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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

परिच्छेद २

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परिच्छेद २

द्वितीय दर्शन

(१)

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

द्वितीय दर्शन का प्रसंग। सुबह का समय था, – आठ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण उस समय दाढ़ी बनवाने की तैयारी में थे। तब भी थोड़ी ठण्डी थी। इसलिए वे शरीर पर गरम किनारीदार शाल ओढ़े हुए थे। मास्टर को देखकर उन्होंने कहा, “तुम आए हो? अच्छा, यहाँ बैठो।”

यह वार्तालाप श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण-पूर्व बरामदे में हो रहा था। नाई आया हुआ था। श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में बैठकर दाढ़ी बनवाने लगे। बीच बीच में वे मास्टर के साथ बातचीत कर रहे थे। शरीर पर शाल थी, पैर में जूतियाँ। सहास्यवदन थे। बात करते समय कुछ तुतलाते थे।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, तुम्हारा घर कहाँ है?
मास्टर – जी कलकत्ते में।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ कहाँ आए हो?
मास्टर – यहाँ वराहनगर में बड़ी दीदी के घर आया हूँ, – ईशान कविराज के यहाँ।
श्रीरामकृष्ण – ओहो, ईशान के यहाँ।

श्री केशवचन्द्र सेन के लिए श्रीरामकृष्ण का जगन्माता के पास रोना।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, केशव अब कैसा है – बहुत बीमार था।
मास्टर – जी हाँ, मैंने भी सुना था कि बीमार हैं, पर अब शायद अच्छे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैंने तो केशव के लिए माँ के निकट नारियल और चीनी की पूजा मानी थी। रात को जब नींद उचट जाती थी, तब माँ के पास रोता और कहता था, – 'माँ, केशव की बीमारी अच्छी कर दे। केशव अगर न रहा तो मैं कलकत्ते जाकर बातचीत किससे करूँगा?' इसी से तो नारियल-चीनी मानी थी।