श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
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हंसः परमहंसश्च | पीछेवाला है वह-वह उत्तरोत्तर उत्तम
यो यः पश्चात्स उत्तमः ॥" | है" ऐसी स्मृति भी है । उन
इति स्मरणाच्च । तेभ्योऽत्या- | अत्याश्रिमियोंको उस प्रकृत परब्रह्मका
श्रमिभ्यः परं प्रकृतं ब्रह्म तदेव | अर्थात् उस उत्कृष्टतम—सम्पूर्ण
परमुत्कृष्टतमं निरस्तसमस्ता- | अविद्या और उसके कार्यसे रहित
विद्यातत्कार्यनिरतिशयसुखैकरसं | निरतिशय-सुखैकरसस्वरूप पवित्र—
पवित्रं शुद्धं प्रकृतिप्राकृतादिमल- | शुद्ध यानी प्रकृति और प्रकृतिके
विनिर्मुक्तम् । ऋषिसंघजुष्टं वाम- | कार्य आदि मलसे रहित ब्रह्मका,
देवसनकादीनां संघैः समूहैर्जुष्टं | जो ऋषिसंघजुष्ट यानी वामदेव एवं
सेवितमात्मत्वेन सम्यक्परिभावितं | सनकादि ऋषियोंके समूहसे जुष्ट—
प्रियतमानन्दत्वेनाश्रितम् । "आ- | सेवित अर्थात् आत्मभावसे सम्यक्
त्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" | प्रकारसे भावना किया हुआ यानी
(बृह० उ० ४ । ५ । ६) इति | प्रियतम आनन्दरूपसे आश्रित है,
श्रुतेः । सम्यगात्मतयापरोक्षीकृतं | क्योंकि श्रुति भी कहती है "आत्मा-
यथा भवति तथा । सम्यगित्यस्य | के लिये ही सब कुछ प्रिय होता
काकाक्षिन्यायेनोभयत्रानुषङ्गः | है," [ अतः ऐसे ब्रह्मका ] जिस
कर्तव्यः । प्रोवाचोक्तवान् ॥२१॥ | प्रकार वह आत्मस्वरूपसे पूर्णतया
प्रत्यक्ष हो सके उस प्रकार उपदेश
किया । श्रुतिके 'सम्यक्' पदका
काकाक्षिन्यायसे 'प्रोवाच' और
'जुष्टम्' दोनों पदोंके साथ सम्बन्ध
समझना चाहिये ॥२१॥
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अनधिकारिके प्रति विद्योपदेशका निषेध
यथोक्तशिष्यपरीक्षणपूर्वकं | इस विद्याका उपर्युक्त प्रकारके
| शिष्यकी परीक्षा करके उपदेश
विद्या वक्तव्या तद्विहाय तदुक्तौ | करना चाहिये । उसे छोड़-