सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

योग्य मरुतो! यह हवि तुम्हारे निमित्त बनाया गया है, इसीलिए इसे सेवन करो. शत्रुओं को
बाधा पहुंचाने वाले तुम हमारी रक्षा के लिए हवि का सेवन करो. (१)
यो नो मर्तो मरुतो दुर्हृणायुस्तिरश्चित्तानि वसवो जिघांसति.
द्रुहः पाशान् प्रति मुञ्चतां सस्तपिष्ठेन तपसा हन्तना तम्.. (२)
हे धन देने वाले मरुतो! जो दुष्ट मनुष्य हम से छिप कर हमारे मन को क्षुब्ध करता है,
वह शत्रु पापियों से द्रोह करने वाले वरुण के पाशों को धारण करे. हे मरुतो! हमें मारने की
इच्छा करने वाले मनुष्य को अपने आयुध से मार डालो. (२)
संवत्सरीणा मरुतः स्वर्का उरुक्षयाः सगणा मानुषासः.
ते अस्मत् पाशान् प्र मुञ्चन्त्वेनसः सांतपना मत्सरा मादयिष्णवः.. (३)
प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले, शोभन मंत्रों द्वारा स्तुत, विस्तृत आकाश के निवासी,
अपनेअपने संघों से युक्त, वर्षा के द्वारा सब के हितकारी, शत्रुओं को संताप देने वाले, प्रसन्न
होते हुए और सब को संतुष्ट करने वाले मरुत् पापों के कारण होने वाले दोष को हम से दूर
रखें. (३)
सूक्त-८३ देवता—अग्नि
वि ते मुञ्चामि रशनां वि योक्त्रं वि नियोजनम्. इहैव त्वमजस्र एध्यग्ने..
(१)
हे अग्नि देव! मैं तुम्हारे द्वारा निर्मित एवं रोगी के गलों को बांधने वाली रस्सी को
खोलता हूं. मैं रोगी की कमर को बांधने वाली तथा रोगी के पैरों को बांधने वाली रस्सियों को
खोलता हूं. हे अग्नि! इसी रुग्ण शरीर में तुम सदैव वृद्धि प्राप्त करो. (१)
अस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्ने युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन.
दीदिह्य १ स्मभ्यं द्रविणेह भद्रं प्रेमं वोचो हविर्दां देवतासु.. (२)
हे अग्नि देव! इस यजमान के लिए बल धारण करने वाले तुम को मैं देव संबंधी मंत्र के
द्वारा हवि वहन करने के लिए युक्त करता हूं. इस समय हमें धन एवं पुत्र आदि की प्राप्ति का
सुख प्रदान करो. हवि देने वाले इस यजमान के विषय में अग्नि, इंद्र आदि देवों को बताओ.
(२)
सूक्त-८४ देवता—अमावस्या
यत् ते देवा अकृण्वन् भागधेयममावास्ये संवसन्तो महित्वा.
तेना नो यज्ञं पिपृहि विश्ववारे रयिं नो धेहि सुभगे सुवीरम्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*