श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
परमात्मसंयोजनात्तत्त्वभावात् 'अहं | जीवका योग करानेसे तथा तत्त्वभाव-
ब्रह्मास्मि' इति भूयश्चासकृदन्ते | से यानी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी भावनासे
प्रारब्धकर्मान्ते यद्वा स्वात्मज्ञानानि- | भूयः-पुनः-पुनः ऐसा होनेपर
ष्पत्तिरन्तस्तस्मिन्स्वात्मज्ञानोदय- | अन्तमें अर्थात् प्रारब्धकर्मकी समाप्ति
वेलायां विश्वमायानिवृत्तिः । सुख- | होनेपर अथवा आत्मज्ञानकी प्राप्ति
दुःखमोहात्मकाशेषप्रपञ्चरूप- | ही अन्त है उसके होनेपर अर्थात्
मायानिवृत्तिः ॥ १०॥ | आत्मज्ञानके उदयकालमें विश्वमायाकी
निवृत्ति होती है । यानी सुख, दुःख
एवं मोहमय सम्पूर्ण प्रपञ्चरूप मायाकी
निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥
ब्रह्मके ज्ञान और ध्यान-जन्य फलोंमें भेद
इदानीं तद्विदस्तद्ध्यायिनश्च | अब श्रुति ब्रह्मवेत्ता और ब्रह्म-
तज्ज्ञानध्यानकृतं फलभेदं | ध्यानीको ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मध्यानसे
दर्शयति— | होनेवाले फलोंका भेद दिखलाती है—
ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः
क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः ।
तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे
विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥११॥
परमात्माका ज्ञान होनेपर अविद्यादि सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश हो जाता
है और क्लेशोंका क्षय हो जानेपर जन्म-मृत्युकी निवृत्ति हो जाती है।
तथा उसका ध्यान करनेसे शरीरपातके अनन्तर [ विराट् और हिरण्यगर्भकी
अपेक्षा कारणब्रह्मरूप ] सर्वैश्वर्यमयी तृतीय अवस्थाकी प्राप्ति होती है और
फिर आप्तकाम होकर कैवल्यपदको प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥