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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 446

उद्धृषिणं मुनिकेशं जम्भयन्तं मरीमृशम्.
उपेषन्तमुदुम्बलं तुण्डेलमुत शालुदम्.
पदा प्र विध्य पार्ष्ण्या स्थालीं गौरिव स्पन्दना.. (१७)
अत्यधिक घर्षण वाले, मुनियों के समान लंबी जटाओं वाले, हिंसक, बारबार कष्ट देने
वाले एवं गर्भिणी को सभी ओर खोजने वाले उदुंबल, तुंडेल एवं शालुड असुरों को हे सरसों
नामक ओषधि! अपने पैर से भलीभांति चोट कर के इस प्रकार मार डाल, जिस प्रकार बुरी
गाय मिट्टी की दोहनी को पिछले पैर मार कर तोड़ देती है. (१७)
यस्ते गर्भं प्रतिमृशाज्जातं वा मारयाति ते.
पिङ्गस्तमुग्रधन्वा कृणोतु हृदयाविधम्.. (१८)
हे गर्भिणी स्त्री! जो राक्षस और पिशाच तेरे गर्भ को इस प्रकार पीड़ा देते हैं कि वह
जीवित जन्म न ले अथवा जो तेरे जन्म लिए हुए पुत्र को मारते हैं, सफेद सरसों उन
गर्भघातकों को दौड़ादौड़ा कर उन के हृदय में चोट मारें. (१८)
ये अम्नो जातान् मारयन्ति सूतिका अनुशेरते.
स्त्रीभागान् पिङ्गो गन्धर्वान् वातो अभ्रमिवाजतु.. (१९)
जो राक्षस, पिशाच आदि आधे जन्मे हुए बच्चों को मार डालते हैं एवं जो स्त्री का रूप
धारण कर के प्रसूता के समीप सो जाते हैं. स्त्रियों को बाधा पहुंचाने वाले उन राक्षस, पिशाच
आदि को पीली सरसों इस प्रकार भगा दे, जैसे वायु बादलों को हटा देती है. (१९)
परिसृष्टं धारयतु यद्धितं माव पादि तत्.
गर्भं त उग्रौ रक्षतां भेषजौ नीविभार्यौ.. (२०)
गर्भिणी स्त्री होम के विनियोग से युक्त सरसों के दो दानों को इसलिए धारण करे, जिस
से उस की मनचाही संतान पुत्र आदि नष्ट न हों. हे गर्भिणी स्त्री! तेरे गर्भ को अत्यधिक
बलयुक्त ओषधि के रूप में सफेद और पीली - दोनों प्रकार की सरसों रक्षा करें. सरसों तुझे
नीवी अर्थात् कमर में पहने हुए वस्त्र में अथवा ओढ़नी के सिरे में रखनी चाहिए. (२०)
पवीनसात् तङ्गलवा ३ च्छायकादुत नग्नकात्.
प्रजायै पत्यै त्वा पिङ्गः परि पातु किमीदिनः.. (२१)
वज्र के समान नाक वाले तंगलव नामक विनाशकारी राक्षसों से तथा नग्न नामक असुरों
से हे गर्भिणी स्त्री! पीले रंग की सरसों तेरी संतान की एवं तेरे पति की रक्षा करे एवं इन के
अनुकूल बने. (२१)
द्व्यास्याच्चतुरक्षात् पञ्चपादादनङ्कुरेः.
वृन्तादभि प्रसर्पतः परि पाहि वरीवृतात्.. (२२)
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