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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११
“ध्यानादैश्वर्यमतुल- | “ध्यानसे अतुलित ऐश्वर्य मिलता है
मैश्वर्यात्सुखमुत्तमम् । | और ऐश्वर्यसे उत्कृष्ट सुखकी प्राप्ति होती
ज्ञानेन तत्परित्यज्य | है । ज्ञानसे उनका त्याग करके देहा-
विदेहो मुक्तिमाप्नुयात्” इति । | भिमानसे रहित हो मोक्ष प्राप्त करे ।”
तथा च दहरादिसविशेष- | इसी प्रकार दहरादि सविशेष
सगुणोपासकानां “स यदि पितृ- | और सगुण ब्रह्मकी उपासना करने-
लोककामो भवति संकल्पादेवास्य | वालोंको श्रुति “वह यदि पितृलोक-
पितरः समुत्तिष्ठन्ति” (छा० उ० | की कामना करता है तो उसके
८।२।१) इत्यादिना विश्वैश्वर्य- | संकल्पसे ही पितृगण उपस्थित हो
लक्षणं फलं दर्शयति । तथा च | जाते हैं” इत्यादि वाक्यसे विश्वैश्वर्य-
प्रश्नोपनिषदि “यः पुनरेतं त्रिमात्रे- | रूप फल ही दिखलाती है । तथा
णोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुष- | प्रश्नोपनिषद्में “जो तीन मात्रावाले
मभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये | ॐ इस अक्षरसे परम पुरुषका ध्यान
संपन्नः” (प्र० उ० ५।५) इत्यादिना | करता है वह तेजोमय सूर्यमण्डलको
परं पुरुषमभिध्यायतोऽर्चिरादिमा- | प्राप्त होकर” इत्यादि वाक्यसे परम
र्गोपदेशपूर्वकं “स एतस्माज्जीव- | पुरुषका ध्यान करनेवाले पुरुषको
घनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष- | अर्चिरादिमार्गका उपदेश करके
मीक्षते” (प्र० उ० ५।५) इति ब्रह्म- | “वह इस जीवघन (हिरण्यगर्भ)
लोकं गतस्य तत्रैव सम्यग्दर्शन- | से उत्कृष्टतर सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित
लाभं दर्शयित्वा “तमोङ्कारेणैवाय- | परम पुरुषको देखता है” इस प्रकार
तनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजर- | ब्रह्मलोकमें गये हुए पुरुषको उसी
मममृतमभयं परं चेति” ( प्र० उ० | जगह सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति दिखला-
५। ७) इति सम्यग्दर्शनेन मोक्ष | कर “विद्वान् उस ओंकाररूप
| अवलम्बनके द्वारा ही उस शान्त,
| अजर, अमृत और अभयरूप
| परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है” इस
| वाक्यसे सम्यग्दर्शनके द्वारा मोक्षका