श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं
यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितार-
मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
उस [ पुरुषयुक्त जगत् ] से परे जो ब्रह्म-हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट एवं
महान् है, जो समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरके अनुसार (परिच्छिन्नरूपसे)
छिपा हुआ है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है उस परमेश्वरको जानकर
जीवगण अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
[संस्कृत भाष्यम्]
ततः परमिति । ततः पुरुष-
युक्ताज्जगतः परं कारणत्वात्कार्य-
भूतस्य प्रपञ्चस्य व्यापकमित्यर्थः ।
अथवा ततो जगदात्मनो विराजः
परम् । किं तद्ब्रह्मपरं बृहन्तं
ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परं बृहन्तं
महद्व्यापित्वात् । यथानिकायं
यथाशरीरं सर्वभूतेषु गूढमन्तर-
वस्थितं विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
सर्वमन्तः कृत्वा स्वात्मना सर्वं
व्याप्यावस्थितमीशं परमेश्वरं
ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
[भाष्यार्थ]
'ततः परम्' इत्यादि । जो उससे यानी पुरुषयुक्त जगत्से परे
है अर्थात् कारण होनेसे अपने कार्य-
भूत जगत्में व्यापक है, अथवा जो
उससे—जगद्रूप विराट्स परे है,
वह क्या है ? इसके उत्तरमें श्रुति
कहती है—ब्रह्मपरं बृहन्तम् । जो
ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भरूप कार्यब्रह्म-
से पर और व्यापक होनेके कारण
बृहत्—महान् है। तथा जो समस्त
प्राणियोंमें यथानिकाय—उनके शरीर-
के अनुसार गूढ—अन्तःस्थित है,
एवं विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है
अर्थात् सबको अपने भीतर करके—
अपने स्वरूपसे सबको व्याप्त करके
स्थित है। उस ईश—परमेश्वरको
जानकर जीव अमर हो जाते हैं ॥७॥