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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 437

जिस मिथ्या आरोप लगाने वाले ने मुझ अराक्षस को राक्षस कहा है, अथवा जिस ने
राक्षस होते हुए भी अपनेआप को शुद्ध बताया है—इन दोनों असत्यवादियों को इंद्र देव अपने
वध साधन वज्र के द्वारा मारें. ये दोनों प्रकार के जन संसार के सभी प्राणियों से अधम हो कर
नष्ट हों. (१६)
प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहुस्तन्वं १ गूहमाना.
वव्रम्रनन्तमव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७)
जो राक्षसी उलूकी के समान हमें मारने को आती है तथा जो द्रोह करने वाली राक्षसी
अपने शरीर को छिपाती हुई आती है, वह दुष्ट राक्षसी अंतहीन गड्ढे में नीचे मुंह किए हुए
गिरे. सोमलता को पीसने वाले पत्थर अपनी ध्वनियों से राक्षसों का विनाश करें. (१७)
वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वी ३ च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन.
वयो ये भूत्वा पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८)
हे मरुतो! तुम सब प्रजाओं के मध्य अनेक प्रकार से स्थित रहो तथा राक्षसों का विनाश
करने की इच्छा करो. तुम पकड़े हुए राक्षसों को भलीभांति चूर्ण कर दो. जो राक्षस पक्षी बन
कर रात में घूमते हैं अथवा जो देव संबंधी यज्ञों में हिंसा करते हों, उन राक्षसों का विनाश
करो. (१८)
प्र वर्तय दिवो ऽ श्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्तसं शिशाधि.
प्राक्तो अपाक्तो अधरादुदक्तो ३ भि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९)
हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र नीचे गिराओ. उस वज्र को तुम ऐसा तेज करो, जैसा
सोमदेव ने किया था. तुम उस तेज किए हुए वज्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण सभी
दिशाओं में राक्षसों का विनाश करो. (१९)
एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवो ऽ दाभ्यम्.
शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०)
इस प्रकार के जो राक्षस कुत्तों के समान खाते हुए घूमते हैं और आ कर हिंसा की इच्छा
करते हुए अपराजित इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं, इंद्र उन राक्षसों का वध करने के लिए
अपना वज्र तेज करते हैं. वे इंद्र हिंसक राक्षसों के निमित्त निश्चय ही अपना वज्र तैयार करें.
(२०)
इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्या ३ विवासताम्.
अभीदु शक्रः परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन्तसत एतु रक्षसः.. (२१)
इंद्र देवों के निमित्त दिए गए हवि को चुराने वाले तथा विरोधी गतिविधि करने वाले
राक्षसों का विनाश करें. इंद्र राक्षसों को मारने के लिए इस प्रकार आक्रमण करें, जिस प्रकार
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