्ञ दीक्षाओं द्वारा मारना चाहता है, तू इंद्र के समान बन कर अपने सौ पर्वों वाले वज्र के
द्वारा उसे मार डाल. (१५)
अयमिद् वै प्रतीवर्त ओजस्वान्संजयो मणि:.
प्रजां धनं च रक्षतु परिपाण: सुमङ्गल:.. (१६)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि निश्चय ही पाप राक्षसी कृत्या को लौटाने में समर्थ,
अतिशय ओजस्वी एवं विजय प्राप्त करने वाली है. यह मणि पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करे एवं
मेरी भी सभी प्रकार रक्षा करे. (१६)
असपत्नं नो अधरादसपत्नं न उत्तरात्.
इन्द्रासपत्नं न: पश्चाज्ज्योति: शूर पुरस्कृधि.. (१७)
हे इंद्र! तुम शूर हो. तुम दक्षिण दिशा से, उत्तर दिशा से पश्चिम दिशा से एवं पूर्व दिशा से
हमें विनाशक तेज प्रदान करो. (१७)
वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मा ऽ हर्वर्म सूर्य:.
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वर्म म इन्द्रश्चाग्निश्च वर्म धाता दधातु मे.. (१८)
धरती और आकाश के देवता मेरे लिए कवच बनें. दिवस और सूर्य मेरे लिए कवच बनें.
इंद्र और अग्नि मेरे लिए कवच बनें. (१८)
ऐन्द्राग्नं वर्म बहुलं यदुग्रं विश्वे देवा नाति विध्यन्ति सर्वे.
तन्मे तन्वं त्रायतां सर्वतो बृहदायुष्मान्जरदष्टिर्यथासानि.. (१९)
इंद्र और अग्नि देवों द्वारा सम्मत मणिरूपी कवच अतिशय शक्तिशाली होता है. सभी
देव इस मणि रूपी कवच का भेदन नहीं करते अर्थात् उसे धारण करने वाले का पालन करते
हैं. इस प्रकार का मणि रूपी कवच मेरे शरीर की सभी ओर से रक्षा करे, जिस से मैं सौ वर्ष
की आयु प्राप्त करूं तथा वृद्धावस्था तक जीवित रहूं. (१९)
आ मारुक्षद् देवमणिर्मह्या अरिष्टतातये.
इमं मेथमभिसंविशध्वं तनूपानं त्रिवरूथमोजसे.. (२०)
इंद्र, अग्नि आदि देवों के द्वारा धारण की गई मणि विनाश से बचाने के लिए मेरी भुजा
में बंधी है. हे मनुष्यो! तुम भी शत्रुओं का विनाश करने वाली इस मणि का सभी प्रकार
आश्रय लो. यह मणि शरीर की रक्षा करने वाली, तीन प्रकार के आवरण से युक्त एवं बल
बढ़ाने वाली है. (२०)
अस्मिन्निन्द्रो नि दधातु नृम्णमिमं देवासो अभिसंविशध्वम्.
दीर्घायुत्वाय शतशारदायायुष्मान्जरदष्टिर्यथ ऽ सत्.. (२१)
इंद्र उस मणि में हमारा चाहा हुआ सुख स्थापित करें. हे देवो! अधिक आयु प्राप्त करने
के लिए तुम भी इस मणि के चारों ओर स्थित रहो. यह प्रार्थना सौ वर्ष की एवं वृद्धावस्था
पर्यंत आयु प्राप्त करने के लिए है. (२१)
स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी.
इन्द्रो बध्नातु ते मणिं जिगीवाँ
अपराजितः सोमपा अभयङ्करो वृषा.
स त्वा रक्षतु सर्वतो दिवा नक्तं च विश्वतः.. (२२)
अपने भक्तों का कल्याण करने वाले, देव मनुष्य रूपी प्रजाओं के पालक, वृत्र राक्षस
का वध करने वाले, अपराजित, सोम पीने वाले, अभय कर्ता एवं अभिमत फल दाता इंद्र देव
उस महिमामयी मणि को तुम्हारी भुजा में बांधें एवं तुम्हें सभी भयों से रातदिन तथा सभी
ओर से बचाएं. (२२)
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सूक्त-६ देवता—मंत्र में बताए गए मातृनामा
यौ ते मातोन्ममार्ज जातायाः पतिवेदनौ.
दुर्णामा तत्र मा गृधदलिंश उत वत्सपः.. (१)
हे गर्भिणी! तेरे जन्म लेने के समय तेरी माता ने पति को प्राप्त होने वाले जो दुर्नाम और
सुनाम नामक दो उन्मार्जन किए थे, उन में त्वचा के दोष से सुगंधित दुर्नाम तेरी इच्छा न करे
अर्थात् तुझे प्राप्त न हो तथा अलीश एवं वत्सप नामक रोग भी तुझे न हों. (१)
पलालाानुपलालौ शर्कुं कोकं मलिम्लुचं पलीजकम्.
आश्रेषं वव्रीवाससमृक्षग्रीवं प्रमीलिनम्.. (२)
गर्भिणी को पीड़ा पहुंचाने वाले जो पलाल, अनुपलाल, शर्कु, कोक, मलिम्लुच,
पलीजक, आश्लेष, वव्रीवास, ऋक्षग्रीव एवं प्रमीली नामक राक्षस हैं, मैं उन सब का विनाश
करता हूं. (२)
मा सं वृत्तो मोप सृप ऊरू माव सृपो ऽ न्तरा.
कृणोम्यस्यै भेषजं बजं दुर्नामचातनम्.. (३)
हे दुर्नाम रोग से संबंधित राक्षस! इस गर्भिणी की जंघाओं के मध्य में संकोच उत्पन्न मत
कर तथा उन के भीतर प्रवेश भी मत कर. तू गर्भिणी की जंघाओं के नीचे की ओर भी मत
खिसक. इस गर्भिणी से संबंधित सफेद सरसों के रूप में मैं जो ओषधि तैयार करता हूं, वह
दुर्नाम रोग का विनाश करने वाली है. (३)
दुर्णामा च सुनामा चोभा संवृतमिच्छतः.
अरायानप हन्मः सुनामा सैणमिच्छताम्.. (४)
दुर्नाम और सुनाम नामक दोनों रोग एक साथ ही संचरण करना चाहते हैं. मैं उन में से
दुर्नाम को नष्ट करता हूं, जो सुंदरता का विरोधी है. सुनाम स्त्री की इच्छा करने वाला हो. (४)
यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः.
अरायानस्या मुष्काभ्यां भंससोऽप हन्मसि.. (५)
जो कृष्णकेशी, स्तंबज एवं तुंडिक नामक असुर हैं, ये सब दुर्भाग्य रूपी रोग हैं. मैं इन्हें
गर्भिणी की जंघाओं तथा कमर से दूर करता हूं. (५)
अनुजिघ्रं प्रमृशन्तं क्रव्यादमुत रेरिहम्.
अरायांछ्वकिष्किणो बजः पिङ्गो अनीनशत्.. (६)
अनुजिघ्र, प्रमृशन्त, क्रव्याद एवं रेरिह नामक जो सुंदरता विनाशक रोगों से संबंधित
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राक्षस हैं, मैं ने पीली सरसों रूपी ओषधि के द्वारा इन सभी हिंसकों का विनाश कर दिया है.
(६)
यस्त्वा स्वप्ने निपद्यते भ्राता भूत्वा पितेव च.
बजस्तान्सहतामितः क्लीबरूपांस्तिरीटिनः.. (७)
हे गर्भिणी! जो राक्षस तेरी स्वप्न अवस्था में सहोदर भ्राता एवं पिता के समान विश्वास
उत्पन्न करता हुआ गर्भ नष्ट करने के विचार से तुझ में प्रवेश करता है, मैं सफेद सरसों रूपी
ओषधि के द्वारा इन सब को तथा नपुंसक का रूप बना कर घूमने वाले सभी राक्षसों का
विनाश करता हूं. (७)
यस्त्वा स्वपन्तीं त्सरति यस्त्वा दिप्सति जाग्रतीम्.
छायामिव प्र तान्सूर्यः परिक्रामन्ननीनशत्.. (८)
हे गर्भिणी! जो राक्षस सोते समय तेरे समीप आता है अथवा जो जाग्रत अवस्था में तेरी
हिंसा करना चाहता है, यह सरसों उन सब को उसी प्रकार नष्ट कर दे, जिस प्रकार आकाश में
विचरण करने वाला सूर्य अंधकार का विनाश करता है. (८)
यः कृणोति मृतवत्सामवतोकामिमां स्त्रियम्.
तमोषधे त्वं नाशयास्याः कमलमज्जिवम्.. (९)
जो राक्षस गर्भिणी को मरे हुए पुत्र वाली बनाता है अथवा जो उसे नष्टगर्भ वाली बनाता
है, हे सरसों रूपी ओषधि! तू उस दुष्ट का विनाश कर तथा इस के गर्भ द्वार को स्पष्ट कर.
(९)
ये शालाः परिनृत्यन्ति सायं गर्दभनादिनः.
कुसूला ये च कुक्षिलाः ककुभाः करुमाः स्रिमाः.
तानोषधे त्वं गन्धेन विषूचीनान् वि नाशय.. (१०)
जो पिशाच संध्या के समय गधों के समान शब्द करते हुए घरों के चारों ओर नाचते हैं
तथा जो कुसूल के समान आकृति बना कर नाचते हैं, इन के अतिरिक्त जो बड़े पेट वाले,
अर्जुन वृक्ष के समान भयानक आकृति वाले एवं भांतिभांति के आकारों तथा ध्वनियां करने
वाले राक्षस घरों के चारों ओर नाचते हैं, हे सरसों रूपी ओषधि! तू अपनी गंध से उन सभी
विप्लवकारियों को समाप्त कर. (१०)
ये कुकुन्धाः कुकूरभाः कृत्तीर्दूशानि बिभ्रति.
क्लीबा इव प्रनृत्यन्तो वने ये कुर्वते घोषं तानितो नाशयामसि.. (११)
मुरगे के समान ध्वनि करने वाले जो ककुंध नामक पिशाच हैं तथा जो दूषित कर्म
धारण करते हैं, जो पिशाच हिजड़ों और पागलों के समान नृत्य करते हैं तथा जो वन में हल्ला
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मचाते हैं, इन सब को मैं गर्भिणी के पास से भगाता हूं. (११)
ये सूर्यं न तितिक्षन्त आतपन्तममुं दिवः.
अरायान् बस्तवासिनो दुर्गन्धींल्लोहितास्यान् मककान् नाशयामसि..
(१२)
जो विशेष प्राणी आकाश में सभी ओर चलते हुए इन सूर्य को सहन नहीं करते हैं जो
श्रीविहीन हैं, भेड़ का चमड़ा पहनते हैं, दुर्गंध वाले हैं, सदा मांस खाने के कारण जिन का मुंह
लाल रहता है एवं जिन की चाल बुरी है, ऐसे पिशाचों का मैं नाश करता हूं. (१२)
य आत्मानमतिमात्रमंस आधाय बिभ्रति.
स्त्रीणां श्रोणिप्रतोदिन इन्द्र रक्षांसि नाशय.. (१३)
जो पिशाच गर्भिणी नारियों के स्थूल शरीर को कंधे पर धारण करते हैं तथा जो गर्भिणी
स्त्रियों की कमर को अत्यधिक व्यथित करते हैं, हे इंद्र! उन राक्षसों का विनाश करो. (१३)
ये पूर्वे वध्वो ३ यन्ति हस्ते शृङ्गाणि बिभ्रतः.
आपाकेष्ठाः प्रहासिन स्तम्बे ये कुर्वते ज्योतिस्तानितो नाशयामसि.. (१४)
जो पिशाच अपने बजाने के लिए अथवा पीने के लिए अपने हाथों में सींग ले कर
अपनी पत्नियों के साथ घूमते हैं जो पाकशालाओं अथवा कुम्हारों के घरों में स्थित हैं, जो
अट्टहास करते हैं तथा जो घर के खंभों पर अग्नि का रूप बना लेते हैं, उन सब को हम
गर्भिणी के निवास स्थान से दूर भगाते हैं. (१४)
येषां पश्चात् प्रपदानि पुरः पार्ष्णीः पुरो मुखा.
खलजाः शकधूमजा उरुण्डा ये च मट्मटाः कुम्भमुष्का अयाशवः.
तानस्या ब्रह्मणस्पते प्रतीबोधेन नाशय.. (१५)
जिन राक्षसों के पंजे पीछे की ओर हैं, एड़ियां तथा मुख आगे की ओर हैं, जो खलिहान
में जन्मे हैं, जो गाय, घोड़े आदि के गोबर से उत्पन्न हुए हैं, जो शीर्ष रहित हैं, जो मुटमुट शब्द
करते हैं, जिन के मुंह घोड़े के समान हैं तथा जो वायु के समान तेज चलते हैं, हे ब्रह्मणस्पति!
उन सब को निरोध के साधन इस सरसों के द्वारा नष्ट करो. (१५)
पर्यस्ताक्षा अप्रचङ्कशा अस्रैणाः सन्तु पण्डगाः.
अव भेषज पादय य इमां संविवृत्सत्यपतिः स्वपतिं स्त्रियम्.. (१६)
इधरउधर फैली हुई आंखों वाले, पतली जंघाओं वाले एवं पैरों से न चलने वाले जो
पिशाच हैं, वे बिना स्त्रियों वाले हो जाएं. हे सरसों रूपी ओषधि! तुम उन्हें नीचे की ओर मुंह
कर के गिराओ. जो अनियंत्रित पिशाच इस पति वाली गर्भिणी स्त्री को वश में करना चाहते
हैं, उन का विनाश करो. (१६)
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उद्धृषिणं मुनिकेशं जम्भयन्तं मरीमृशम्.
उपेषन्तमुदुम्बलं तुण्डेलमुत शालुदम्.
पदा प्र विध्य पार्ष्ण्या स्थालीं गौरिव स्पन्दना.. (१७)
अत्यधिक घर्षण वाले, मुनियों के समान लंबी जटाओं वाले, हिंसक, बारबार कष्ट देने
वाले एवं गर्भिणी को सभी ओर खोजने वाले उदुंबल, तुंडेल एवं शालुड असुरों को हे सरसों
नामक ओषधि! अपने पैर से भलीभांति चोट कर के इस प्रकार मार डाल, जिस प्रकार बुरी
गाय मिट्टी की दोहनी को पिछले पैर मार कर तोड़ देती है. (१७)
यस्ते गर्भं प्रतिमृशाज्जातं वा मारयाति ते.
पिङ्गस्तमुग्रधन्वा कृणोतु हृदयाविधम्.. (१८)
हे गर्भिणी स्त्री! जो राक्षस और पिशाच तेरे गर्भ को इस प्रकार पीड़ा देते हैं कि वह
जीवित जन्म न ले अथवा जो तेरे जन्म लिए हुए पुत्र को मारते हैं, सफेद सरसों उन
गर्भघातकों को दौड़ादौड़ा कर उन के हृदय में चोट मारें. (१८)
ये अम्नो जातान् मारयन्ति सूतिका अनुशेरते.
स्त्रीभागान् पिङ्गो गन्धर्वान् वातो अभ्रमिवाजतु.. (१९)
जो राक्षस, पिशाच आदि आधे जन्मे हुए बच्चों को मार डालते हैं एवं जो स्त्री का रूप
धारण कर के प्रसूता के समीप सो जाते हैं. स्त्रियों को बाधा पहुंचाने वाले उन राक्षस, पिशाच
आदि को पीली सरसों इस प्रकार भगा दे, जैसे वायु बादलों को हटा देती है. (१९)
परिसृष्टं धारयतु यद्धितं माव पादि तत्.
गर्भं त उग्रौ रक्षतां भेषजौ नीविभार्यौ.. (२०)
गर्भिणी स्त्री होम के विनियोग से युक्त सरसों के दो दानों को इसलिए धारण करे, जिस
से उस की मनचाही संतान पुत्र आदि नष्ट न हों. हे गर्भिणी स्त्री! तेरे गर्भ को अत्यधिक
बलयुक्त ओषधि के रूप में सफेद और पीली - दोनों प्रकार की सरसों रक्षा करें. सरसों तुझे
नीवी अर्थात् कमर में पहने हुए वस्त्र में अथवा ओढ़नी के सिरे में रखनी चाहिए. (२०)
पवीनसात् तङ्गलवा ३ च्छायकादुत नग्नकात्.
प्रजायै पत्यै त्वा पिङ्गः परि पातु किमीदिनः.. (२१)
वज्र के समान नाक वाले तंगलव नामक विनाशकारी राक्षसों से तथा नग्न नामक असुरों
से हे गर्भिणी स्त्री! पीले रंग की सरसों तेरी संतान की एवं तेरे पति की रक्षा करे एवं इन के
अनुकूल बने. (२१)
द्व्यास्याच्चतुरक्षात् पञ्चपादादनङ्कुरेः.
वृन्तादभि प्रसर्पतः परि पाहि वरीवृतात्.. (२२)
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हे जड़ीबूटी! तू दो मुखों वाले, चार आंखों वाले, पीछे की ओर पैरों वाले, अंगुली रहित
एवं लताओं के कुंज से सामने की ओर आते हुए तथा सारे शरीर को अधिक रूप में व्याप्त
करते हुए राक्षसों से गर्भिणी स्त्री की रक्षा कर. (२२)
य आमं मांसमदन्ति पौरुषेयं च ये क्रविः.
गर्भान् खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि.. (२३)
जो राक्षस कच्चा मांस खाते हैं, जो मानव मांस का भक्षण करते हैं तथा जो लंबे केशों
वाले हैं. वे माया रूप धारण कर के गर्भ में प्रवेश करते हैं और उसे खा जाते हैं. हम उन तीनों
प्रकार के राक्षसों को गर्भिणी के समीप से दूर भगाते हैं. (२३)
ये सूर्यात् परिसर्पन्ति स्नुषेव श्वशुरादधि.
बजश्च तेषां पिङ्गश्च हृदये ऽ धि नि विध्यताम्.. (२४)
जिस प्रकार वधू अपने ससुर की आज्ञा पा कर पति के समीप जाती है, उसी प्रकार जो
पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षस सूर्य की अनुमति से भूलोक में घूमते हैं, उन के हृदय में पीली और
सफेद सरसों के द्वारा प्रहार करना चाहिए. (२४)
पिङ्ग रक्ष जायमानं मा पुमांसं स्त्रियं क्रन्.
आण्डादो गर्भन्मा दभन् बाधस्वेतः किमीदिनः.. (२५)
हे पीली सरसों! तू जन्म लेते हुए बालक की रक्षा कर. तू जन्म लेते हुए लड़के एवं
लड़की को पीड़ा मत पहुंचा. जरायु का भक्षण करने वाले राक्षस गर्भो की हिंसा न करें. हे
पीली सरसों! “यह क्या है, यह क्या है.” इस प्रकार कह कर घूमने वाले राक्षसों को गर्भिणी
के पास से दूर भगा. (२५)
अप्रजास्त्वं मार्तवत्समाद् रोदमघमावयम्.
वृक्षाद्विव स्रजं कृत्वा ऽ प्रिये प्रति मुञ्च तत्.. (२६)
हे पीली सरसों! जिस प्रकार वृक्ष से फूल तोड़ कर और उन की माला बना कर प्रियतम
को पहनाई जाती है, उसी प्रकार तू इस स्त्री के बांझपन को, बच्चे मर जाने रूपी दुर्भाग्य को,
सदा उत्पन्न होने वाले दुःख को, पाप अथवा उन के फलरूपी दुःखों को सदा सोने की माला
बना कर उसे पहना दे, जिस से यह द्वेष करती है. (२६)
सूक्त-७ देवता—आयुष्य ओषधियां
या बभ्रवो याश्च शुक्ला रोहिणीरुत पृश्नयः.
आसिक्नीः कृष्णा ओषधीः सर्वा अच्छावदामसि.. (१)
जो जड़ीबूटियां विभिन्न आकारों तथा शुक्ल, लाल आदि रंगों की हैं, उन सभी के सामने
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उपस्थित हो कर मैं रोग निवारण की प्रार्थना करता हूं. (१)
त्रायन्तामिमं पुरुषं यक्ष्माद् देवेषितादधि.
यासां द्यौष्पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव.. (२)
पृथ्वी जिन की माता, आकाश जिन का पिता और सागर जिन का मूल है, वे
जड़ीबूटियां दुर्भाग्य के कारण उत्पन्न इस राजयक्ष्मा रोग से इस पुरुष की रक्षा करें. (२)
आपो अग्रं दिव्या ओषधयः. तास्ते यक्ष्ममेनस्य१मङ्गादङ्गादनीनशन्.. (३)
हे रोगी पुरुष! जो पवित्र जल और दिव्य जड़ीबूटियां हैं, वे तेरे शरीर के प्रत्येक अंग से
यक्ष्मा रोग का विनाश कर दें. (३)
प्रस्तृणती स्तम्बिनीरेकशृङ्गाः प्रतन्वतीरोषधीरा वदामि.
अंशुमतीः काण्डिनीर्या विशाखा ह्वयामि ते वीरुधो वैश्वदेवीरुग्राः
पुरुषजीवनीः... (४)
हे यक्ष्मा रोग से ग्रसित पुरुष! मैं तेरे स्वास्थ्य लाभ के निमित्त फैली हुई, बहुत सी
टहनियों वाली, एक टहनी वाली, गांठों वाली, पत्तियों वाली, शाखाओं से रहित एवं नसों
वाली जो जड़ीबूटियां तुझे जीवन देने वाली हैं, उन सभी अत्यधिक प्रभावशालिनी एवं समस्त
देवों के निवास वाली जड़ीबूटियों को तेरे लिए ग्रहण करता हूं. (४)
यद् वः सहः सहमाना वीर्यं १ यच्च वो बलम्.
तेनेममस्माद् यक्ष्मात् पुरुषं मुञ्चतौषधीरथो कृणोमि भेषजम्.. (५)
हे रोगों का विनाश करने वाली जड़ीबूटियों! तुम में जो रोग नाश करने वाली शक्ति,
वीर्य और बल है, उस के द्वारा इस पुरुष की यक्ष्मा रोग से रक्षा करो. मैं सभी ओषधियों को
मंत्रों से युक्त बनाता हूं. (५)
जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्.
अरुन्धतीमुन्नयन्तीं पुष्पां मधुमतीमिह हुवे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (६)
कल्याण के निमित्त मैं जीवन देने वाली एवं क्रोध न करने वाली जीवंती एवं अरुंधती
नामक जड़ी बूटियों का आह्वान करता हूं. ये जड़ीबूटियां ऊपर की ओर बढ़ने वाली, पुष्पों से
युक्त एवं मधु सहित हैं. (६)
इहा यन्तु प्रचेतसो मेदिनीर्वर्चसो मम.
यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि.. (७)
मेरे मंत्रों के प्रभाव से चेतनायुक्त जड़ीबूटियां यहां आएं तथा इस रोग के कारण रूप
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पाप का विनाश करें. (७)
अग्नेर्घासो अपां गर्भो या रोहन्ति पुनर्णवाः.
ध्रुवाः सहस्रनाम्नीर्भेषजीः सन्त्वाभृताः.. (८)
जो जड़ीबूटियां जल का गर्भ हैं, अग्नि का भोजन हैं तथा बारबार उगने के कारण
नवीन रहती हैं, इस प्रकार की हजारों नाम वाली जड़ीबूटियां नित्य यहां लाई जाएं. (८)
अवकोल्बा उदकात्मान ओषधयः.
व्युषन्तु दुरितं तीक्ष्णशृङ्ग्यः.. (९)
जो जड़ीबूटियां सिवार घास का गर्भ हैं और जल जिन का जीवन है, बारबार उगने के
कारण जो सदा नवीन रहती हैं, वे रोगों के कारण रूप पापों का नाश करें. उन ओषधियों के
पत्ते अथवा कांटे नोकीली सींक के समान हैं. (९)
उन्मुञ्चन्तीर्विवरुणा उग्रा या विषदूषणीः.
अथो बलासनाशनीः कृत्यादूषणीश्च यास्ता इहा यन्त्वोषधीः.. (१०)
जलोदर रोग का विनाश करने वाली, विष को शांत करने वाली, खांसी आदि रोगों पर
प्रभावशालिनी तथा जो कृत्या नामक पाप देवता को दूर भगाने वाली हैं, वे जड़ीबूटियां यहां
लाई जाएं. (१०)
अपक्रीताः सहीयसीर्वीरुधो या अभिष्टुताः.
त्रायन्तामस्मिन् ग्रामे गामश्वं पुरुषं पशुम्.. (११)
हमारे द्वारा लाई गई, रोगों का विनाश करने में समर्थ एवं मंत्रों द्वारा प्रभावित जो
जड़ीबूटियां हैं, वे इस गांव के मनुष्यों और पशुओं की रक्षा करें. (११)
मधुमन्मूलं मधुमदग्रमासां मधुमन्मध्यं वीरुधां बभूव.
मधुमत् पर्णं मधुमत्
पुष्पमासां मधोः संभक्ता अमृतस्य भक्षो घृतमन्नं दुहतां गोपुरोगवम्..
(१२)
जिन वृक्षों की जड़, ऊपर का भाग एवं मध्य भाग मधुरता पूर्ण हैं, जिन के पत्ते एवं फूल
मधु से भरे हुए हैं, जो मधु से भलीभांति पूर्ण हैं, उन का सेवन करने वाला अमृत का सेवन
करता है. वह स्वस्थ रहता हुआ गायों से घृत तथा अन्न प्राप्त करता है. (१२)
यावतीः कियतीश्चेमाः पृथिव्यामध्योषधीः.
ता मा सहस्रपर्ण्यो मृत्योर्मुञ्चन्त्वंहसः.. (१३)
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पृथ्वी पर जितनी भी हजार पत्तों वाली जड़ीबूटियां हैं, वे मुझे मृत्यु एवं पाप से बचाएं.
(१३)
वैयाघ्रो मणिवीरुधां त्रायमाणो ऽ भिशस्तिपाः.
अमीवाः सर्वा रक्षांस्यप हन्त्वधि दूरमस्मत्.. (१४)
वृक्षों से निर्मित वैयाघ्र मणि रक्षक एवं पवित्र करने वाली है. वह सभी रोगों और राक्षसों
को हम से दूर करे. (१४)
सिंहस्येव स्तनथोः सं विजन्ते ऽ ग्नेरिव विजन्त आभूताभ्यः.
गवां यक्ष्मः पुरुषाणां वीरुद्भिरतिनुत्तो नाव्या एतु स्रोत्याः.. (१५)
जिस प्रकार सिंह की गर्जना से प्राणी भयभीत होते हैं एवं प्रज्वलित अग्नि से सभी
जीव व्याकुल हो कर भागते हैं, उसी प्रकार हमारे गौ आदि पशुओं तथा पुत्र, पौत्र आदि
मनुष्यों का यक्ष्मा रोग नदियों को पार कर बहुत दूर चला जाए. (१५)
मुमुचाना ओषधयो ऽ ग्नेर्वैश्वानरादधि.
भूमिं संतन्वतीरित यासां राजा वनस्पतिः.. (१६)
जो ओषधियां धरती को आच्छादित किए हुए हैं और वनस्पति जिन के राजा हैं,
वैश्वानर अग्नि से भी अधिक प्रभाव वाली वे ओषधियां हमें रोगों से मुक्त करती हैं. (१६)
या रोहन्त्याङ्गिरसीः पर्वतेषु समेषु च.
ता नः पयस्वतीः शिवा ओषधीः सन्तु शं हृदे.. (१७)
अंगिरा ऋषि द्वारा बताई गई जो जड़ीबूटियां ऊंचे पर्वतों पर एवं समतल मैदानों में
उत्पन्न होती हैं, वे दूध के समान सार वाली जड़ीबूटियां हमारे लिए कल्याणकारिणी हों एवं
हमारे हृदयों को शांति प्रदान करें. (१७)
याश्चाहं वेद वीरुधो याश्च पश्यामि चक्षुषा.
अज्ञाता जानीमश्च या यासु विद्म च संभृतम्.. (१८)
जिन वृक्षों को मैं जानता हूं, जिन को मैं अपनी आंखों से देख सकता हूं और जिन को
मैं नहीं जानता, वे सभी रोग विनाश में समर्थ हैं. (१८)
सर्वाः समग्रा ओषधीर्बोधन्तु वचसो मम.
यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि.. (१९)
सभी जड़ीबूटियां मेरी स्तुतियों का अभिप्राय संपूर्ण रूप से जान लें तथा मुझे इस योग्य
बना दें कि मैं इस रोगी पुरुष को रोग रूपी पाप से उस पार पहुंचा सकूं. (१९)
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अश्वत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजा ऽ मृतं हविः.
व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमर्त्यौ.. (२०)
वृक्षों का गर्भ पीपल, राजा सोम और अमृत हवि हैं. धान और जौ नामक फसलें
आकाश से होने वाली वर्षा से उत्पन्न होने के कारण आकाश की संतान तथा अमर हैं. (२०)
उज्जिहीध्वे स्तनयत्यभिक्रन्दत्योषधीः.
यदा व पृश्निमातरः पर्जन्यो रेतसा ऽ वति.. (२१)
जड़ीबूटियां बिजली की कड़क से और बादलों के गर्जन से जीवित रहती हैं. वायु और
मेघ वर्षा रूपी जीवन से जड़ीबूटियों की रक्षा करते हैं. (२१)
तस्यामृतस्येमं बलं पुरुषं पाययामसि.
अथो कृणोमि भेषजं यथा ऽ सच्छतहायनः.. (२२)
जड़ीबूटियों के अमृत रूपी बल को मैं रोगी पुरुष को पिलाता हूं. मैं इस की चिकित्सा
इस प्रकार करता हूं कि यह रोगी पुरुष सौ वर्ष की अवस्था प्राप्त करे. (२२)
वराहो वेद वीरुधं नकुलो वेद भेषजीम्.
सर्पा गन्धर्वा या विदुस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२३)
सुअर जिन वृक्षों को जानता है और नेवला जिन जड़ीबूटियों से परिचित है तथा सांप
और गंधर्व जिन्हें जानते हैं, उन जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की रक्षा के लिए बुलाता हूं.
(२३)
याः सुपर्णा आङ्गिरसीर्दिव्या या रघटो विदुः.
वयांसि हंसा या विदुर्याश्च सर्वे पतत्रिणः.
मृगा या विदुरोषधीस्ता अस्मा अवसे हुवे.. (२४)
जिन सुंदर पत्तों वाली जड़ीबूटियों का अंगिरा ऋषि ने रोगियों पर प्रयोग किया, रमद्रुट
जिन दिव्य जड़ीबूटियों को जानते थे, हंस एवं अन्य सभी पक्षी जिन जड़ीबूटियों से परिचित
हैं तथा हरिण जिन जड़ीबूटियों को जानते हैं, उन सभी जड़ीबूटियों को मैं इस रोगी पुरुष की
चिकित्सा के लिए बुलाता हूं. (२४)
यावतीनामोषधीनां गावः प्राश्नन्त्यघ्न्या यावतीनामजावयः.
तावतीस्तुभ्यमोषधीः शर्म यच्छन्त्वाभृताः.. (२५)
हे रोगी पुरुष! हिंसा के अयोग्य गाएं जितनी जड़ीबूटियों को खाती हैं और बकरियां या
भेड़ें जिन जड़ीबूटियों को चरती हैं, मेरे द्वारा लाई गई वे सभी जड़ीबूटियां तेरा कल्याण करें.
(२५)
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यावतीषु मनुष्या भेषजं भिषजो विदुः.
तावतीर्विश्वभेषजीरा भरामि त्वामभि.. (२६)
हे रोगी पुरुष! वैद्य जितनी भी जड़ीबूटियों को ओषधि के रूप में जानते हैं, उन समस्त
जड़ीबूटियों को मैं तेरी चिकित्सा के लिए लाता हूं. (२६)
पुष्पवतीः प्रसूमतीः फलिनीरफला उत.
संमातर इव दुहामस्मा अरिष्टतातये... (२७)
फूलों वाली, अंकुर उत्पन्न करने वाली, फल वाली और बिना फल वाली जो जड़ीबूटियां
हैं, मैं इस रोगी पुरुष के कल्याण के लिए उन सब का प्रयोग इस प्रकार करता हूं, जिस प्रकार
माता बालक को दूध पिलाती है. (२७)
उत् त्वाहार्षं पञ्चशलादथो दशशलादुत.
अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२८)
हे रोगी पुरुष! मैं ने पंच शलाका एवं दस शलाका वाली, काठ के चरण बंधन से
यमराज के पाश से तथा सभी पापों से छुड़ा कर तुझे प्राप्त कर लिया है. (२८)
सूक्त-८ देवता—इंद्र
इन्द्रो मन्थतु मन्थिता शक्रः शूरः पुरंदरः.
यथा हनाम सेना अमित्राणां सहस्रशः.. (१)
शत्रुओं का दलन करने वाले, शक्तिशाली, वीर एवं विरोधियों के नगरों को उजाड़ने वाले
इंद्र इस यज्ञ में अरणि मंथन कर के अग्नि प्रज्वलित करें, जिस के प्रभाव से हम अपने शत्रुओं
की हजारों सैनिकों वाली सेनाओं का विनाश कर सकें. (१)
पूतिरज्जुरुपध्मानी पूतिं सेनां कृणोत्वमूम्.
धूममग्निं परादृश्या ऽ मित्रा हृत्स्वा दधतां भयम्.. (२)
अग्नि में गिरने वाली पुरानी रस्सी शत्रु की सेना को शक्तिहीन करे. इस यज्ञ अग्नि का
धुआं देख कर ही शत्रु भयभीत हों और अपना धन छोड़ कर भाग जाएं. (२)
अमूनश्वत्थ निः शृणीहि खादामून् खदिराजिरम्.
ताजद्भङ्गा इव भज्यन्तां हन्त्वेनान् वधको वधैः.. (३)
हे पीपल के वृक्ष! तुम इन शत्रुओं को समाप्त करो. हे खैर के वृक्ष तुम इन सभी
गमनशील शत्रुओं को खा डालो. शत्रु अरंडी के वृक्ष के समान टूट जाएं. तुम अपने काष्ठ के
प्रहार से इन का वध करो. (३)
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परुषानमून॒ परुषाङ्गः कृणोतु हन्त्वेनान् वधको वधैः.
क्षिप्रं शर इव भज्यन्तां बृहज्जालेन संदिताः.. (४)
परुष नाम का काठ इन शत्रुओं को कठोर अर्थात् गतिहीन बनाए तथा वधक नाम का
काठ अपने प्रहारों से इन का वध करे. वृहत् जाल से टूटने वाले बाणों के समान ये शत्रु भी
शीघ्र टूट जाएं. (४)
अन्तरिक्षं जालमासीज्जालदण्डा दिशो महीः.
तेनाभिधाय दस्यूनां शक्रः सेनामपावपत्.. (५)
इंद्र ने आकाश का जाल बनाया और पृथ्वी की दिशाओं को डंडा बना कर उसे ताना.
इंद्र ने राक्षसों की सेनाओं को ललकार कर इसी जाल से नष्ट कर दिया. (५)
बृहद्धि जालं बृहतः शक्रस्य वाजिनीवतः.
तेन शत्रूनभि सर्वान् न्युब्ज यथा न मुच्यातै कतमश्चनैषाम्.. (६)
सेनापति इंद्र का आकाशरूपी जाल अत्यधिक विशाल है. हे इंद्र! इस जाल में फंसा
कर शत्रुओं को इस प्रकार मारो कि उन में से एक भी न बचे. (६)
बृहत् ते जालं बृहत इन्द्र शूर सहस्रार्घस्य शतवीर्यस्य.
तेन शतं सहस्रमयुतं न्यर्बुदं जघान शक्रो दस्यूनामभिधाय सेनया.. (७)
हे सूर्य एवं इंद्र! तुम्हारा जाल विशाल है. तुम हजार के आधे अर्थात् पांच सौ सैनिकों के
स्वामी हो, जिन में से प्रत्येक सौ मनुष्यों के समान शक्तिशाली है. शक्तिशाली इंद्र ने ललकार
कर अपनी सेना की सहायता से राक्षसों के सौ हजार, दस हजार एवं एक अरब सैनिकों को
अंधकार से ढक दिया था. (७)
अयं लोको जालमासीच्छक्रस्य महतो महान्.
तेनाहमिन्द्रजालेनामूंस्तमसाभि दधामि सर्वान्.. (८)
यह विशाल लोक ही महान इंद्र का जाल था. मैं इंद्र के इसी जाल की सहायता से इन
सभी शत्रुओं को अंधकार से ढकता हूं. (८)
सेदिरुग्रा व्यृद्धिरार्तिश्चानपवाचना.
श्रमस्तन्द्रीश्च मोहश्च तैरमूनभि दधामि सर्वान्.. (९)
मैं सुस्ती, व्याकुलता, धनहीनता, दुःख, वचन का अभाव, थकान, तंद्रा और बेहोशी के
द्वारा इन सभी शत्रुओं को आच्छादित करता हूं. (९)
मृत्यवे ऽ मून॒ प्र यच्छामि मृत्युपाशैरमी सिताः.
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मृत्योर्ये अघला दूतास्तेभ्य एनान् प्रति नयामि बद्ध्वा.. (१०)
ये शत्रु मृत्यु के पाशों से बंध चुके हैं, इसलिए मैं इन्हें मृत्यु को देता हूं. मैं इन्हें बांध कर
मृत्यु के शक्तिशाली दूतों की ओर ले जाता हूं. (१०)
नयतामूनन् मृत्युदूता यमदूता अपोम्भत.
परः सहस्रा हन्यन्तां तणेढ्वेनान् मत्यं भवस्य.. (११)
हे मृत्यु दूतो! इन शत्रु सैनिकों को ले जाओ. हे यमदूतो! इन का विनाश करो. जिस
प्रकार तिनका तोड़ देते हैं, उसी प्रकार इन हजारों से अधिक राक्षसों का वध करो. (११)
साध्या एकं जालदण्डमुद्यत्य यन्त्वोजसा.
रुद्रा एकं वसव एकमादित्यैरेक उद्यतः.. (१२)
साध्य देवता जाल के एक डंडे को पकड़ कर शत्रुओं पर बल से आक्रमण कर रहे हैं.
जाल के शेष तीन डंडों में से एक को रुद्र ने, दूसरे को वसु ने और तीसरे को आदित्य ने उठा
लिया है. (१२)
विश्वे देवा उपरिष्टादुब्जन्तो यन्त्वोजसा.
मध्येन घ्नन्तो यन्तु सेनामङ्गिरसो महीम्.. (१३)
विश्वे देव अपने बल के द्वारा ऊपर से मारते हुए जाएं. अंगिरा के पुत्र सेना के मध्य भाग
का विनाश करते हुए जाएं. (१३)
वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः.
द्विपाच्चतुष्पादिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१४)
मैं अपने मंत्र बल से वनस्पतियों को, वनस्पतियों से बनी हुई ओषधियों को, वृक्षों को,
दो चरणों वाले मनुष्यों को प्रेरित करता हूं, जिस से वे शत्रु सेना का विनाश कर सकें. (१४)
गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्यजनान् पितॄन्.
दृष्टानदृष्टानिष्णामि यथा सेनाममूं हनन्.. (१५)
मैं गंधर्वों, अप्सराओं, सर्पों, देवों, पवित्रजनों, पितरों तथा देखे और बिना देखे हुए
प्राणियों को अपने मंत्र बल से प्रेरित करता हूं कि वे शत्रु सेना को मार डालें. (१५)
इम उप्ता मृत्युपाशा यानाक्रम्य न मुच्यसे.
अमुष्या हन्तु सेनाया इदं कूटं सहस्रशः.. (१६)
हे शत्रु! मैं ने ये मृत्युपाश फैला दिए हैं. तू इन को पार कर के छूट नहीं सकता. यह कूट
इस शत्रु सेना का हजारों की संख्या में संचार करे. (१६)
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