सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

चैतन्यमात्ररूपो नेति नेत्यात्मको | 'यह भी नहीं, यह भी नहीं' इत्यादि
विदिताविदिताभ्यामन्यो वाचाम- | रूपसे उपलक्षित स्वरूपवाला, ज्ञात
गोचरः प्रत्यस्तमितभेदो विश्व- | और अज्ञातसे भिन्न, वाणीका अविषय,
स्वरूपविलक्षणस्वरूपः परमात्मा- | सब प्रकारके भेदसे रहित और
विद्योपाधिको भेदः । अत एव | सम्पूर्ण रूपोंसे विलक्षण स्वरूपवाला
चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकीं | है इसलिये भेद अविद्यारूप उपाधिके
विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यादि- | कारण है। इसीसे इसकी उपाधि-
रिवेत्युपमा दीयते मोक्षशास्त्रेषु । | निमित्तक अपारमार्थिकी विशेषरूपता-
| के आशयसे ही मोक्षशास्त्रोंमें 'भेद
| जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यादिके समान
| है' ऐसी उपमा दी जाती है।
“आकाशमेकं हि यथा |
घटादिषु पृथक्पृथक् । | “जिस प्रकार घटादि उपाधियोंमें
तथात्मैको ह्यनेकश्च | एक ही आकाश पृथक्-पृथक्-सा
जलाधारेष्विवांशूमान् ॥” | भासने लगता है उसी प्रकार विभिन्न
( याज्ञ० ३ । १४४ ) | जलाशयोंमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्यके
“एक एव तु भूतात्मा | समान एक ही आत्मा अनेक-सा
भूते भूते व्यवस्थितः । | जान पड़ता है।” “विभिन्न भूतोंमें
एकधा बहुधा चैव | एक ही भूतात्मा स्थित है, जो जलमें
दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥” | दिखायी देते हुए चन्द्रमाओंके समान
“यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वा- | एक और अनेक रूपोंमें भी देखा
नपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । | जाता है।” “जिस प्रकार यह
उपाधिना क्रियते भेदरूपो | ज्योतिःस्वरूप एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न
देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा॥” | जलाशयोंका अनेक रूप होकर
| अनुगमन करता है उसी प्रकार
| विभिन्न क्षेत्रोंमें यह एक ही अजन्मा
| आत्मदेव उपाधिके द्वारा अनेक रूप
| कर दिया जाता है।”