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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८९ | ५९१

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७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८९ | ५९१

सहृदय है।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –

“ऐ सखि री, मैं अपना हृदय किसके पास खोलूँ – मुझे बोलना मना जो है। बिना किसी ऐसे को पाये जो मेरी व्यथा समझ सके, मैं तो मरी जा रही हूँ। केवल उसकी आँखों में आँखें डालकर मुझे अपने हृदय के प्रेमी का मिलन प्राप्त हो जायगा – परन्तु ऐसा तो कोई विरला ही होता है जो आनन्दसागर में निरन्तर बहता रहे।

“ये सब बाउलों (एक सम्प्रदाय) के गीत हैं।

“शाक्त मत में सिद्ध को कौल कहते हैं, वेदान्त के मत से परमहंस कहते हैं। बाउल-वैष्णवों के मत में साईं कहते हैं – साईं अन्तिम सीमा है।

“बाउल जब सिद्ध हो जाता है तब साईं होता है। तब सब अभेद हो जाता है। आधी माला गौ के हाड़ों की और आधी तुलसी की पहनता है। 'हिन्दुओं का नीर और मुसलमानों का पीर' बन जाता है।

“साईं जो होते हैं, वे अलख जगाया करते हैं। इसे वैदिक मत से ब्रह्म कहते हैं; वे लोग कहते हैं अलख। जीवों के सम्बन्ध में कहते हैं, अलख से आते हैं और अलख में जाते हैं। अर्थात् जीवात्मा अव्यक्त से आता है और अव्यक्त में ही लीन हो जाता है।

“वे लोग पूछते हैं, हवा की खबर जानते हो?

“अर्थात् कुण्डलिनी के जागने पर, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के भीतर से जो महावायु चढ़ती है उसकी खबर है?

“पूछते हैं, किस पैठ में हो? – छः पैठ – छहों चक्र हैं।

“अगर कोई कहे कि पांचवें में है, तो समझना चाहिए कि विशुद्ध चक्र तक मन की पहुँच है।

(मास्टर से) “तब निराकार के दर्शन होते हैं, जैसा गीत में है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ स्वर करके कह रहे हैं – “उसके ऊर्ध्व भाग में कमल आकाश है, उस आकाश के अवरुद्ध हो जाने पर सब कुछ आकाश हो जाता है।

“एक बाउल आया था। मैंने उससे पूछा, 'क्या तुम्हारा रस का काम हो गया? – कड़ाही उतर गयी?' रस को जितना ही जलाओगे, उतना ही Refine (साफ) होगा। पहले रहता है ईख का रस – फिर होती है राब – फिर उसे जलाओ – तो होती है चीनी – और फिर मिश्री। धीरे धीरे और भी साफ हो रहा है।

“कड़ाही कब उतरेगी, अर्थात् साधना की समाप्ति कब होगी? – जब इन्द्रियाँ जीत ली जायेंगी। जैसे जोंक पर नमक छोड़ने से वे आप ही छूटकर गिर जाती हैं वैसे ही इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जायेंगी। स्त्री के साथ रहता है, पर वह रमण नहीं करता।

“उनमें बहुत से लोग राधातन्त्र के मत से चलते हैं। पाँचों तत्त्व लेकर साधना करते

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५९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४

हैं – पृथ्वीतत्त्व, जलतत्त्व, अग्नितत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व, – मल, मूत्र, रज, वीर्य, ये सब तत्त्व ही हैं। ये साधनाएँ बड़ी घृणित हैं; जैसे पाखाने के भीतर से घर में प्रवेश करना।

“एक दिन मैं दालान में भोजन कर रहा था। घोषपाड़ा के मत का एक आदमी आया। आकर कहने लगा – ‘तुम स्वयं खाते हो या किसी को खिलाते हो?’ इसका यह अर्थ है जो सिद्ध होता है, वह अन्तर में ईश्वर देखता है।

“जो लोग इस मत से सिद्ध होते हैं, वे दूसरे मत के लोगों को ‘जीव’ कहते हैं। विजातीय मनुष्यों के सामने बातचीत नहीं करते। कहते हैं, यहाँ ‘जीव’ हैं!

“उस देश में मैंने इस मत को माननेवाली एक स्त्री देखी है। उसका नाम सरी (सरस्वती) पाथर है। इस मत के लोग आपस में एक दूसरे के यहाँ तो भोजन करते हैं, परन्तु दूसरे मत वालों के यहाँ नहीं खाते। मल्लिक घरानेवालों ने सरी पाथर के यहाँ तो भोजन किया, परन्तु हृदय के यहाँ नहीं खाया। कहते हैं, ये सब ‘जीव’ हैं! (सब हँसते हैं।)

“मैं एक दिन उसके यहाँ हृदय के साथ घूमने गया था। तुलसी के पेड़ खूब लगाये हैं। उसने चना-चिउड़ा दिया, मैंने थोड़ा सा खाया, हृदय तो बहुत सा खा गया – फिर बीमार भी पड़ा।

“वे लोग सिद्धावस्था को सहज अवस्था कहते हैं। एक दर्जे के आदमी हैं। वे ‘सहज सहज’ चिल्लाते फिरते हैं। वे सहज अवस्था के दो लक्षण बतलाते हैं। एक यह कि देह में कृष्ण की गन्ध भी न रहेगी और दूसरा यह कि पद्म पर भौंरा बैठेगा, परन्तु मधुपान न करेगा। कृष्ण की गन्ध भी न रह जायगी, इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के भाव सब अन्तर में ही रहेंगे, बाहर कोई लक्षण प्रकट न होगा – नाम का जप भी न करेगा। दूसरे का अर्थ है, कामिनी और कांचन की आसक्ति का त्याग – जितेन्द्रियता।

“वे लोग ठाकुर-पूजन, मूर्तिपूजन, यह सब पसन्द नहीं करते – जीता-जागता आदमी चाहते हैं। इसीलिए उनके दर्जे के आदमियों को कर्ताभजा कहते हैं। कर्ताभजा अर्थात् जो लोग कर्ता को – गुरु को ईश्वर समझते और इसी भाव से उनकी पूजा करते हैं।”

(२)

श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय

श्रीरामकृष्ण – देखा, कितने तरह के मत हैं। जितने मत उतने पथ। अनन्त मत हैं और अनन्त पथ हैं।

भवनाथ – अब उपाय क्या है?