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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षय- | महिमान्वित स्वरूप और कर्मके कारण
रहितमीशं पश्यत्ययमहमस्मीति | होनेवाले वृद्धि एवं क्षयसे रहित ईश्वर-
| रूप उस आत्माको देखता है; अर्थात्
साक्षाज्जानाति यः स वीतशोको | 'यही मैं हूँ' इस प्रकार साक्षात् जानता
| है, वह शोकरहित हो जाता है । किन्तु
भवति । केन तर्ह्यसौ पश्यति ? | यह देखता किसकी सहायतासे है ?
धातुरीश्वरस्य प्रसादात् । प्रसन्ने | [ इसपर कहते हैं— ] विधाता यानी
| ईश्वरकी कृपासे, क्योंकि ईश्वरके प्रसन्न
हि परमेश्वरे तद्याथात्म्यज्ञान- | होनेपर ही उसके वास्तविक स्वरूप-
मुत्पद्यते । अथवेन्द्रियाणि धातवः | का ज्ञान होता है । अथवा शरीरको
| धारण करनेके कारण इन्द्रियाँ ही धातु
शरीरस्य धारणात्तेषां प्रसादा- | हैं, उनके प्रसाद यानी विषयोंमें दोष-
द्विषयदोषदर्शनमलाद्यपनयनात् । | दर्शनके द्वारा मलादिकी निवृत्ति
| होनेपर उसे देखता है, अन्यथा
अन्यथा दुर्विज्ञेय आत्मा कामिभिः | सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये तो
प्राकृतपुरुषैः ॥ २० ॥ | आत्मा दुर्विज्ञेय ही है ॥२०॥

आत्मस्वरूपके विषयमें ब्रह्मवेत्ताका अनुभव
उक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्रदृगनु- | उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करनेके लिये
भवं दर्शयति— | श्रुति मन्त्रद्रष्टाका अनुभव दिखाती है—
वेदाहमेतमजरं पुराणं
सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् ।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य
ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥

१. अथवासे लेकर जो व्याख्या है वह मूलमें 'धातुप्रसादात्' पाठ मानकर
की गयी है।

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३

ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य
कहते हैं उस जराशून्य पुरातन सर्वात्माको, जो विभु होनेके कारण
सर्वगत है, मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥
वेदाहमेतमिति । वेद जाने- 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । इस
ऽहमेतमजरं विपरिणामधर्मवर्जितं अजर अर्थात् विपरिणामधर्मशून्य और
पुराणं पुरातनं सर्वात्मानं सर्वेषा- पुराण—पुरातन सर्वात्माको सबके
मात्मभूतं सर्वगतं विभुत्वादाकाश- स्वरूपभूतको, जो विभु—आकाशके
वद्व्यापकत्वात् । यस्य च जन्म- समान व्यापक होनेके कारण सर्वगत
निरोधमुत्पत्त्यभावं प्रवदन्ति ब्रह्म- है तथा ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्म-
वादिनो हि नित्यम् । स्पष्टोऽर्थः का अभाव नित्य बतलाते हैं, मैं
॥ २१ ॥ जानता हूँ। शेष अर्थ स्पष्ट है ॥२१॥*

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

  • श्रीशङ्करानन्दजीने इस मन्त्रके उत्तरार्धकी व्याख्या इस प्रकार की है—"जन्म
    च निरोधश्च जन्मनिरोधमुत्पत्तिनाशावित्यर्थः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति मूढा इति शेषः,
    यस्य आत्मनः······ब्रह्मवादिनः उत्पन्नतत्त्वसाक्षात्कारा हि प्रसिद्धाः प्रवदन्ति
    प्रकर्षेण कथयन्ति नित्यम्।" अर्थात् "जन्म और निरोधका नाम जन्मनिरोध है यानी
    उत्पत्ति और नाश-इन्हें मूढलोग जिस आत्माके बतलाते हैं और जिसे ब्रह्मवादीलोग
    —जिन्हें तत्त्वसाक्षात्कार हो गया है नित्य प्रतिपादन करते हैं।" भाष्यकी अपेक्षा
    यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि भाष्यके अनुसार अर्थ करनेसे यहाँ
    'प्रवदन्ति' क्रियाका दूसरी बार प्रयोग होनेका कोई प्रयोजन नहीं जान पड़ता।