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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः
पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः ।
सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको
गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥
जगत्का कारणभूत जो परमात्मा [ प्रत्येक वस्तुके ] स्वभावको
निष्पन्न करता है, जो पाच्यों ( परिणामयोग्य पदार्थों ) को परिणत करता
है, जो अकेला ही इस सम्पूर्ण विश्वका नियमन करता है, और जो [सत्त्वादि]
समस्त गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है [ वह परब्रह्म है ] ॥५॥

संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
यच्च स्वभावमिति । यच्च'यच्च स्वभावम्' इत्यादि । [ यहाँ
यश्चेति लिङ्गव्यत्ययः । स्वभावंवैदिक-प्रक्रियानुसार ] 'यश्च' इस
यदग्नेरौष्ण्यं पचति निष्पादयतिपुँल्लिङ्गके स्थानमें 'यच्च' इस प्रकार
विश्वस्य जगतो योनिः । पाच्यांश्चलिङ्गव्यत्यय हुआ है। जो स्वभावको
पाकयोग्यान्पृथिव्यादीन्परिणाम-यानी अग्निके उष्णत्वको पचाता-निष्पन्न
येद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठतिकरता है, विश्व-जगत्का कारण है
नियमयत्येकः । गुणांश्च सत्त्वरज-और पाच्य यानी पाक (परिणाम) योग्य
स्तमोरूपान्विनियोजयेद्यः । एवं-पृथिवी आदिका परिणाम करता है,
लक्षणः ॥५॥जो अकेला इस सम्पूर्ण विश्वको
अधिष्ठित—नियमित करता है तथा
जो सत्त्व, रज एवं तमोरूप गुणोंको
नियुक्त करता है—ऐसे लक्षणोंवाला
परमात्मा है ॥५॥

किञ्च— | तथा—
तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं
तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् ।

२१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
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ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदु-
स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥
वह वेदोंके गुह्यभाग उपनिषदोंमें निहित है, उस वेदवेद्य परमात्माको
ब्रह्मा जानता है। जो पुरातन देव और ऋषिगण उसे जानते थे वे तद्रूप
होकर अमर ही हो गये थे ॥ ६ ॥
तदिति। तत्प्रकृतमात्मस्वरूपं | 'तद्वेद' इत्यादि । उस प्रकृत
वेदानां गुह्योपनिषदो वेदगुह्योप- | आत्माका स्वरूप वेदोंके गुह्यभाग जो
निषदस्तासु वेदगुह्योपनिषत्सु | उपनिषद् हैं उन वेदगुह्योपनिषदोंमें
गूढं संवृतम्। ब्रह्मा हिरण्यगर्भो | गूढ—छिपा हुआ है। उस ब्रह्मयोनि
वेदते जानाति ब्रह्मयोनिं वेद- | यानी वेदप्रमाणक् आत्माको ब्रह्मा
प्रमाणकमित्यर्थः। अथवा ब्रह्मणो | जानता है, अथवा ब्रह्म यानी हिरण्य-
हिरण्यगर्भस्य योनिं वेदस्य वा | गर्भके कारण अथवा वेदके कारणभूत
ये पूर्वदेवा रुद्रादय ऋषयश्च | उस आत्माको जो रुद्रादि पूर्वदेव
वामदेवादयस्तद्विदुस्ते तन्मया- | और वामदेवादि ऋषिगण जानते थे
स्तदात्मभूताः सन्तोऽमृता अम- | वे तन्मय—तत्स्वरूप होकर अमृत—
रणधर्माणो बभूवुः। तथेदानी- | अमरणधर्मा हो गये । इसी प्रकार
न्तनोऽपि तमेव विदित्वामृतो | आधुनिक पुरुष भी उसे जानकर
भवतीति वाक्यशेषः ॥ ६ ॥ | अमर हो जाता है—यह वाक्य-
| शेष है ॥६॥
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कर्तृत्वादि धर्मोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपका वर्णन
एतावता तत्पदार्थ उपवर्णितः। | इतने ग्रन्थसे तत्पदार्थका वर्णन
अथेदानीं त्वंपदार्थमुपवर्णयितु- | किया गया। अब यहाँसे त्वंपदार्थ-
| का निरूपण करनेके लिये आगेके
मुत्तरे मन्त्राः प्रस्तूयन्ते— | मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं—