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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 395

हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त हवि पक गया है. इसलिए तुम शीघ्र आओ. सूर्य अपने गंतव्य
मार्ग के मध्य भाग में पहुंच गए हैं अर्थात् दोपहर हो गया है. ऋत्विज् निचोड़े हुए सोमरस के
द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी उपासना कर रहे हैं, जिस प्रकार वंश के रक्षक पुत्र गृहपति की
उपासना करते हैं. (२)
सूक्त-७६ देवता—इंद्र
श्नातं मन्य ऊधनि श्नातमग्नौ सुशृतं मन्ये तदृतं नवीय:.
माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्न: पिबेन्द्र वज्रिन् पुरुकृज्जुषाण:.. (१)
हवि गाय के थनों में दूध के रूप में पका है और थनों से काढ़ा हुआ दूध अग्नि पर तपा
कर पकाया जाता है. मैं मानता हूं कि यह हवि भलीभांति पक चुका है, इसलिए यह हवि
सत्य एवं अधिक नवीन है. हे वज्रधारी एवं बहुत से कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्रसन्न होते हुए,
माध्यंदिन सवन अर्थात् यज्ञ में सोमरस से संबंधित दधिमिश्रित सोमरस नामक हवि का पान
करो. (१)
सूक्त-७७ देवता—अंगिरस
समिद्धो अग्निर्वृषणा रथी दिवस्तप्तो घर्मो दुह्यते वामिषे मधु.
वयं हि वां पुरूदमासो अश्विना हवामहे सधमादेषु कारव:.. (१)
हे मनचाहा फल देने वाले अश्विनीकुमारो! द्युलोक में स्थित देवों के रथी अग्नि देव दीप्त
हो चुके हैं. उस अग्नि से आज्य ठीक से पक गया है. इस के पश्चात तुम्हारे अन्न के हेतु मधुर
रस वाला दूध काढ़ा जाता है. तुम दोनों के स्तुतिकर्ता हम हवि से पूर्ण घरों वाले हों एवं यज्ञों
में तुम्हारा आह्वान करें. (१)
समिद्धो अग्निरश्विना तप्तो वां घर्म आ गतम्.
दुह्यन्ते नूनं वृषणेह धेनवो दस्रा मदन्ति वेधस:.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! अग्नि दीप्त हो गई है और उस पर तुम्हारे लिए आज्य तप्त हो चुका
है, इसीलिए तुम आ जाओ. हे अभिमत फल देने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारे निमित्त प्रवर्ग्य
नामक कर्म में गाएं अधिक मात्रा में दुही जाती हैं इसलिए शत्रुओं का विनाश करने वाले तुम
अश्विनीकुमारों की स्तुतियों के द्वारा सेवा करते हुए होता प्रसन्न हो रहे हैं. (२)
स्वाहाकृत: शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपान:.
तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति.. (३)
दीप्त प्रवर्ग्ययाग अश्विनीकुमारों आदि देवों के निमित्त दिया गया है. अश्विनीकुमार चमस
के द्वारा उस का पान करते हैं. अश्विनीकुमारों के उसी चमस को सभी अमर देव प्रसन्न होते
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