श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६७
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संस्कृत नहीं बोल सकता।
“उन्हें प्राप्त करना, यही जीवन का उद्देश्य है। लक्ष्य-भेद के समय अर्जुन ने कहा, मुझे और कुछ नहीं दीख पड़ता – केवल चिड़िया की आँख देख रहा हूँ, न राजाओं को देखता हूँ, न पेड़, यहाँ तक कि चिड़िया को भी नहीं देख रहा हूँ।
“उन्हें पाने ही से काम हो गया! – संस्कृत न पढ़ी तो क्या हुआ है?
“उनकी कृपा पण्डित, मूर्ख और सब बच्चों पर है – जो उनको पाने के लिए व्याकुल हो। पिता का स्नेह सब पर बराबर है।
“पिता के पाँच लड़के हैं, उनमें एक-दो बाबूजी कहकर पुकार सकते हैं। कोई बा कहकर पुकारता है। कोई पा कहता है, पूरा पूरा उच्चारण नहीं कर सकता। जो बाबूजी कहता है, उस पर क्या बाप का प्यार ज्यादा होगा और जो पा कहकर पुकारता है, उस पर कम? बाप जानता है, यह छोटा बच्चा अभी साफ बाबूजी नहीं कह सकता।
“हाथ टूटने के बाद से एक अवस्था बदल रही है। नरलीला की ओर मन बहुत जा रहा है। वे ही आदमी बनकर खेल रहे हैं।
“मिट्टी की मूर्ति में तो उनकी पूजा होती है और मनुष्यों में नहीं हो सकती?
“एक सौदागर, लंका के पास जहाज के डूब जाने से, लंका के तट पर बहकर लग गया। विभीषण के आदमी उसकी आज्ञा पा उस आदमी को विभीषण के पास ले गये। ‘अहा! मेरे रामचन्द्र जैसी इसकी मूर्ति है। वही नर-रूप!’ यह कहकर विभीषण आनन्द मनाने लगे। उस आदमी को तरह तरह के कपड़े पहनाकर उसकी पूजा-आरती की!
“यह बात जब मैंने पहले पहल सुनी थी, तब मुझे इतना आनन्द हुआ था जिसका ठिकाना नहीं।
“वैष्णवचरण से पूछने पर उसने कहा, जो जिसे प्यार करता है, उसे इष्ट मानने पर ईश्वर पर शीघ्र ही मन लग जाता है। ‘तू किसे प्यार करता है?’ – ‘अमुक को।’ ‘तो उसे ही अपना इष्ट मान।’ उस देश में (कामारपुकुर, श्यामबाजार में) मैंने, कहा – ‘इस तरह का मत मेरा नहीं है – मेरा मातृ-भाव है। देखा, बातें तो बड़ी लम्बी-चौड़ी करते हैं और उधर व्यभिचार भी करते हैं। औरतों ने पूछा – क्या हम लोगों की मुक्ति न होगी? मैंने कहा – होगी अगर एक ही पर भगवद्दृष्टि से निष्ठा रहेगी। पाँच मर्दों के साथ रहने से न होगी।”
राम – केदार शायद कर्ताभाजावालों (एक सम्प्रदाय) के यहाँ गये थे।
श्रीरामकृष्ण – वह पाँच तरह के फूलों से मधु लिया करता है।
(राम, नित्यगोपाल आदि से) – “यही मेरे इष्ट हैं, इस तरह का जब सोलहों आना विश्वास हो जायेगा, तब ईश्वर मिलेंगे – तब उनके दर्शन होंगे।
“पहले के आदमियों में विश्वास बहुत होता था। हलधारी के बाप को बड़ा पक्का
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विश्वास था!
“वह अपनी लड़की की ससुराल जा रहा था। रास्ते में बेल खूब फूल रहे थे और बेल के अच्छे दल भी उसे दीख पड़े। श्रीठाकुरजी की सेवा करने के लिए फूल और बेलपत्र लेकर उल्टे पाँव तीन कोस जमीन अपने घर लौट आया!
“रामलीला हो रही थी। कैकेयी ने राम को वनवास की आज्ञा दी। हलधारी का बाप भी रामलीला देखने गया था। वह बिलकुल उठकर खड़ा हो गया। जो कैकेयी बना था उसके पास पहुँचकर कहा – 'अभागिन्!' यह कहकर उसने उसके मुँह में दीया लगा देना चाहा!
“नहाने के बाद जब पानी में खड़ा होकर 'रक्तवर्णं चतुर्मुखम्' कहकर ध्यान करता था, तब उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह चलती थी।
“मेरे पिता जब खड़ाऊ पहनकर रास्ते पर चलते थे तब गाँव के दूकानदार उठकर खड़े हो जाते थे। कहते, वे आ रहे हैं!
“जब वे हलदार तालाब में नहाते थे, तब वहाँ कोई नहाने जाय, ऐसी हिम्मत किसी में न थी। लोग खबर रखते, वे नहाकर गये या नहीं।
“रघुवीर रघुवीर कहते कहते उनकी छाती लाल हो जाती थी।
“मुझे भी ऐसा ही होता था। वृन्दावन में गौओं को चरकर लौटते हुए देखकर, भाव से शरीर की वैसी ही दशा हो गयी थी।
“तब के आदमियों में बड़ा विश्वास था। ऐसी बात भी सुनने में आती है कि भगवान काली के रूप में नाच रहे हैं और साधक तालियाँ बजा रहे हैं।”
पंचवटी के कमरे में एक हठयोगी आये हुए हैं। एँड़ेदा के कृष्णकिशोर के पुत्र रामप्रसन्न और दूसरे भी कई आदमी उन हठयोगी पर बड़ी भक्ति रखते हैं। परन्तु उनके अफीम और दूध के लिए हर महीने पच्चीस रुपये का खर्च होता है। रामप्रसन्न ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'आपके यहाँ तो कितने भक्त आते हैं, उनसे कुछ कह दीजियेगा; हठयोगी के लिए कुछ रुपये मिल जायँगे।'
श्रीरामकृष्ण ने कुछ भक्तों से कहा, “पंचवटी में जाकर हठयोगी को देखो, कैसा आदमी है।”
(२)
ठाकुरदादा अपने दो-एक मित्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के पास आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। उम्र २७-२८ होगी। वराहनगर में रहते हैं। ब्राह्मण पण्डित के लड़के हैं। कथाएँ कहने का अभ्यास कर रहे हैं। अब संसार का भार ऊपर आ पड़ा है। कुछ दिन के लिए विरागी होकर घर से निकल गये थे। साधन-भजन अब भी करते हैं।
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