श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
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प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहो- | के लिये जो सेतुके समान सेतु है,
| क्योंकि वह संसार-सागरसे पार
दधेरुत्तारणोपायत्वात्तम् अमृ- | होनेका साधन है, उस अमृतत्वके
| परमसेतु तथा जिसका ईंधन जल
तस्य परं सेतुं दग्धेन्धनानलमिव | गया है उस अग्निके समान देदीप्य-
| मान—जगमगाते हुए [ देवकी मैं
देदीप्यमानं झटझटायमानम्॥१९॥ | शरण लेता हूँ ] ॥१९॥
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परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता
किमिति तमेव विदित्वा | तो क्या उसीको जानकर पुरुष
मुच्यते नान्येन ? इति तत्राह— | मुक्त होता है किसी और साधनसे
| नहीं ? इसपर कहते हैं—
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥
जिस समय लोग चमड़ेके समान आकाशको लपेट लेंगे उस समय
उस देवको न जानकर भी दुःखका अन्त हो जायगा*॥२०॥
यदेति । यदा यद्वच्चर्म सङ्को- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय,
चयिष्यति तद्वदाकाशममूर्त्तं व्या- | जैसे कोई [फैले हुए] चमड़ेको लपेट
पिनं यदि वेष्टयिष्यन्ति संवेष्टयि- | ले उसी प्रकार यदि अमूर्त और व्यापक
ष्यन्ति मानवास्तदा देवं ज्योति- | आकाशको भी मनुष्य सम्यक्
र्मयमनुदितानस्तमितज्ञानात्मना- | प्रकारसे लपेट लें, उस समय देव
| यानी ज्योतिर्मय—उदय-अस्तसे
- तात्पर्य यह है कि परमात्माको बिना जाने दुःखका अन्त होना ऐसा ही
असम्भव है जैसा कि विभु और अमूर्त आकाशको परिच्छिन्न एवं मूर्त्तस्वरूप चर्मके
समान लपेटना ।