श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
न तत्रेति । तत्र तस्मिन्पर- | 'न तत्र' इत्यादि । वहाँ—उस
मात्मनि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो | परमात्मामें, सबका प्रकाशक होनेपर
न भाति ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। | भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता; अर्थात्
स हि तस्यैव भासा सर्वात्मनो | यह ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता ।
रूपजातं प्रकाशयति । न तु तस्य | अपि तु वह उस सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाश-
स्वतःप्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा | से ही सब रूपोंको प्रकाशित करता है;
न चन्द्रतारकम् । नेमा विद्युतो | क्योंकि उसमें स्वयं प्रकाशित करने-
भान्ति। कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः। | का सामर्थ्य नहीं है । तथा न चन्द्र
किं बहुना यदिदं जगद्भाति | और तारे, एवं न विद्युत् ही वहाँ
तमेव स्वतो भारूपत्वाद्भान्तं | प्रकाशित होते हैं । फिर हमें
दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । | दिखायी देनेवाला यह अग्नि तो
यथा लोहादि वह्निं दहन्तमनु- | प्रकाशित हो ही कैसे सकता है ?
दहति न स्वतः । तस्यैव भासा | अधिक क्या, यह जो जगत् भास रहा
दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि भाति । | है, स्वतःप्रकाशरूप होनेके कारण
उक्तं च—"येन सूर्यस्तपति तेज- | उस परमात्माके प्रकाशित होनेसे ही
सेद्धः ", "न तद्भासयते सूर्यो न | प्रकाशित हो रहा है, जिस प्रकार
शशाङ्को न पावकः ।” ( गीता १५। | लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अग्नि-
६ ) इति ॥ १४ ॥ | के साथ ही [ उसीकी शक्तिसे ]
| जलाते हैं स्वतः नहीं । ये सब
| सूर्यादि उसके ही प्रकाश यानी
| दीप्तिसे प्रकाशित होते हैं । कहा
| भी है “जिसके तेजसे युक्त होकर
| सूर्य तपता है", "उसे न सूर्य
| प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और
| न अग्नि ही" इत्यादि ॥१४॥