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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 120Permalink

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

एवानन्तो विश्वरूप आत्मात एवा-
कर्ता कर्तृत्वादिसंसारधर्मरहित
इत्यर्थः ।
कदैवमनन्तो विश्वरूपः कर्तृ-
त्वादिसकलसंसारधर्मवर्जितो मुक्तः
पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपेणैवाव-
तिष्ठते ? इत्यत्राह—त्रयं यदा
विन्दते ब्रह्ममेतदिति । त्रयं
भोक्तृभोगभोग्यरूपम् । मायात्म-
कत्वादधिष्ठानभूतब्रह्मव्यतिरेकेण
नास्ति किन्तु ब्रह्मैवेति यदा विन्दते
तदा निवृत्त निखिलविकल्पपूर्णान-
न्दाद्वितीयब्रह्मभाकर्तृत्वादिसकल-
संसारधर्मवर्जितो वीतशोकः कृत-
कृत्योऽवतिष्ठत इत्यर्थः । अथवा
ज्ञाज्ञात्मकजीवेश्वरप्रकृतिरूप-
त्रयं ब्रह्म यदा विन्दते लभते तदा
मुच्यत इति । ब्रह्ममिति मका-
रान्तं ब्रह्ममेतु मां मधुमेतु माम्
इतिवच्छान्दसम् ॥ ९ ॥


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

आत्मा अनन्त और विश्वरूप है इसी-
लिये वह अकर्ता अर्थात् कर्तृत्वादि
संसारके धर्मोंसे रहित है ।
आत्मा इस प्रकार अनन्त,
विश्वरूप, कर्तृत्वादि सम्पूर्ण सांसारिक
धर्मोंसे रहित, मुक्त और पूर्णानन्द
अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ही कब स्थित
होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति
कहती है—'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म-
मेतत्' त्रय अर्थात् भोक्ता, भोग और
भोग्यरूप मायामय होनेसे अपने
अधिष्ठान ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु
ब्रह्म ही है—ऐसा जिस समय
अनुभव करता है उस समय जीवात्मा
सम्पूर्ण विकल्पोंके निवृत्त हो जानेसे
पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होकर
कर्तृत्वादि सकल संसारधर्मोंसे रहित,
शोकहीन और कृतकृत्य होकर
स्थित होता है—ऐसा इसका तात्पर्य
समझना चाहिये । अथवा ऐसा जानो
कि क्रमशः यह ज्ञ, अज्ञ और अजारूप
ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनोंको
यह ब्रह्मरूपसे प्राप्त (अनुभव) कर
लेता है उस समय यह मुक्त हो
जाता है। मूलमें 'ब्रह्मम्' यह मकारान्त
प्रयोग 'ब्रह्ममेतु माम्' 'मधुमेतु माम्'
इत्यादिके समान वैदिक है ॥ ९ ॥