श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥
सौ भागोंमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है
उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये; किन्तु वही अनन्तरूप
हो जाता है ॥ ९ ॥
वालाग्रेति । वालाग्रस्य शत- ‘वालाग्र०’ इत्यादि । सौ भागोंमें
विभक्त किये केशके अग्रभागका जो
कृत्वो भेदमापादितस्य यो भाग- एक भाग है उसके भी सौ भाग
स्तस्यापि शतधा कल्पितस्य किये जानेपर जो भाग होता है
उसके समान जीवको समझना
भागो जीवः स विज्ञेयः । लिङ्ग- चाहिये । लिङ्गदेह अत्यन्त सूक्ष्म
है, इसलिये उसके परिमाणके
स्यातिसूक्ष्मत्वात् तत्परिमाणे- अनुसार ही इसका परिमाण बतलाया
नायं व्यपदिश्यते । स च जीव- जाता है । जीवस्वरूपसे वह ऐसा है,
किन्तु स्वतः (अपने परमार्थरूपसे)
स्वरूपेण, आनन्त्याय कल्पते स्वतः ९ वही अनन्त हो जाता है ॥९॥
किञ्च-- । तथा-
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः ।
यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्ष्यते ॥१०॥
यह [ विज्ञानात्मा ] न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है ।
यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ॥१०॥
नैव स्त्रीति । स्वतोऽद्वितीया- ‘नैव स्त्री’ इत्यादि । स्वयं साक्षात्
अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण
परोक्षब्रह्मात्मस्वभावत्वान्नैव स्त्री यह न स्त्री है, न पुरुष है और न
न पुमानेष नैव चायं नपुंसकः । नपुंसक ही है । यह जिस-