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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
तथा चौपाधिकमेव भेदं | इसी प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य
भेदस्यौ- दर्शयति भगवान् | भी इनका औपाधिक भेद ही
पाधिकत्वम् याज्ञवल्क्यः— | दिखलाते हैं—“जिस प्रकार घटादि-
“आकाशमेकं हि यथा | में एक ही आकाश भिन्न-भिन्न हो
घटादिषु पृथग्भवेत् । | जाता है उसी प्रकार एक ही आत्मा
तथात्मैको ह्यनेकश्च | जलाशयोंमें सूर्यके समान भिन्न-भिन्न
जलाधारेष्विवांशुमान् ॥” | प्रतीत हो रहा है ।”
( याज्ञ० ३ । १४४) |
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | श्रीविष्णुधर्मोत्तरेमें भी ऐसा ही
“परात्मनोर्मनुष्येन्द्र | कहा है—“राजन् ! परमात्मा और
विभागोऽज्ञानकल्पितः । | जीवात्माका भेद अज्ञानकल्पित है;
क्षये तस्यात्मपरयो- | अज्ञानका नाश हो जानेपर आत्मा
र्विभागाभाव एव हि ॥ | और परमात्माके भेदका अभाव ही
आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञोऽयं | सिद्ध होता है । यह क्षेत्रज्ञसंज्ञक
संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । | जीवात्मा प्रकृतिके गुणोंसे युक्त है
तैरेव विगतः शुद्धः | और उन्हींसे रहित होनेपर यह शुद्ध-
परमात्मा निगद्यते ॥ | स्वरूप परमात्मा कहा जाता है ।
अनादिसंबन्धवत्या | यह क्षेत्रज्ञ अपनेसे अनादिकालसे
क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । | सम्बन्ध रखनेवाली अविद्यासे युक्त
युक्तः पश्यति भेदेन | होनेसे ही अपनेमें स्थित ब्रह्मको
ब्रह्म त्वात्मनि संस्थितम्॥” | भेदभावसे देखता है ।”
तथा च श्रीविष्णुपुराणे— | तथा श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा
“विभेदजनकेऽज्ञाने | है—“जीव और ब्रह्मका भेद उत्पन्न
नाशमात्यन्तिकं गते । | करनेवाले अज्ञानका आत्यन्तिक नाश
आत्मनो ब्रह्मणो भेद- | हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मका
मसन्तं कः करिष्यति ॥” | मिथ्या भेद कौन करेगा ?”
( ६ । ७ । ९६) |