श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
यद्यत्स्त्रीशरीरं पुरुषशरीरं नपुंसक- | जिस स्त्रीशरीर, पुरुषशरीर अथवा
शरीरं वादत्ते तेन तेन स च | नपुंसकशरीरको धारण करता है उसी-उसीसे यह विज्ञानात्मा रक्षित-
विज्ञानात्मा रक्ष्यते संरक्ष्यते | सुरक्षित रहता है, अर्थात् उसी-उसी
तत्तद्धर्मानात्मन्यध्यस्याभिमन्यते | शरीरके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर ऐसा मानने लगता है कि 'मैं
स्थूलोऽहं कृशोऽहं पुमानहं स्त्र्यहं | स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं
नपुंसकोऽहमिति ॥१०॥ | स्त्री हूँ, मैं नपुंसक हूँ' इत्यादि ॥१०॥
जीवको कर्मोंके अनुसार विविध देहकी प्राप्तिका निर्देश
केन तर्ह्यसौ शरीराण्यादत्ते ? | तो फिर यह किस कारणसे शरीर धारण करता है ? सो बतलाते हैं—
इत्याह—
सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहै-
र्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म ।
कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही
स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥११॥
जिस प्रकार अन्न और जलके सेवनसे शरीरकी वृद्धि होती है वैसे
ही संकल्प, स्पर्श, दर्शन और मोहसे [ कर्म होते हैं। फिर ] यह देही
क्रमशः [ विभिन्न ] योनियोंमें जाकर उन कर्मोंके अनुसार रूप धारण
करता है ॥११॥
सङ्कल्पनेति । प्रथमं सङ्कल्प- | 'सङ्कल्पन०' इत्यादि । पहले
नम् । ततः स्पर्शनं त्वगिन्द्रिय- | संकल्प होता है, फिर स्पर्श यानी त्वगिन्द्रियका व्यापार होता है,
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
व्यापारः । ततो दृष्टिविधानम् । | तत्पश्चात् दृष्टि जाती है, उससे
ततो मोहः । तैः सङ्कल्पनस्पर्शन- | पीछे मोह होता है । उन संकल्प,
दृष्टिमोहैः शुभाशुभानि कर्माणि | स्पर्श, दर्शन और मोहसे शुभाशुभ
निष्पद्यन्ते । ततः कर्मानुगानि | कर्म सम्पन्न होते हैं । फिर कर्मानुगत
कर्मानुसारिणी स्त्रीपुंनपुंसकलक्ष- | यानी कर्मोंके अनुसार अनुक्रमसे—
णान्यनुक्रमेण परिपाकापेक्षया | कर्मविपाककी अपेक्षासे यह देही—
देही मर्त्यः स्थानेषु देवतिर्यङ्क- | जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि
नुष्यादिष्वभिसंप्रपद्यते । तत्र | रूपोंको देवता, तिर्यक् एवं मनुष्यादि
दृष्टान्तमाह—ग्रासाम्बुनोरन्नपान- | स्थानों ( योनियों ) में प्राप्त करता
योरनियतयोर्वृष्टिरासेचनं निदान- | है । उसमें दृष्टान्त देते हैं—जिस
मात्मनः शरीरस्य वृद्धिजायते | प्रकार ग्रास और अम्बु यानी अनियत
यथा तद्वदित्यर्थः ॥११॥ | अन्न और जलकी वृष्टि—उनका सम्यक्
| सेचन आत्माका निदान है अर्थात्
| उससे शरीरकी वृद्धि होती है उसी
| प्रकार [जीवको कर्मोंके द्वारा तदनुकूल
| शरीरोंकी प्राप्ति होती है ]—ऐसा
| इसका अभिप्राय है ॥११॥
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव
रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति ।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां
संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥
जीव अपने गुणों ( पाप-पुण्यों ) के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म बहुतसे देह
धारण करता है । फिर उन ( शरीरों ) के कर्मफल और मानसिक
संस्कारोंके द्वारा उनके संयोग ( देहान्तरप्राप्ति ) का दूसरा हेतु भी देखा
गया है ॥ १२ ॥