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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"न कर्मणा न प्रजया धनेन | नहीं, किन्हीं-किन्हींने त्यागसे ही
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः" (कैव० | अमरत्व प्राप्त किया है", "जिनपर
३)। "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञ- | ज्ञानकी अपेक्षा निकृष्ट श्रेणीका कर्म
रूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। | अवलम्बित कहा गया है वे [सोलह
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा | ऋत्विक्, यजमान और यजमानपत्नी-]
जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति" | ये यज्ञके अठारह रूप अस्थिर एवं
(मु० उ० १ । २ । ७)। "ना- | नाशवान् हैं; जो मूढ 'यही श्रेय है'
स्तकृतः कृतेन” (मु० उ० १ । | ऐसा मानकर प्रसन्न होते हैं वे फिर भी
२ । १२)। | जरा-मरणको प्राप्त होते हैं।" "इस
"कर्मणा बध्यते जन्तु- | संसारमें कोई नित्य पदार्थ नहीं है,
र्विद्यया च विमुच्यते। | अतः [अनित्य फलके साधक]
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | कर्मसे हमें क्या प्रयोजन है?"
यतयः पारदर्शिनः ॥" | [अब स्मृतिका विरोध दिखलाते
“अज्ञानमलपूर्णत्वात् | हैं-] "जीव कर्मसे बँधता है और
पुराणो मलिनः स्मृतः । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसीसे
तत्क्षयाद्वै भवेन्मुक्ति- | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते",
र्नान्यथा कर्मकोटिभिः ॥" | "अज्ञानरूपी मलसे पूर्ण होनेके
“प्रजया कर्मणा मुक्ति- | कारण यह पुरातन जीव मलिन
र्धनेन च सतां न हि। | माना जाता है, उस मलका क्षय
त्यागेनैकेन मुक्तिः स्या- | होनेसे ही इसकी मुक्ति होती है,
त्तदभावे भ्रमन्त्यहो ॥" | अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी इसका
“कर्मोदये कर्मफलानुरागा- | छुटकारा नहीं हो सकता",
स्तथानुयन्ति न तरन्ति मृत्युम् ।" | "सत्पुरुषोंकी मुक्ति प्रजा, कर्म अथवा
धनसे नहीं होती, एकमात्र त्यागसे
ही होती है; त्याग न होनेपर तो वे
भटकते ही रहते हैं", "कर्मका
उदय होनेपर उसके फलमें अनुराग
होता है, अतः उसीका अनुगमन
करते हैं, मृत्युको पार नहीं कर पाते,"