श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
चरन्ति” (बृ० उ० ३।५।१) | करते थे,” “ब्रह्मवेत्ता कावषेय
“एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- | ऋषियोंने भी यही कहा है—हम
ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- | किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें
मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | और किस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये यज्ञ
स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्ते- | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो
नेदृश एवेति।”यथाह भगवान्— | सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा
“यस्त्वात्मरतिरेव स्या- | (सर्वत्यागी) ही होगा।” जैसा
दात्मतृप्तश्च मानवः । | कि श्रीभगवान् भी कहते हैं—
आत्मन्येव च संतुष्ट- | “जो पुरुष आत्मामें ही प्रेम
स्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ | करनेवाला, आत्मामें ही तृप्त
नैव तस्य कृतेनार्थो | और आत्मामें ही सन्तुष्ट है, उसके
नाकृतेनेह कश्चन । | लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है। उस
न चास्य सर्वभूतेषु | पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे
कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥” | कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न
(गीता ३। १७-१८) | करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि
तथा चाह भगवान्परमेश्वरो | अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती
लैङ्गे कालकूटोपाख्याने— | तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उसका कोई अर्थ-
“ज्ञानेनैतेन विप्रस्य | व्यपाश्रय (अर्थसिद्धिका सहारा)
त्यक्तसङ्गस्य देहिनः । | भी नहीं है।”
कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा | लिङ्गपुराणमें कालकूटोपाख्यानमें
अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ | ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते
इह लोके परे चैव | हैं—“हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानकें
कर्तव्यं नास्ति तस्य वै । | द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई
जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- | कर्त्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है
द्ब्रह्मवित्परमार्थतः ॥ | तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस
| लोक और परलोकमें भी कोई कर्त्तव्य
| नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता
| तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।
श्वेता० २—
२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं | परमार्थतत्त्वको जाननेवाला ज्ञाना-
विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । | भ्यासमें तत्पर विरक्त पुरुष कर्तव्यकी
कर्तव्यभावमुत्सृज्य | चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको
ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ | प्राप्त करता है। हे द्विजश्रेष्ठ ! जो
वर्णाश्रमाभिमानी य- | वर्णाश्रमाभिमानी पुरुष ज्ञानदृष्टिको
स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। | त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख
अन्यत्र रमते मूढः | मानता है वह अज्ञानी है, इसमें
सोऽज्ञानी नात्र संशयः ॥ | सन्देह नहीं। क्रोध, भय, लोभ,
क्रोधो भयं तथा लोभो | मोह, भेददृष्टि, मद, अज्ञान और
मोहो भेदो मदस्तमः। | धर्माधर्म—ये सब ऐसे लोगोंको ही
धर्माधर्मौ च तेषां हि | प्राप्त होते हैं और इनके अधीन
तद्वशाच्च तनुग्रहः॥ | होनेपर देह धारण करना पड़ता
शरीरे सति वै क्लेशः | है। तथा शरीरके रहते हुए क्लेश
सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। | अवश्यम्भावी है। अतः जीवको
अविद्यां विद्यया हित्वा | अविद्याका त्याग करना चाहिये।
स्थितस्यैवेह योगिनः॥ | जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग
क्रोधाद्या नाशमायान्ति | करके स्थित है उसके क्रोधादि दोष
धर्माधर्मौ च नश्यतः। | तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें
तत्क्षयाच्च शरीरेण | रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं।
न पुनः संप्रयुज्यते ॥ | उनका क्षय होनेपर उसका फिर
स एव मुक्तः संसारा- | शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा
दुःखत्रयविवर्जितः।।" | वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे
तथा शिवधर्मोत्तरे— | मुक्त हो जाता है।"
"ज्ञानामृतेन तृप्तस्य | तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है—
कृतकृत्यस्य योगिनः। | "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर
नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- | कृतकृत्य हो गया है उसके लिये
मस्ति चेन्न स तत्त्ववित् । | कोई कर्तव्य नहीं रहता, और यदि
| रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।