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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

Page 192Permalink

१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
अजामेकामिति । अजां प्रकृतिं | 'अजामेकाम्' इत्यादि । सरूपा
लोहितशुक्लकृष्णां तेजोऽबन्नलक्षणां | —एक समान आकारवाली बहुत-
बह्वीः प्रजाः सृजमानामुत्पाद- | सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली लोहित-
यन्तीं ध्यानयोगानुगतदृष्टां देवा- | शुक्ल-कृष्णा—तेज, अप् और अन्न-
त्मशक्तिं वा सरूपाः समानाकारा | रूपा अजा—प्रकृतिको अथवा ध्यान-
अजो ह्येको विज्ञानात्मानादिकाम- | योगमें स्थित ब्रह्मवादियोंद्वारा देखी
कर्मविनाशितः स्वयमात्मानं | गयी देवात्मशक्तिको एक अज--
| विज्ञानात्मा, जो अनादि काम और
| कर्मद्वारा स्वरूपसे भ्रष्ट कर दिया
मन्यमानो जुषमाणः सेवमानो- | गया है, इस प्रकृतिको ही अपना
ऽनुशेते भजते । अन्य आचार्योप- | स्वरूप मानकर सेवन करता हुआ
देशप्रकाशावसादिताविद्यान्धकारो | भोगता है और दूसरा गुरुदेवके
जहाति त्यजति ॥ ५ ॥ | उपदेशरूप प्रकाशसे अविद्यान्धकार-
| के नष्ट हो जानेके कारण इसे छोड़
| देता है ॥ ५ ॥
जीव और ईश्वरकी विलक्षणता
इदानीं सूत्रभूतौ परमार्थ- | अब परमार्थतत्त्वका निश्चय
वस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्येते— | करानेके लिये दो सूत्रभूत मन्त्रोंका
| उल्लेख किया जाता है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥
सदा परस्पर मिलकर रहनेवाले दो सखा ( समान नामवाले )
सुपर्ण ( सुन्दर गतिवाले पक्षी ) एक ही वृक्षको आश्रित किये हुए हैं ।