अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
हे धन देने वाले इंद्र! तुम्हारे जो मार्ग द्युलोक से नीचे वर्तमान हैं, उन विश्व प्रेरक मार्गों के
द्वारा हमें सुख में स्थापित करो. अर्थात् हमें सुख प्रदान करो. (१)
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोज़ो यजुर्बलम्.
एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते.. (१)
हम ऋग्वेद और सामवेद को हवि के द्वारा पूजते हैं. यजमान ऋग्वेद और सामवेद के
द्वारा यज्ञ कर्म करते हैं. ये दोनों वेद सदस नामक मंडप में शोभा देते हैं तथा यज्ञ को देवों तक
पहुंचाते हैं. (१)
ये ते पन्थानो ऽ व दिवो येभिर्विश्वम्मैरयः. तेभिः सुम्नया धेहि नो वसो.. (२)
मैं ने ऋग्वेद से हवि, सामवेद से ओज और यजुर्वेद से बल के विषय में पूछा था. अर्थात्
ऋग्वेद आदि में हवि आदि का अध्ययन किया था. हे शची के पति और व्याकरण के नियम
बनाने वाले इंद्र! इस प्रकार सुविचारित ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मुझ अध्यापक के
अध्ययनअध्यापन में बाधा न डाल कर मनचाहा फल दें. (२)
सूक्त-५८ देवता—बिच्छू
तिरश्चिराजेरसितात् पृदाकोः परि संभृतम्.
तत् कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्.. (१)
तिरश्चिराजी अर्थात् तिरछी रेखाओं वाले काले और पृदाकू अर्थात् अपने द्वारा काटे हुए
प्राणियों को रुलाने वाले सर्पों के विष को तथा कंकपर्व नामक काटने वाले विषैले जंतु के
विष को यह मधु नाम की जड़ीबूटी नष्ट करे. (१)
इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चुन्मधुला मधूः.
सा विह्रुतस्य भेषज्यथो मशकजम्भनी.. (२)
यह प्रयोग की जाती हुई ओषधि मधु अर्थात् शहद से निर्मित है, इसलिए इस से शहद
टपकता है. मधु युक्त तथा मधूक नाम वाली यह जड़ीबूटी कुटिलता करने वाले विष का नाश
करने वाली तथा मच्छरों को समाप्त करने वाली है. (२)
यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि.
अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्.. (३)
विषैले जंतु द्वारा काटे गए पुरुष से कहा जा रहा है—हे सर्प द्वारा काटे गए पुरुष!
तुम्हारे जिस अंग में विषैले सर्प ने काटा है अथवा तुम्हारे जिस अंग को सर्प आदि ने पिया है,
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उस अंग से मैं सर्प का विष निकालता हूं तथा मुख, पूंछ और चरण-इन तीन अंगों से काटने
वाले मच्छर के विष को भी मैं प्रभावहीन बनाता हूं. (३)
अयं यो वक्रो विपरुर्व्यङ्गो मुखानि वक्रा वृजिना कृणोषि.
तानि त्वं ब्रह्मणस्पत इषीकामिव सं नमः.. (४)
हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस
के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि
अंग टेढ़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी
सींक को सरल बनाया जाता है. (४)
अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः. विषं ह्य१ स्यादिष्यथो
एनमजीजभम्.. (५)
विष रहित, नीचे की ओर मुंह किए हुए एवं तेरे समीप आते हुए शर्कोटक नाम के सांप
के मैं ने टुकड़े कर दिए हैं अर्थात् मैं ने इस का विष समाप्त कर दिया है तथा इस सर्प को मैं
ने नष्ट कर दिया है. (५)
न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः.
अथ किं पापया ऽ मुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम्.. (६)
बिच्छू को संबोधन कर के कहा जा रहा है - हे बिच्छू! तेरे हाथों में दूसरों को पीड़ा
पहुंचाने वाला बल नहीं है. तेरे सिर में भी बल नहीं है. तेरे मध्य भाग अर्थात् कमर में भी बल
नहीं है. तू अपनी, परपीड़ाकारिणी बुद्धि के द्वारा थोड़ा विष अपनी पूंछ में क्यों धारण करता
है? (६)
अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः.
सर्वे भल ब्रवाथ शर्कोटमरसं विषम्.. (७)
हे सर्प! तुझे चीटियां खा लेती हैं और मोरनियां तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं. हे सर्प का
विष दूर करने में समर्थ जड़ीबूटियो! तुम शर्कोटक सर्प के विष को सामर्थ्यहीन कर देती हो,
यह बात भलीभांति कही जाती है. (७)
य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्ये न च.
आस्ये ३ न ते विषं किमु ते पुच्छधावसत्.. (८)
हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग
और मुख में विष नहीं है. तेरे रोओं वाले भाग अर्थात् पूंछ में विष क्यों हो. (८)
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सूक्त-५९ देवता—सरस्वती
यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद् याचमानस्य चरतो जनाँ अनु.
यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद् घृतेन.. (१)
मांगने के लिए दाताओं से स्पष्ट बात कहने वाला मेरा जो अंग क्षुब्ध था तथा मांगने के
लिए जनजन के समीप मेरा जो अंग व्याकुल था, मेरे शरीर का वह बाधित अंग सरस्वती
क्षोभ रहित करें तथा उसे घृत से पूर्ण करें. (१)
सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृत्न्र्तानि.
उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः.. (२)
मरुतों से युक्त एवं जलों के पुत्र वरुण के लिए सात नदियां बहती हैं. द्युलोक में स्थित
इंद्र के निमित्त मनुष्य यज्ञ आदि कर्म करते हैं. वे यज्ञकर्म देवों और मानवों के संघ के निवास
स्थान होते हैं एवं आकाश और धरती इन देवों और मनुष्यों के ऐश्वर्य बनते हैं. आकाश और
धरती इन देवों तथा मनुष्यों के लिए प्रयत्न करते हैं तथा अन्न, जल आदि से पोषण करते हैं.
(२)
सूक्त-६० देवता—इंद्र, वरुण
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ.
युवो रथो अध्वरो देववीतये प्रति स्वसरमुप यातु पीतये.. (१)
हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद
करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने
वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के
समीप ले जाए. (१)
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्.
इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्.. (२)
हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल
देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है,
इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२)
सूक्त-६१ देवता—शत्रु नाशन
यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्.
वृक्ष इव विद्युता हत आ मूलादनु शुष्यतु.. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
जो शत्रु हम निंदा न करने वालों की निंदा करता है और जो शत्रु हम निंदा करने वालों
की निंदा करता है, वह इस प्रकार नष्ट हो जाए जिस प्रकार बिजली से मारा हुआ वृक्ष जड़ से
सूख जाता है. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
ऊर्जं बिभ्रद् वसुवनिः सुमेधा अघोरेण चक्षुषा मित्रियेण.
गृहानैमि सुमना वन्दमानो रमध्वं मा बिभीत मत्.. (१)
हे घरो! अन्न धारण करता हुआ और धन का स्वामी मैं शोभन बुद्धि वाला हो कर तुम्हें
अनुकूल और मैत्री पूर्ण दृष्टि से देखूं. मैं तुम्हारी स्तुति करता हुआ तुम्हारे पास आऊं. मेरे
अधिकार में तुम सुखी रहो, इसलिए जब मैं दूसरे स्थान से तुम्हारे पास आऊं तो तुम मुझे
पराया समझ कर भय मत करो. (१)
इमे गृहा मयोभुव ऊर्जस्वन्तः पयस्वन्तः.
पूर्णा वामेन तिष्ठन्तस्ते नो जानन्त्वायतः.. (२)
यह घर सुख देने वाले, अन्न एवं रस से युक्त, दूध आदि एवं धन से समृद्ध रहे हैं. सामने
दिखाई देते हुए ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (२)
येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहुः.
गृहानुप ह्वयामहे ते नो जानन्त्वायतः.. (३)
प्रवास करता हुआ पुरुष जिन घरों का स्मरण करता है तथा जिन घरों में सौमनस्य
वाला पदार्थ अधिक मात्रा में है, मैं ऐसे घर पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. हमारे ये घर प्रवास
से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (३)
उपहूता भूरिधनाः सखायः स्वादुसंमुदः.
अक्षुध्या अतृष्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (४)
हे घरो! अनुमति हेतु प्रार्थना करने पर तुम अधिक धन युक्त, मैत्रीपूर्ण तथा स्वादिष्ट और
मधुर पदार्थों से युक्त बनो. तुम सदा भूख और प्यास से रहित अर्थात सभी प्रकार तृप्त जनों
वाले बनो. हे घरो! जब हम बाहर से आएं, तब तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत बनो.
(४)
उपहूता इह गाव उपहूता अजावयः.
अथो अन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः.. (५)
हमारे घरों में गाएं, बकरियां और भेड़ें बुलाई जाएं. इस के अतिरिक्त हमारे घरों में अन्न
का सारभूत अंश भी चाहा जाए. (५)
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सूनृतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः.
अतृष्या अक्षुध्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (६)
हे घरो! तुम में प्यारी और सच्ची बातें कही जाएं, तुम शोभन भाग्य वाले बनो. सदा तुम
में अन्न भरा रहे. तुम लोगों की हंसी से मुखरित रहो. हम जब बाहर से आएं तो तुम हमें
पराया समझ कर भयभीत मत होना. (६)
इहैव स्त मानु गात विश्वा रूपाणि पुष्यत.
ऐष्यामि भद्रेणा सह भूयांसो भवता मया.. (७)
हे घरो! तुम इसी स्थान पर सुखी रहो. प्रवास करते हुए मुझ गृहस्वामी के पीछे मत
आओ. तुम पशु आदि सभी रूपों वाले का पोषण करो. मैं धन ले कर पुनः तुम्हारे समीप
आऊंगा. देशांतर से वापस आते मुझे पराया समझ कर तुम भयभीत मत होना. (७)
सूक्त-६३ देवता—अग्नि
यदग्ने तपसा तप उपतप्यामहे तपः.
प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मायुष्मन्तः सुमेधसः.. (१)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप समिदाधान आदि रूप कर्म के द्वारा जो तप किया जा
सकता है, वह तप हम करते हैं. उस तप के द्वारा हम अध्ययन किए हुए वेदमंत्रों के प्रिय,
अधिक आयु वाले और उत्तम धारण शक्ति से संपन्न बनें. (१)
अग्ने तपस्तप्यामह उप तप्यामहे तपः.
श्रुतानि शृण्वन्तो वयमायुष्मन्तः सुमेधसः.. (२)
हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप ही हम शरीर को सुखाने वाला तप करें. हम इस का तप
किसी दूसरे स्थान पर न करें. हम अध्ययन किए गए वेदमंत्रों को सुनते हुए अधिक आयु वाले
और उत्तम बुद्धि वाले बनें. (२)
सूक्त-६४ देवता—जातवेद
अयमाग्नः सत्पतिर्वृद्धवृष्णो रथीव पत्तीनजयत् पुरोहितः.
नाभा पृथिव्यां निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (१)
यह अग्नि देव देवों का पालन करने वाले तथा अधिक शक्ति संपन्न हैं. रथ में बैठा हुआ
व्यक्ति जिस प्रकार दूसरे की पत्नी अथवा प्रजा को अपने अधिकार में कर लेता है, उसी
प्रकार प्रजा को हम अपने वश में करें. यज्ञस्थल की नाभि अर्थात् उत्तरवेदी में स्थापित तथा
अत्यधिक दीप्त होते हुए अग्नि संग्राम में हमें जीतने वाले शत्रुओं को हमारे पैरों के नीचे
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सूक्त-६५ देवता—अग्नि
अर्थात् हमारा वशवर्ती बनाएं. (१)
सूक्त-६५ देवता—अग्नि
पृतनाजितं सहमानमग्निमुक्थैर्हवामहे परमात् सधस्थात्.
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद् देवो ऽ ति दुरितान्यग्निः.. (१)
संग्राम में शत्रुओं को जीतने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं अरणि रूपी
उत्तम स्थान से जन्म लेने वाले अग्नि का आह्वान हम मंत्रों के द्वारा करते हैं. वह हमारे सभी
कष्टों का विनाश करें. दीप्ति वाले अग्नि हमारे सभी पापों को दग्ध करें. (१)
सूक्त-६६ देवता—जल, अग्नि
इदं यत् कृष्णः शकुनिरभिनिष्पतन्नपीपतत्.
आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (१)
काले पक्षी अर्थात् कौए ने आकाश से नीचे आते हुए, जो पंखों से मेरे अंग पर चोट की
है, उस से होने वाले समस्त पापों से अभिमंत्रित जल मेरी रक्षा करे. (१)
इदं यत् कृष्णः शकुनिरवामृक्षन्निर्ऋते ते मुखेन.
अग्निर्मा तस्मादेनसो गार्हपत्यः प्र मुञ्चतु.. (२)
हे मृत्युदेवता! काले पक्षी अर्थात् कौए ने जो अपने मुख से मेरे अंग को स्पर्श किया है,
उस से होने वाले पाप से मुझे गार्हपत्य नामक अग्नि बचाएं. (२)
सूक्त-६७ देवता—अपामार्ग
प्रतीचीनफलो हि त्वमपामार्ग रुरोहिथ.
सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया इतः.. (१)
हे अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तुम सामने की ओर मुख वाले फलों के रूप में
उगे हो, इस कारण मेरे सभी दोषों को मुझ से अत्यधिक दूर करो. (१)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं यद् वा चेरिम पापया.
त्वया तद् विश्वतोमुखापामार्गाप मृज्महे.. (२)
हमने जो दुष्कर्म, पाप एवं मलिन आचरण किया है, हे सभी ओर शाखाओं वाले
अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा हम उसे दूर करते हैं. (२)
श्यावदता कुनखिना बण्डेन यत्सहासिम.
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सूक्त-६८ देवता—ब्रह्मा
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (३)
हम ने काले दांतों वाले, बुरे नाखूनों वाले एवं नपुंसक पुरुष के साथ भोजन किया है. हे
अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के झाड़! तेरे द्वारा उस से होने वाले पाप का हम निवारण करते
हैं. (३)
सूक्त-६८ देवता—ब्रह्मा
यद्यन्तरिक्षे यदि वात आस यदि वृक्षेषु यदि वोलपेषु.
यदश्रवन् पशव उद्यमानं तद् ब्राह्मणं पुनरस्मानुपैतु.. (१)
आकाश के मेघाच्छन्न होने पर, आंधी चलने पर, वृक्षों की छाया में, फसलों में, ग्रामीण
एवं जंगली पशुओं के समीप मैं ने जो वेदाध्ययन किया है अथवा वेदपाठ सुना है, वह भी मेरे
लिए फलदायक हो. (१)
सूक्त-६९ देवता—आत्मा
पुनर्मैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च.
पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामिहैव.. (१)
इंद्र के द्वारा दिया हुआ वीर्य अथवा दी हुई चक्षु आदि इंद्रियों की शक्ति मेरे पास पुनः
आए. आत्मा, धन एवं वेद का अध्ययन मुझे पुनः प्राप्त हो. यज्ञ आदि कर्मों में स्थापित
अग्नियां इसी स्थान में पुनः प्रवृद्ध हों. (१)
सूक्त-७० देवता—सरस्वती
सरस्वति व्रतेषु ते दिव्येषु देवि धामसु.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (१)
हे सरस्वती देवी! तुम अपने से संबंधित व्रतों में एवं गार्हपत्य यज्ञ आदि रूप दिव्य
स्थानों में सामने आ कर हवि स्वीकार करो तथा हमें पुत्र आदि रूप प्रजा प्रदान करो. (१)
इदं ते हव्यं घृतवत् सरस्वतीदं पितॄणां हविरास्यं १ यत्.
इमानि त उदिता शांतमानि तेभिर्वयं मधुमन्तः स्याम.. (२)
हे सरस्वती! तुम्हारे लिए हवन किया जाता हुआ घृतयुक्त यह हवि तथा पितरों के
निमित्त दिया जाता हुआ यह हवि तथा हमारे लिए सुख देने वाले जो हवि हैं, ये तुम्हारे निमित्त
समर्पित किए गए हैं. तुम्हारे निमित्त दिए गए हवियों के द्वारा हम मधुर रस से युक्त अन्न वाले
हों. (२)
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सूक्त-७१ देवता—सरस्वती
सूक्त-७१ देवता—सरस्वती
शिवाः न शंतमा भव सुमृडीका सरस्वति. मा ते युयोम संदृशः.. (१)
हे सरस्वती! तुम हमारे निमित्त सभी सुख देने वाली, रोगनिवारण में अत्यधिक समर्थ
एवं शोभन सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारे यथार्थ रूप के ज्ञान से अलग न हों. (१)
सूक्त-७२ देवता—सुख
शं नो वातो वातु शं नस्तपतु सूर्यः.
अहानि शं भवन्तु नः शं रात्री प्रति धीयतां शमुषा नो व्युच्छतु.. (१)
बाहर चलती हुई वायु हमारे लिए सुख देती हुई बहे. सब के प्रेरक सूर्य हमारे लिए सुख
देते हुए तपें. दिन हमारे लिए सुख देने वाले हों तथा रात भी हमें सुख प्रदान करे. उषाकाल
इस प्रकार विकसित हों, जिस से हमें सुख मिल सके. (१)
सूक्त-७३ देवता—श्येन आदि मंत्र में उक्त
यत् किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा.
तन्मृत्युना निर्ऋतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य.. (१)
दूर स्थित मेरा शत्रु मेरी हत्या करने की इच्छा से जो कर्म करने का विचार करता है तथा
वचन से जो कर्म करने की बात कहता है, अभिचार कर्मों अर्थात् जादूटोने के द्वारा उस के
लिए उचित द्रव्य के द्वारा तथा मंत्र के द्वारा जो होम करता है, उस कर्म को सफल होने से
पहले ही पाप देवता निर्ऋति मृत्यु के साथ मिल कर नष्ट करें. (१)
यातुधाना निर्ऋतिरादु रक्षस्ते अस्य घ्नन्त्वनृतेन सत्यम्.
इन्द्रेषिता देवा आज्यमस्य मथ्नन्तु मा तत् सं पादि यदसौ जुहोति.. (२)
दूसरों को पीड़ा देने वाली पाप की देवी निर्ऋति एवं राक्षस मेरे इस शत्रु के यथार्थ कर्म
फल को असत्य फल के द्वारा समाप्त करें. तात्पर्य यह है कि मेरे शत्रु के द्वारा किया हुआ
अभिचार कर्म फल देने वाला न हो. उस का फल विपरीत हो. इंद्र के द्वारा प्रेरित देव इस शत्रु
का होम कर्म नष्ट करें. यह शत्रु हमारे वध के लिए जो कर्म करता है, वह संपन्न एवं
फलदायक न हो. (२)
अजिराधिराजौ श्येनौ संपातिनाविव.
आज्यं पृतन्यतो हतां यो नः कश्चाभ्यघायति.. (३)
अजिर और अधिराज नामक मृत्यु दूत मुझ से संग्राम करने के इच्छुक पुरुष के घृत से
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पूर्ण होने वाले होम कर्म का उसी प्रकार विनाश करें, जिस प्रकार पक्षियों के ऊपर बाज
आकाश मार्ग से गिरता है. जो शत्रु हमारे विपरीत हिंसा कर्म करने की इच्छा करता है, उस
का आज्य नष्ट हो जाए. (३)
अपाञ्चौ त उभौ बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्देवस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (४)
हे हमारे निमित्त अभिचार कर्म करने वाले मनुष्य! होम कर्म में लगे हुए तेरे दोनों हाथों
को मैं पीछे की ओर बांधता हूं, जिस से वे होम करने में समर्थ न हो सकें. मंत्र का उच्चारण
करने में समर्थ तेरे मुख को भी मैं बंद करता हूं. तेरे हाथों और मुख को बांधने से अग्नि देव के
क्रोध के कारण तेरे हवि को मैं नष्ट करूंगा. (४)
अपि नह्यामि ते बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्घोरस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (५)
मैं अभिचार कर्म में संलग्न तेरे दोनों हाथों और मुख को बांधता हूं, जिस से तेरे हाथ
आहुति न दे सकें और मुख मंत्र का उच्चारण न कर सके. इस प्रकार अग्नि देव के भयानक
क्रोध के द्वारा मैं तेरे हवि एवं उस से सिद्ध होने वाले कर्म का विनाश करता हूं. (५)
सूक्त-७४ देवता—अग्नि
परि त्वा ऽ ग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भंगुरावतः.. (१)
हे अरणि मंथन से उत्तम अग्नि! तुम कर्म फलों को पूर्ण करने वाले एवं मेधावी हो. हम
राक्षसों का हनन करने के लिए तुम्हें चारों ओर धारण करते हैं. तुम घर्षक रूप वाले एवं
राक्षसों का प्रतिदिन विनाश करने वाले हो. (१)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
उत् तिष्ठता ऽ व पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्.
यदि श्वातं जुहोतन यद्यश्वातं ममत्तन.. (१)
ऋत्विजो! उठो, अर्थात् अपने आसनों पर बैठे मत रहो. वसंत आदि ऋतुओं में इंद्र को
देने के लिए पकाए जाने वाले हवि के भाग को देखो. यदि वह हवि पक गया है तो उसे इंद्र के
निमित्त अग्नि में हवन कर दो. यदि वह नहीं पका है तो उसे पकाओ. (१)
श्वातं हविरो ष्विन्द्र प्र याहि जगाम सूरो अध्वनो वि मध्यम्.
परि त्वासते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्.. (२)
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सूक्त-७६ देवता—इंद्र
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त हवि पक गया है. इसलिए तुम शीघ्र आओ. सूर्य अपने गंतव्य
मार्ग के मध्य भाग में पहुंच गए हैं अर्थात् दोपहर हो गया है. ऋत्विज् निचोड़े हुए सोमरस के
द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी उपासना कर रहे हैं, जिस प्रकार वंश के रक्षक पुत्र गृहपति की
उपासना करते हैं. (२)
सूक्त-७६ देवता—इंद्र
श्नातं मन्य ऊधनि श्नातमग्नौ सुशृतं मन्ये तदृतं नवीय:.
माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्न: पिबेन्द्र वज्रिन् पुरुकृज्जुषाण:.. (१)
हवि गाय के थनों में दूध के रूप में पका है और थनों से काढ़ा हुआ दूध अग्नि पर तपा
कर पकाया जाता है. मैं मानता हूं कि यह हवि भलीभांति पक चुका है, इसलिए यह हवि
सत्य एवं अधिक नवीन है. हे वज्रधारी एवं बहुत से कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्रसन्न होते हुए,
माध्यंदिन सवन अर्थात् यज्ञ में सोमरस से संबंधित दधिमिश्रित सोमरस नामक हवि का पान
करो. (१)
सूक्त-७७ देवता—अंगिरस
समिद्धो अग्निर्वृषणा रथी दिवस्तप्तो घर्मो दुह्यते वामिषे मधु.
वयं हि वां पुरूदमासो अश्विना हवामहे सधमादेषु कारव:.. (१)
हे मनचाहा फल देने वाले अश्विनीकुमारो! द्युलोक में स्थित देवों के रथी अग्नि देव दीप्त
हो चुके हैं. उस अग्नि से आज्य ठीक से पक गया है. इस के पश्चात तुम्हारे अन्न के हेतु मधुर
रस वाला दूध काढ़ा जाता है. तुम दोनों के स्तुतिकर्ता हम हवि से पूर्ण घरों वाले हों एवं यज्ञों
में तुम्हारा आह्वान करें. (१)
समिद्धो अग्निरश्विना तप्तो वां घर्म आ गतम्.
दुह्यन्ते नूनं वृषणेह धेनवो दस्रा मदन्ति वेधस:.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! अग्नि दीप्त हो गई है और उस पर तुम्हारे लिए आज्य तप्त हो चुका
है, इसीलिए तुम आ जाओ. हे अभिमत फल देने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे निमित्त प्रवर्ग्य
नामक कर्म में गाएं अधिक मात्रा में दुही जाती हैं इसलिए शत्रुओं का विनाश करने वाले तुम
अश्विनीकुमारों की स्तुतियों के द्वारा सेवा करते हुए होता प्रसन्न हो रहे हैं. (२)
स्वाहाकृत: शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपान:.
तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति.. (३)
दीप्त प्रवर्ग्ययाग अश्विनीकुमारों आदि देवों के निमित्त दिया गया है. अश्विनीकुमार चमस
के द्वारा उस का पान करते हैं. अश्विनीकुमारों के उसी चमस को सभी अमर देव प्रसन्न होते
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हुए आदित्य के मुख से चाटते हैं. (३)
यदुस्रियास्वाहुतं घृतं पयो ऽ यं स वामश्विना भाग आ गतम्.
माध्वी धर्तारा विदथस्य सत्पती तप्तं घर्मं पिबतं रोचने दिवः.. (४)
गोशाला में स्थित गायों में वर्तमान जो घृत का उत्पादक दूध है, वह यज्ञ के पात्र में डाल
दिया गया है. वह तुम दोनों का भाग है, इसीलिए आओ. हे मधु विद्या के ज्ञाता
अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ के धारण कर्ता हो. हे देवों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो!
द्युलोक के प्रकाशक अग्नि में तपाए हुए घी का पान करो. (४)
तप्तो वां घर्मो नक्षतु स्वहोता प्र वामध्वर्युश्चरतु पयस्वान्.
मधोर्दुग्धस्याश्विना तनाया वीतं पातं पयस उस्रियायाः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों होता के द्वारा भलीभांति स्तुति किए गए हो. तुम ठीक से
तपाए गए एवं विशाल पात्र में स्थित आज्य अर्थात् घी को प्राप्त करो. तुम्हारे लिए अध्वर्यु
नामक ऋत्विज् यज्ञ करे. इस के पश्चात दूध, घी आदि के द्वारा यज्ञ का विस्तार करने वाली
गाय के मधुर रस से युक्त दूध को तुम दोनों पियो. (५)
उप द्रव पयसा गोधुगोषमा घर्मे सिञ्च पय उस्रियायाः.
वि नाकमख्यत् सविता वरेण्यो ऽ नुप्रयाणमुषसो वि राजति.. (६)
हे गाय को दुहने वाले अध्वर्यु! तुम तपाए हुए दूध के साथ मेरे समीप आओ तथा गाय
के दूध को तपे हुए घी में डालो, जिस से सब के प्रेरक सविता देव स्वर्ग को प्रकाशित करें. वे
आदि उषा के गमन के पीछे विराजते हैं. (६)
उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्
श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (७)
मैं सरलता से दुही जाने योग्य इस गाय का आह्वान करता हूं. आई हुई इस गाय को
कल्याणमय हाथ वाला अध्वर्यु दुहे. सब के प्रेरक सविता देव हमें उत्तम दूध प्रदान करें. (७)
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा न्यागन्.
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धतां महते सौभगाय.. (८)
अपने बछड़े के लिए हुंकार करती हुई, धनों का पालन करने वाली तथा मन से अपने
बछड़े की कामना करती हुई गाय सभी प्रकार मेरे समीप आए. यह गाय अश्विनीकुमारों के
लिए दूध दे तथा हमारे सौभाग्य के हेतु अपने परिवार की वृद्धि करे. (८)
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्.
विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (९)
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हे अग्नि! सब के द्वारा सेवित एवं प्रसन्न मन वाला अतिथि सभी यजमानों के घरों में
आए तथा तुम्हारे विषय में मेरी भक्ति को जाने. हे अग्नि! तुम मुझ पर आक्रमण करने वाली
शत्रु सेनाओं को त्याग कर मेरे शत्रुओं का भोजन मेरे लिए लाओ. (९)
अग्ने शर्ध महते सौभाग्य तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु.
सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्वशत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि.. (१०)
हे अग्नि! तुम हमें धनधान्य देने के लिए कोमल मन वाले बनो. तुम्हारे प्रकाशित होते
हुए तेज उत्तम हों. तुम इस प्रकार की कृपा करो, जिस से हम पतिपत्नी दोनों एकमात्र
तुम्हारी सेवा करें. जो अपनेआप को हमारा शत्रु मानते हैं, उन के तेजों पर तुम आक्रमण
करो. (१०)
सूयवसाद् भगवती हि भूया अधावयं भगवन्तः स्याम.
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (११)
हे धर्मदुघा धेनु! तू उत्तम घास खाती हुई हमारे लिए सौभाग्यशालिनी हो, इस से हम भी
धन वाले बनें. तू सदा घास का भक्षण कर तथा शोभन भाग्य वाली बन. हे गाय! तू सर्वदा
घास खा तथा सभी ओर घूमती हुई निर्मल जल पी. (११)
सूक्त-७८ देवता—मंत्र में बताए गए
अपचितां लोहिनीनां कृष्णा मातेति शुश्रुम.
मुनेर्देवस्य मूलेन सर्वा विध्यामि ता अहम्.. (१)
हम ने ऐसा सुना है कि लाल रंग की गंडमालाओं को उत्पन्न करने वाली कृष्णा नाम की
राक्षसी है. इस प्रकार की बढ़ी हुई सभी गंडमालाओं को मैं द्योतमान अथर्वा ऋषि के द्वारा
बताए हुए बाण से विदीर्ण करता हूं. (१)
विध्याम्यासां प्रथमां विध्याम्युत मध्यमाम्.
इदं जघन्या मासाम छिन्द्वि स्तुकामिव.. (२)
दोष की दृष्टि से गंडमालाएं तीन प्रकार की हैं. उन्हीं का यहां वर्णन है. मैं इन पकी हुई
गंडमालाओं में से मुख्य गंडमाला को जानता हूं, जिस की चिकित्सा करना कठिन है. मैं बाण
से उसे फाड़ता हूं. दूसरे प्रकार की सुसाध्य अर्थात् सरलता से चिकित्सा के योग्य गंडमाला
मध्यमा है. मैं उसे भी फोड़ता हूं. इस समय मैं इन गंडमालाओं के मध्य उस को ऊन के धागे
के समान तोड़ता हूं, जिस की चिकित्सा थोड़े प्रयत्न से हो सकती है. (२)
त्राष्ट्रेणाहं वचसा वि त ईर्ष्याममीमदम्.
अथो यो मन्युष्टे पते तमु ते शमयामसि.. (३)
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हे ईर्ष्यायुक्त पुरुष! स्त्री के विषय में तेरा जो क्रोध है, उसे मैं त्वष्टा संबंधी मंत्र से दूर
करता हूं. हे इस के पति! तेरा जो क्रोध है उसे भी मैं शांत करता हूं. (३)
व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह.
तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वै.. (४)
हे व्रत के पालन कर्ता अग्नि! दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञकर्मों द्वारा सम्मानित तुम सभी
दिनों में प्रसन्न मन वाले हो कर हमारे घर में दीप्त बनो. हे जातवेद अग्नि! भलीभांति दीप्त
तुम्हारे चारों और हम पुत्र, पौत्र आदि के साथ बैठें. (४)
सूक्त-७९ देवता—गौ
प्रजावतीः सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः.
मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु.. (१)
हे गायो! तुम संतान से युक्त, शोभन घास वाले प्रदेश में घास चरती हो तथा सुख से
जल पीने योग्य तालाब आदि में जल पीती हो. तुम्हें कोई चोर न चुरा सके. बाघ आदि दुष्ट
पशु भी तुम्हें न खा सकें. ज्वर के देव रुद्र के आयुध तुम्हें त्याग दें. (१)
पदज्ञा स्थ रमतयः संहिता विश्वनाम्नीः.
उप मा देवीर्देवेभिरेत.
इमं गोष्ठमिदं सदो घृतेनास्मान्त्समुक्षत.. (२)
हे गायो! तुम अपनी सहचरी गायों के खुरों के चिह्नों को जानो. बछड़ों एवं दूसरी गायों
के साथ मिल कर तुम अनेक नामों वाली बनो. हे दीप्तिशालिनी धेनुओ! तुम देवों के सहित
मुझ पुष्टि के इच्छुक के समीप आओ तथा यहां आ कर मेरी गोशाला, घर एवं मुझ गृहस्वामी
को घी और दूध से सींचो. (२)
सूक्त-८० देवता—अपचित ओषधि आदि
आ सुस्रसः सुस्रसो असतीभ्यो असत्तराः.
सेहोररसतरा लवणाद् विक्लेदीयसीः.. (१)
अत्यधिक पीब टपकाने वाली और बाधा पहुंचाने वाले रोग के लक्षणों से भी अधिक
कष्ट पहुंचाने वाली गंडमालाएं सभी ओर से बहने वाली बनें. तात्पर्य यह है कि मंत्र तथा
ओषधि के प्रयोग से गंडमालाएं समाप्त हो जाएं. गंडमालाएं रुई से भी अधिक नीरस तथा
नमक से भी अधिक भीगने वाली बनें. (१)
या ग्रैव्या अपचितो ऽ थो या उपपक्ष्याः.
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विजाम्नि या अपचितः स्वयंस्स्रः.. (२)
जो गंडमालाएं गले में होती हैं, बगल में होती हैं और गोपनीय स्थानों में होती हैं, वे सब
बिना पकी हुई गंडमालाएं पक कर फूट जाएं. (२)
यः कीकसाः प्रशृणाति तलीद्यमवतिष्ठति.
निर्हास्तं सर्वं जाया्न्यं यः कश्च ककुदि श्रितः.. (३)
जो कष्टसाध्य राजयक्ष्मा रोग हड्डियों में व्याप्त होता है, जो अस्थियों के समीप वाले
मांस को सुखाता है, जो गरदन के ऊपर वाले भाग को पतला कर देता है तथा जो पत्नी के
निरंतर संभोग से उत्पन्न होता है, इन सभी प्रकार के क्षय रोगों को यह जड़ी नष्ट करे. (३)
पक्षी जाया्न्यः पतति स आविशति पूरुषम्.
तदक्षितस्य भेषजमुभयोः सुक्षतस्य च.. (४)
क्षय रोग पक्षी बन कर गिरता है तथा पुरुष में प्रवेश करता है. हम शरीर की सभी
धातुओं का शोषण करने वाले तथा शोषण न करने वाले दोनों प्रकार के रोगों को मंत्र और
ओषधि से दूर करते हैं. (४)
सूक्त-८१ देवता—इंद्र
विद्म वै ते जाया्न्य जानं यतो जाया्न्य जायसे.
कथं ह तत्र त्वं हनो यस्य कृण्मो हविर्गृहे.. (१)
हे क्षय रोग! हम तेरी उत्पत्ति के उस स्थान को जानते हैं, जहां से तू जन्म लेता है. तेरी
उत्पत्ति के स्थान को जानते हुए हम यजमान के घर में इंद्र आदि देवों के लिए तुझे देते हैं. (१)
धृषत् पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्.
माध्यन्दिने सवन आ वृषस्व रयिष्ठानो रयिमस्मासु धेहि.. (२)
हे शत्रुओं को दलित करने वाले इंद्र! द्रोण कलश में स्थित सोमरस का पान करो. हे शूर
एवं वृत्र का हनन करने वाले इंद्र! तुम धन संबंधी युद्धों के निमित्त अर्थात् हमें धन प्राप्त
कराने के लिए सोमपान करो. तुम हमारे माध्यंदिन यज्ञ में भरपेट सोमरस पियो. तुम धन के
अधिष्ठान हो, इसीलिए हमें धन प्रदान करो. (२)
सूक्त-८२ देवता—मरुत्
सांतपना इदं हविर्मरुतस्तज्जुजुष्टन. अस्माकोती रिशादसः.. (१)
हे संतपन अर्थात् सूर्य से संबंधित अथवा संताप के समय अर्थात् दोपहर में यज्ञ करने
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योग्य मरुतो! यह हवि तुम्हारे निमित्त बनाया गया है, इसीलिए इसे सेवन करो. शत्रुओं को
बाधा पहुंचाने वाले तुम हमारी रक्षा के लिए हवि का सेवन करो. (१)
यो नो मर्तो मरुतो दुर्हृणायुस्तिरश्चित्तानि वसवो जिघांसति.
द्रुहः पाशान् प्रति मुञ्चतां सस्तपिष्ठेन तपसा हन्तना तम्.. (२)
हे धन देने वाले मरुतो! जो दुष्ट मनुष्य हम से छिप कर हमारे मन को क्षुब्ध करता है,
वह शत्रु पापियों से द्रोह करने वाले वरुण के पाशों को धारण करे. हे मरुतो! हमें मारने की
इच्छा करने वाले मनुष्य को अपने आयुध से मार डालो. (२)
संवत्सरीणा मरुतः स्वर्का उरुक्षयाः सगणा मानुषासः.
ते अस्मत् पाशान् प्र मुञ्चन्त्वेनसः सांतपना मत्सरा मादयिष्णवः.. (३)
प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले, शोभन मंत्रों द्वारा स्तुत, विस्तृत आकाश के निवासी,
अपनेअपने संघों से युक्त, वर्षा के द्वारा सब के हितकारी, शत्रुओं को संताप देने वाले, प्रसन्न
होते हुए और सब को संतुष्ट करने वाले मरुत् पापों के कारण होने वाले दोष को हम से दूर
रखें. (३)
सूक्त-८३ देवता—अग्नि
वि ते मुञ्चामि रशनां वि योक्त्रं वि नियोजनम्. इहैव त्वमजस्र एध्यग्ने..
(१)
हे अग्नि देव! मैं तुम्हारे द्वारा निर्मित एवं रोगी के गलों को बांधने वाली रस्सी को
खोलता हूं. मैं रोगी की कमर को बांधने वाली तथा रोगी के पैरों को बांधने वाली रस्सियों को
खोलता हूं. हे अग्नि! इसी रुग्ण शरीर में तुम सदैव वृद्धि प्राप्त करो. (१)
अस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्ने युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन.
दीदिह्य १ स्मभ्यं द्रविणेह भद्रं प्रेमं वोचो हविर्दां देवतासु.. (२)
हे अग्नि देव! इस यजमान के लिए बल धारण करने वाले तुम को मैं देव संबंधी मंत्र के
द्वारा हवि वहन करने के लिए युक्त करता हूं. इस समय हमें धन एवं पुत्र आदि की प्राप्ति का
सुख प्रदान करो. हवि देने वाले इस यजमान के विषय में अग्नि, इंद्र आदि देवों को बताओ.
(२)
सूक्त-८४ देवता—अमावस्या
यत् ते देवा अकृण्वन् भागधेयममावास्ये संवसन्तो महित्वा.
तेना नो यज्ञं पिपृहि विश्ववारे रयिं नो धेहि सुभगे सुवीरम्.. (१)
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हे अमावस्या! तुम्हारे महत्त्व के कारण निवास करते हुए फल की कामना करने वाले
लोग तुम्हें हवि देते हैं. हमें वह फल प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. पूर्ण चंद्र से युक्त
पौर्णमासी पश्चिम दिशा में विजयी होती है तथा पूर्व दिशा में विजय प्राप्त करती है. (१)
अहमेवास्यमावास्या ३ मामा वसन्ति सुकृतो मयीमे.
मयि देवा उभये साध्याश्चेन्द्रज्येष्ठाः समगच्छन्त सर्वे.. (२)
मैं ही अमावस्या संबंधी देव हूं. शोभन कर्मों वाले देवयज्ञ योग्यता के कारण मुझ में
निवास करते हैं. साध्य और सिद्ध नामक दोनों प्रकार के इंद्र आदि देव मुझ से मिलते हैं. (२)
आगन् रात्री संगमनी वसूनामूर्जं पुष्टं वस्वावेशयन्ती.
अमावास्यायै हविषा विधेमोर्जं दुहाना पयसा न आगन्.. (३)
अमावस्या की रात्रि हमें धन प्रदान करने के निमित्त आए. वह हमें अन्न का रस, पोषण
और धन देती हुई आए. (३)
अमावास्ये न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (४)
हे अमावस्या! तेरे अतिरिक्त कोई भी देव इस समय वर्तमान समस्त साकार प्राणियों में
व्याप्त होने वाला नहीं है. हम जिस फल की कामना करते हुए तुम्हें हवि देते हैं, हमें वह फल
प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. (४)
सूक्त-८५ देवता—पौर्णमासी प्रजापति
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तादुन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय.
तस्यां देवैः संवसन्तो महित्वा नाकस्य पृष्ठे समिषा मदेम.. (१)
पूर्ण चंद्र से युक्त पौर्णमासी पश्चिम दिशा में विजयी होती है तथा पूर्व दिशा में विजय
प्राप्त करती है. यह आकाश के मध्य में भी सर्वोत्कृष्ट सिद्ध होती है. हम इस पौर्णमासी में
यज्ञ करने योग्य देवों के साथ महत्त्व से निवास करते हुए, स्वर्ग के ऊपरी भाग में अन्न के
साथ प्रसन्न हों. (१)
वृषभं वाजिनं वयं पौर्णमासं यजामहे.
स नो ददात्वक्षितां रयिमनुपदस्वतीम्.. (२)
हम अभिलषित फल देने वाले तथा अन्न धन से युक्त पौर्णमास पर्व का यज्ञ करते हैं.
पौर्णमास यज्ञ हमें विनाश रहित, शत्रुओं की बाधा से रहित एवं उपभोग करने पर भी क्षीण न
होने वाला धन दे. (२)
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प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (३)
हे प्रजापति! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी देव इस समय वर्तमान समस्त आकार के
प्राणियों में व्याप्त होने वाला नहीं है. हम जिस फल की कामना करते हुए तुम्हें हवि देते हैं,
हमें वह फल प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. (३)
पौर्णमासी प्रथमा यज्ञियासीदह्नां रात्रीणामतिशर्वरेषु.
ये त्वां यज्ञैर्यज्ञिये अर्धयन्त्यमी ते नाके सुकृतः प्रविष्टाः.. (४)
पौर्णमासी दिनों और रात्रियों में यज्ञ के योग्य प्रमुख तिथि है. पौर्णमासी सभी रात्रियों
और सोम आदि हवियों में उत्तम है. हे यज्ञ के योग्य पौर्णमासी! जो दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों
के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं, वे शोभन कर्मों वाले यजमान स्वर्ग में स्थित होते हैं. (४)
सूक्त-८६ देवता—सावित्री
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (१)
सूर्य और चंद्र आगेपीछे चलते हुए आकाश में साथसाथ गमन करते हैं. ये शिशु के रूप
में सागरों के पास जाते हैं. इन में से एक आदित्य अर्थात् सूर्य समस्त प्राणियों को देखता है
तथा दूसरा चंद्रमा ऋतुओं, मासों एवं पक्षों का निर्माण करता हुआ नवीन होता रहता है. (१)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२)
हे चंद्रमा! तू शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आदि तिथियों में उत्पन्न होता हुआ नवीन बनता है.
झंडे के समान दिनों का परिचय कराता हुआ तू रात्रियों के आगेआगे चलता है. हे चंद्रमा! इस
प्रकार ह्रास और वृद्धि के द्वारा पखवाड़े के अंत को प्राप्त हुआ तू हवि का विभाग करता है.
इस प्रकार तू दीर्घ आयु धारण करता है. (२)
सोमस्यांशो युधां पतेऽनूना नाम वा असि.
अनूनं दर्श मा कृधि प्रजया च धनेन च.. (३)
हे सोम अर्थात् चंद्रमा के अंश रूप पुत्र अर्थात् बुध एवं योद्धाओं के पालक! तुम सर्वदा
तेजस्वी हो, इसलिए हे द्रष्टव्य बुध! हवि के द्वारा तुम्हारी पूजा करने वाले मुझ को पुत्र आदि
प्रजा एवं धन से संपन्न बनाओ. (३)
दर्शो ऽ सि दर्शतो ऽ सि समग्रो ऽ सि समन्तः.
समग्रः समन्तो भूयासं गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन.. (४)
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हे चंद्र! तुम अमावस्या के साथ ही सूर्य के भी देखने योग्य हो. इस के बाद तृतीया आदि
तिथियों में भी तुम कला रूप से दिखाई देते हो. इस के पश्चात अष्टमी आदि तिथियों में इस से
भी अधिक स्पष्ट दिखाई देते हो. पौर्णमासी तिथि में तुम संपूर्ण कलाओं से युक्त हो जाते हो.
इसी प्रकार मैं भी गाय आदि से समृद्ध और संपूर्ण बनूं. (४)
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व.
आ वयं प्यासिषीमहि गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन.. (५)
हे सोम! जो शत्रु हम से द्वेष करता है अथवा जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, तुम उस
शत्रु के प्राणों का अपहरण करो. हम गायों, अश्वों, प्रजाओं, पशुओं, धनों और घरों से युक्त
हों. (५)
यं देवा अंशुमाप्याययन्ति यमक्षितमक्षिता भक्षयन्ति.
तेनास्मानिन्द्रो वरुणो बृहस्पतिरा प्याययन्तु भुवनस्य गोपा:.. (६)
जिस सोम को देवगण शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एकएक कला दे कर बढ़ाते हैं तथा जिस
सोम को संपूर्ण रूप में सभी दिनों में क्षीणता रहित पितर आदि पीते हैं. उस सोम के साथ
इंद्र, वरुण, बृहस्पति एवं सभी प्राणियों के रक्षक देव हवि आदि से प्रसन्न करने वाले हम को
बढ़ाएं. (६)
सूक्त-८७ देवता—अग्नि
अभ्यर्चत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त.
इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत् पवन्ताम्.. (१)
गायों के समूह आदि की दृष्टि से जिन की शोभन स्तुति की जाती है, उन अग्नि की
अर्चना करो. वह हमें भद्र धन प्रदान करें तथा हमारे इस यज्ञ में अन्य देवों को लाएं. इसलिए
घृत की मधुवर्ण धाराएं देवों को प्राप्त हों. (१)
मय्यग्रे अग्निं गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन.
मयि प्रजां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्.. (२)
मैं सब से पहले अरणि मंथन से उत्पन्न अग्नि को धारण करता हूं. मैं अग्नि को क्षत्रिय
संबंधी तेज, बल और सामर्थ्य के साथ हवि देता हूं. (२)
इहैवाग्ने अधि धारया रयिं मा त्वा नि क्रन् पूर्वचित्ता निकारिणः.
क्षत्रेणाग्ने सुयममस्तु तुभ्यमुपसत्ता वर्धतां ते अनिष्टतः.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी परिचर्या करने वाले हम हैं. हमें ही धन दो. हम से पहले जो लोग
तुम्हारे प्रति आकर्षित थे और हमारे अपकारी थे, वे तुम्हें स्वाधीन न बनाएं. हे अग्नि! तुम्हारा
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स्वरूप बल के साथ स्थिर हो, तुम्हारा परिचारक यह यजमान अपनी कामनाएं प्राप्त करे
तथा किसी से भी पराजित न हो. (३)
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः.
अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (४)
अग्नि देव प्रातःकाल के पूर्व से ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात
दिनभर प्रकाशित रहते हैं. ये सूर्यात्मक अग्नि प्रातःकाल के पश्चात व्यापक किरणों के द्वारा
प्रकाशित होते हैं. अग्नि का यह प्रकाश धरती और आकाश दोनों में प्रवेश कर के प्रकाशित
करता है. (४)
प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः.
प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (५)
अग्नि देव प्रातःकाल से पूर्व ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात
दिन भर प्रकाशित रहते हैं. अग्नि अनेक रूप से प्रवृत्त होने के कारण सूर्य की किरणों के रूप
में स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. इस प्रकार अग्नि देव धरती और आकाश में सभी जगह
प्रकाशित होते हैं. (५)
घृतं ते अग्ने दिव्ये सधस्थे घृतेन त्वां मनुरद्या समिन्धे.
घृतं ते देवीर्नप्त्य १ आ वहन्तु घृतं तुभ्यं दुहतां गावो अग्ने.. (६)
हे अग्नि! तुम से संबंधित हवि देवों के साथ उन के निवास स्थान अर्थात् स्वर्ग में है. इस
समय हम तुम्हें घृत के द्वारा भलीभांति तृप्त करते हैं. हे अग्नि! तुम्हें दिव्य जल प्राप्त हो तथा
गाएं तुम्हारे लिए घृत प्रदान करें. (६)
सूक्त-८८ देवता—वरुण
अप्सु ते राजन् वरुण गृहो हिरण्ययो मिथः.
ततो धृतव्रतो राजा सर्वा धामानि मुञ्चतु.. (१)
हे समस्त देवों के स्वामी वरुण! जलों के मध्य तुम्हारा स्वर्ण निर्मित निवास स्थान है,
जहां दूसरे नहीं पहुंच सकते. इस कारण सच्चे कर्मों वाले राजा वरुण हमारे शरीर के सभी
स्थानों को त्याग दें अर्थात् हमें जलोदर आदि रोग न हो. (१)
धाम्नोधाम्नो राजन्नितो वरुण मुञ्च नः.
यदापो अघ्न्या इति वरुणेति यदूचिम ततो वरुण मुञ्च नः.. (२)
हे राजा वरुण! इन सभी रोग स्थानों से हमें त्याग दो तथा उन से संबंधी पापों से हमें
बचाओ. हे जलों के स्वामी एवं हिंसा रहित वरुण! हम ने प्रसिद्ध देवों का नाम न ले कर जो
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पाप किया है, उस से भी हमें बचाओ. (२)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय.
अधा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (३)
हे वरुण! हमारे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित अपने पाश को शिथिल करो तथा हमारे
शरीर के मध्य भाग में स्थित अपने पाश को भी शिथिल करो. इस के पश्चात् हे अदिति पुत्र
वरुण! सभी पापों से छूट कर हम तुम्हारे कर्म में पापरहित होने के लिए सम्मिलित हों. (३)
प्रास्मत् पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् य उत्तमा अधमा वारुणा ये.
दुष्वप्न्यं दुरितं नि ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (४)
हे वरुण! तुम्हारे जो उत्तम और अधम पाप हैं, उन सब पापों से हमें छुड़ाओ. दुःस्वप्न में
होने वाले पाप को भी हम से दूर करो. पापहीन हो कर हम पुण्य के लोक में पहुंचें. (४)
सूक्त-८९ देवता—अग्नि, इंद्र
अनाधृष्यो जातवेदा अमर्त्यो विराडग्ने क्षत्रभृद् दीदिहीह.
विश्वा अमीवाः प्रमुञ्चन् मानुषीभिः शिवाभिरद्य परि पाहि नो गमय्.. (१)
हे अग्नि! कोई तुम्हें तनिक भी पराजित नहीं कर सकता. हे जातवेद! अमर, विराट्
और क्षत्र बल को धारण करने वाले वरुण हमारे इस यज्ञ स्थल में अतिशय दीप्त बनें तथा
सभी रोगों का विनाश कर के इस समय सभी मनुष्य संबंधी कल्याणों से हमारे घरों की रक्षा
करें. (१)
इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजो ऽ जायथा वृषभ चर्षणीनाम्.
अपानुदो जनममित्रायन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (२)
हे इंद्र! तुम कष्ट से त्राण करने वाले बल को धारण कर के उत्पन्न हुए हो. हे अभिमत
फल देने वाले! जो हम मनुष्यों की उत्पत्ति के पश्चात शत्रु के समान आचरण करता है, उस
को हम से दूर कर के तुम ने देवों के लिए स्वर्ग नाम का विस्तीर्ण लोक बनाया है. (२)
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगम्यात् परस्याः.
सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (३)
इंद्र बुरे चरणों वाले एवं पर्वत निवासी सिंह के समान भयानक हैं. वह अत्यधिक दूरवर्ती
आकाश से आएं. आने के पश्चात वे अपने गतिशील वज्र को भलीभांति तेज कर के हमारे
शत्रुओं को मारें तथा संग्राम के लिए उद्यत अन्य शत्रुओं का भी विनाश करें. (३)
सूक्त-९० देवता—गरुड़
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