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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तथा चाह भगवान्— ऐसा ही . भगवान्‌ने भी कहा
“क्षरः सर्वाणि भूतानि है—“सम्पूर्ण भूत (प्राकृत विकार)
कूटस्थोऽक्षर उच्यते । क्षर हैं और कूटस्थ प्रकृति
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः (भगवान्‌की मायाशक्ति) अक्षर
परमात्मेत्युदाहृतः ॥ कही जाती है । इन दोनोंसे अत्यन्त
यो लोकत्रयमाविश्य उत्कृष्ट पुरुष [ अर्थात् पुरुषोत्तम ]
बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।” तो अन्य ही है, जो परमात्मा कहा गया
(गीता १५। १६, १७) है; तथा जो अविनाशी ईश्वर तीन
इति । लोकोंमें व्याप्त होकर उनको धारण
करता है ।” इत्यादि ।
न केवलमीश्वरो व्यक्ताव्यक्तं परमात्मा केवल व्यक्ताव्यक्तरूप
भरतेऽनीशश्चानीश्वरश्च स आत्मा- विश्वका भरण ही नहीं करता, अपितु
विद्यातत्कार्यभूतदेहेन्द्रियादिभि- जीव अनीश—अस्वतन्त्र भी है और
र्बध्यते भोक्तृभावात् । एतदुक्तं वह भोक्तृत्वके कारण अविद्या और
भवति—परस्परसंयुक्त व्यष्टि- उसके कार्यभूत देह एवं इन्द्रियादिसे
समष्टिरूप ईश्वरः । तद्व्यष्टिभूत- बँध जाता है । यहाँ कहना यह है
देहेन्द्रियात्मकोऽनीशो जीवः । एवं कि ईश्वर परस्पर मिले हुए समष्टि-
समष्टिव्यष्ट्यात्मकत्वेन जीव- व्यष्टिरूप है । उनमें व्यष्टि देह एवं
परयोरौपाधिकस्य भेदस्य विद्य- इन्द्रियोंवाला मायाधीन जीव है । इस
मानत्वात्तदुपाध्युपासनद्वारेण नि- प्रकार समष्टि-व्यष्टिरूपसे जीव और
रुपाधिकमीश्वरं ज्ञात्वा मुच्यत परमात्माका औपाधिक भेद विद्यमान
इति भोक्त्रात्मैक्यवादे नानुषपन्नं रहनेसे उस उपाधिजनित उपासनाके
किञ्चिद्विद्यत इति । द्वारा निरुपाधिक ईश्वरका ज्ञान होने-
पर जीव मुक्त हो जाता है । अतः
भोक्ता जीव और परमात्माका एकत्व
माननेवाले सिद्धान्तमें असंगत कुछ
भी नहीं है ।