अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी पर जितनी भी हजार पत्तों वाली जड़ीबूटियां हैं, वे मुझे मृत्यु एवं पाप से बचाएं.
(१३)
वैयाघ्रो मणिवीरुधां त्रायमाणो ऽ भिशस्तिपाः.
अमीवाः सर्वा रक्षांस्यप हन्त्वधि दूरमस्मत्.. (१४)
वृक्षों से निर्मित वैयाघ्र मणि रक्षक एवं पवित्र करने वाली है. वह सभी रोगों और राक्षसों
को हम से दूर करे. (१४)
सिंहस्येव स्तनथोः सं विजन्ते ऽ ग्नेरिव विजन्त आभूताभ्यः.
गवां यक्ष्मः पुरुषाणां वीरुद्भिरतिनुत्तो नाव्या एतु स्रोत्याः.. (१५)
जिस प्रकार सिंह की गर्जना से प्राणी भयभीत होते हैं एवं प्रज्वलित अग्नि से सभी
जीव व्याकुल हो कर भागते हैं, उसी प्रकार हमारे गौ आदि पशुओं तथा पुत्र, पौत्र आदि
मनुष्यों का यक्ष्मा रोग नदियों को पार कर बहुत दूर चला जाए. (१५)
मुमुचाना ओषधयो ऽ ग्नेर्वैश्वानरादधि.
भूमिं संतन्वतीरित यासां राजा वनस्पतिः.. (१६)
जो ओषधियां धरती को आच्छादित किए हुए हैं और वनस्पति जिन के राजा हैं,
वैश्वानर अग्नि से भी अधिक प्रभाव वाली वे ओषधियां हमें रोगों से मुक्त करती हैं. (१६)
या रोहन्त्याङ्गिरसीः पर्वतेषु समेषु च.
ता नः पयस्वतीः शिवा ओषधीः सन्तु शं हृदे.. (१७)
अंगिरा ऋषि द्वारा बताई गई जो जड़ीबूटियां ऊंचे पर्वतों पर एवं समतल मैदानों में
उत्पन्न होती हैं, वे दूध के समान सार वाली जड़ीबूटियां हमारे लिए कल्याणकारिणी हों एवं
हमारे हृदयों को शांति प्रदान करें. (१७)
याश्चाहं वेद वीरुधो याश्च पश्यामि चक्षुषा.
अज्ञाता जानीमश्च या यासु विद्म च संभृतम्.. (१८)
जिन वृक्षों को मैं जानता हूं, जिन को मैं अपनी आंखों से देख सकता हूं और जिन को
मैं नहीं जानता, वे सभी रोग विनाश में समर्थ हैं. (१८)
सर्वाः समग्रा ओषधीर्बोधन्तु वचसो मम.
यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि.. (१९)
सभी जड़ीबूटियां मेरी स्तुतियों का अभिप्राय संपूर्ण रूप से जान लें तथा मुझे इस योग्य
बना दें कि मैं इस रोगी पुरुष को रोग रूपी पाप से उस पार पहुंचा सकूं. (१९)
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