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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
ऽनित्यत्वादिदर्शनेनोत्पन्नेहामु- | मुक्त और वस्तुओंका अनित्यत्वादि
त्रार्थभोगविराग उपेत्याचार्यमा- | देखनेसे ऐहिक और पारलौकिक
चार्यद्वारेण वेदान्तश्रवणादिनाहं | भोगोंसे विरक्त हो जाता है तब
ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मतत्त्वमवगम्य | आचार्यके पास जाकर उनके द्वारा
निवृत्ताज्ञानतत्कार्यो वीतशोको | वेदान्तश्रवणादि करके 'मैं ब्रह्म हूँ'
भवति । अविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य | इस प्रकार ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार
मोक्षस्य विद्याधीनत्वायुज्यते च | कर वह अज्ञान और उसके कार्यकी
तदर्थोपनिषदारम्भः । | निवृत्ति हो जानेके कारण शोकरहित
तथा तद्विज्ञानादमृतत्वम् । | हो जाता है । क्योंकि अज्ञाननिवृत्ति-
आत्मज्ञानस्य "तमेवं विद्वान- | रूप मोक्ष ज्ञानके अधीन है, इसलिये
माहात्म्यम् मृत इह भवति ।" | ज्ञान ही जिसका प्रयोजन है उस उप-
( नृसिंह पूर्व० १ । ६) "नान्यः | निषद्का आरम्भ करना उचित ही है ।
पन्था विद्यतेऽयनाय " ( श्वेता० | तथा उस (ब्रह्मात्मतत्त्व) के ज्ञानसे
६ । १५) । "न चेदि- | अमृतत्व प्राप्त होता है । "उसको
हावेदीन्महती विनष्टिः" ( के० | जाननेवाला इस लोकमें अमृत (मुक्त)
उ० २ । ५) । "य एतद्विदुर- | हो जाता है", "मोक्षप्राप्तिके लिये कोई
मृतास्ते भवन्ति" (बृ० उ० ४ । | दूसरा मार्ग नहीं है", "यदि यहाँ
४ । १४) । "किमिच्छन्कस्य | उसे न जाना तो बड़ी भारी हानि
कामाय शरीरमनु संज्वरेत्" (बृ० | है", "जो इसे जानते हैं अमर हो
उ० ४ । ४ । १२) । "तं विदि- | जाते हैं", "[ यदि पुरुष 'यह
त्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन।" | परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा जान ले
(बृ० उ० ४ । ४ । २३) | तो वह ] क्या इच्छा करता हुआ
"तरति शोकमात्मवित्" ( छा० | किस कामके लिये शरीरके पीछे सन्तप्त
उ० ७ । १ । ३) । "निचाय्य | हो", "उसे जान लेनेपर जीव पाप-
तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते।" (क० | कर्मसे लिप्त नहीं होता", "आत्मज्ञानी
| शोकके पार हो जाता है,"
| "उसका अनुभव कर लेनेपर मृत्युके
| मुखसे छूट जाता है", "इसे जो

४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

उ० १ । ३ । १५) "एतद्यो | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता
वेद निहितं गुहायां सोऽवि- | है, हे सोम्य ! वह अविद्यारूप
द्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य" | ग्रन्थिको छिन्न-भिन्न कर देता है",
(मु० उ० २ । १ । १०) । | "उस परावर ( ब्रह्मादि देवताओंसे
"भिद्यते हृदयग्रन्थि- | भी उत्तम ) परमात्माका साक्षात्कार
श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | कर लेनेपर इसके हृदयकी ग्रन्थि
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि | टूट जाती है, सारे संशय कट जाते
तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥" | हैं तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते
(मु० उ० २।२।८) | हैं", "जिस प्रकार नदियाँ बहती
"यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- | हुई अपने नाम और रूपको छोड़कर
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । | समुद्रमें लीन हो जाती हैं उसी
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः | प्रकार विद्वान् नाम और रूपसे मुक्त
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥" | होकर परसे भी पर दिव्य पुरुषको
(मु० उ० ३।२।८) | प्राप्त हो जाता है", "वह, जो कि
"स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म | उस परब्रह्मको जानता है, ब्रह्म ही हो
वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० | जाता है", "हे सोम्य ! जो भी उस
३।२।९)। "स यो ह वै | छायाहीन, अशरीर, अलोहित, शुद्ध
तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्र- | अक्षर ब्रह्मको जानता है [ वह सर्वज्ञ हो
मक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य" | जाता है ]" "वह सब कुछ जानता
(प्र० उ० ४।१०) । "स सर्व- | है", "उस जाननेयोग्य पुरुषको
मवैति ।" "तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा | जान, जिससे मृत्यु तुझे व्यथित न
मा वो मृत्युः परिव्यथाः" (प्र० | करे", "उस अवस्थामें एकत्व देखने-
उ० ६ । ६) । "तत्र को मोहः | वाले पुरुषको क्या मोह और क्या
कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" | शोक हो सकता है ?" "ज्ञानसे
(ईशा० ७)। "विद्ययामृतमश्नुते" | अमरत्वको प्राप्त होता है",
ईशा० ११) । "भूतेषु भूतेषु | "बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियोंमें