श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥
समस्त प्राणियोंमें स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोंका
अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका
साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करनेवाला, शुद्ध और निर्गुण है ॥११॥
एको देव इति । एको- | ‘एको देवः’ इत्यादि । सर्वभूतोंमें
ऽद्वितीयो देवो द्योतनस्वभावः सर्व- | गूढ—समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ
भूतेषु गूढः सर्वप्राणिषु संवृतः । | एक—अद्वितीय देव—प्रकाशनशील
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा स्व- | परमात्मा है । [ वह ] सर्वव्यापी,
रूपभूत इत्यर्थः । कर्माध्यक्षः | सर्वभूतान्तरात्मा अर्थात् सबका
स्वरूपभूत, कर्माध्यक्ष—समस्त
सर्वप्राणिकृतविचित्रकर्माधिष्ठाता । | प्राणियोंके किये हुए विभिन्न
कर्मोंका अधिष्ठाता, सर्वभूताधिवास
सर्वभूताधिवासः सर्वप्राणिषु | अर्थात् समस्त प्राणियोंमें निवास करने-
वसतीत्यर्थः । सर्वेषां भूतानां | वाला, समस्त भूतोंका साक्षी अर्थात्
साक्षी सर्वद्रष्टा । “साक्षाद्द्रष्टरि | सर्वद्रष्टा है, क्योंकि “साक्षाद्द्रष्टरि
संज्ञायाम्” (पा० सू० ५।२।९१) | संज्ञायाम्” इस पाणिनिसूत्ररूप
इति स्मरणात् । चेता चेतयिता । | स्मृतिके अनुसार ‘साक्षी’ शब्दका
अर्थ द्रष्टा है । तथा वह चेता—
केवलो निरुपाधिकः । निर्गुणः | चेतनत्व प्रदान करनेवाला, केवल—
उपाधिशून्य और निर्गुण—सत्त्वादि
सत्त्वादिगुणरहितः ॥११॥ | गुणरहित है ॥११॥