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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

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८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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विंशतिप्रत्यराभिः । विंशति- | बीस प्रत्यरोंसे युक्त । दश इन्द्रियाँ
प्रत्यरा दशेन्द्रियाणि तेषां च | और उनके विषय शब्द, स्पर्श,
विषयाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध- | रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान
वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः । | (ग्रहण ), गति, त्याग और आनन्द
पूर्वोक्तानामराणां प्रत्यरा ये प्रति- | —ये बीस प्रत्यर हैं । जो पूर्वोक्त
विधीयन्ते कीलका अराणां दा- | अरोंके प्रति अरे—अरोंकी दृढ़ताके
र्ढ्याय ते प्रत्यरा इत्युच्यन्ते । | लिये जो शलाकाएँ लगायी जाती हैं
तैः प्रत्यरैर्युक्तम् । अष्टकैः षड्भि- | वे प्रत्यर कहलाते हैं । उन प्रत्यरोंसे
र्युक्तमिति योजनीयम् । | युक्त, तथा छः अष्टकोंसे युक्तको
"भूमिरापोऽनलो वायुः | [ कारणरूपसे देखा ]—ऐसी योजना
खं मनो बुद्धिरेव च । | करनी चाहिये । "पृथिवी, जल,
अहंकार इतीयं मे | अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि
भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" | और अहंकार—यह मेरी आठ भेदों-
(गीता ७ । ४ ) | वाली प्रकृति है" यह गीतोक्त
इति प्रकृत्यष्टकम् । त्वक्चर्म- | प्रकृत्यष्टक है; त्वचा, चर्म, मांस,
मांसरुधिरमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि | रुधिर, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र
धात्वष्टकम् । अणिमाद्यैश्वर्या- | यह धात्वष्टक है; अणिमादि ऐश्वर्याष्टक
ष्टकम् । धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याधर्मा- | है; धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म,
ज्ञानावैराग्यानैश्वर्याख्यभावाष्ट- | अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य—यह
कम् । ब्रह्मप्रजापतिदेवगन्धर्वयक्ष- | भावाष्टक है; ब्रह्मा, प्रजापति, देव,
राक्षसपितृपिशाचा देवाष्टकम् । | गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और
अष्टावात्मगुणा ज्ञेयाः, दया | पिशाच—यह देवाष्टक है; और आठ
सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौच- | जिन्हें आत्माके गुण समझना चाहिये,
| वे समस्त प्राणियोंके प्रति दया,
| क्षमा, अनसूया (निन्दा न करना ),

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१. अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और
वशित्व—ये आठ ऐश्वर्य हैं ।
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३

मनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति | शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता
गुणाष्टकं षष्ठम् । एतैः षड्भि- | और अस्पृहा ये छठा गुणाष्टक हैं;
र्युक्तम् । | इन छः अष्टकोंसे युक्तको [ कारण-
| रूपसे देखा ] ।
विश्वरूपैकपाशं स्वर्गपुत्रान्नाद्या- | विश्वरूप एक पाशवालेको—
दिविषयभेदाद्विश्वरूपं विश्वरूपो | स्वर्ग,पुत्र एवं अन्नाद्य आदि विषयभेदसे
नानारूप एकः कामाख्यः पाशो- | कामनामक एक ही विश्वरूप—अनेक
ऽस्येति विश्वरूपैकपाशम् । धर्मा- | प्रकारका पाश है जिसका उस
धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति त्रि- | विश्वरूप एक पाशवालेको; धर्म,
मार्गभेदम् । द्वयोः पुण्यपापयो- | अधर्म और ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद
र्निमित्तैकमोहो देहेन्द्रियमनोबुद्धि- | हैं उस तीन मार्गभेदोंवालेको; तथा
जात्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानो- | पाप-पुण्य इन दोनोंका एक ही
ऽस्येति द्विनिमित्तैकमोहम् । अप- | निमित्त मोह यानी देह, इन्द्रिय, मन,
श्यन्निति क्रियापदमनुवर्तते । | बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें
अधीम इत्युत्तरमन्त्रसिद्धं वा | जिसका आत्माभिमान है ऐसे उस
क्रियापदम् ॥ ४ ॥ | दोके [ मोहरूप ] एक ही निमित्त-
| वालेको [ उन्होंने कारणरूपसे देखा ]
| इस प्रकार यहाँ पूर्वमन्त्रकी
| क्रिया 'अपश्यन्' की अनुवृत्ति होती
| है, अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद
| 'अधीमः' ( जानते हैं ) का
| अध्याहार करना चाहिये ॥४॥

कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन
पूर्वं चक्ररूपेण दर्शितमिदानीं | पहले जिसे चक्ररूपसे प्रदर्शित
| किया है उसीको अब श्रुति नदी-
नदीरूपेण दर्शयति— | रूपसे दिखलाती है—