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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

ज्ञानस्वरूपमखिलं | इस सम्पूर्ण ज्ञानस्वरूप जगत्‌को
जगदेतद्बुद्धयः । | अर्थस्वरूप देखनेवाले बुद्धिहीन
अर्थस्वरूपं पश्यन्तो | पुरुषोंको मोहरूप महासागरमें
भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे ॥ | भटकना पड़ता है । किन्तु जो
ये तु ज्ञानविदः शुद्ध- | शुद्धचित्त ज्ञानीलोग हैं वे इस
चेतसस्तेऽखिलं जगत् । | सम्पूर्ण जगत्‌को आप परमात्माका
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति | ज्ञानमय स्वरूप ही देखते हैं ।”
त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥” | “जिसका ऐसा निश्चय है कि 'मैं
(१।४।३८-४१) | तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन
“अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो | श्रीहरि ही हैं उनसे भिन्न कोई भी
नान्यत्ततः कारणकार्यजातम् । | कार्य-कारणवर्ग नहीं है, उस पुरुषको
ईदृङ्मनो यस्य न तस्य भूयो | फिर सांसारिक राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप
भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥” | रोग नहीं होते ।”
(१।२२।८७) |
“ज्ञानस्वरूपमत्यन्तं | “जो परमार्थतः ( वास्तवमें )
निर्मलं परमार्थतः । | अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप परमात्मा है
तदेवार्थस्वरूपेण | वही अज्ञान-दृष्टिसे विभिन्न पदार्थोंके
भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥” | रूपमें प्रतीत हो रहा है ।” “वे विश्व-
(१।२।६) | मूर्ति भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, पदार्थाकार
“ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा- | नहीं हैं, इसलिये इन पर्वत, समुद्र
वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः । | और पृथिवी आदि विभिन्न पदार्थोंको
ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा- | तुम विज्ञानका ही विलास जानो ।”
ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ | “हे द्विज ! क्या घट-पटादि कोई भी
(२।१२।३९) | ऐसी वस्तु है जो आदि, मध्य और
वस्त्वस्ति किं कुत्राचिदादिमध्य- | अन्तसे रहित एवं सर्वदा एक रूपमें
पर्यन्तहीनं सततैकरूपम् । | ही रहनेवाली हो । पृथिवीपर जो
यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूमौ | वस्तु बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं