श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
आत्मस्थं तीर्थमुत्सृज्य | खोजते हैं । जो पुरुष आत्मस्थ
बहिस्तीर्थादि यो व्रजेत् ॥ | तीर्थको त्यागकर बाह्य तीर्थादिमें
करस्थं स महारत्नं | जाता है वह मानो अपने हाथका
त्यक्त्वा काचं विमार्गति । | महारत्न गिराकर काँच ढूँढ़ता
| फिरता है ।"
अथवैतद्यदपरोक्षं प्रत्यगात्म- | अथवा [ इसका यह भी तात्पर्य
त्वं तन्नित्यमविनाशि स्वे महिम्नि | हो सकता है कि ] यह जो अपरोक्ष
स्थितं ब्रह्मैव ज्ञेयम् । कस्मात् ? | प्रत्यगात्मा है उसे अपनी महिमामें
हिशब्दो यस्मादर्थे । यस्मान्नातः | स्थित नित्य और अविनाशी ब्रह्म ही
परं वेदितव्यमस्ति किञ्चिदपि । | जानना चाहिये । क्यों?—यहाँ 'हि'
श्रूयते च बृहदारण्यके—"तदे- | शब्द 'यस्मात् ( क्योंकि )' अर्थमें
तत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमा- | है—क्योंकि इससे बढ़कर और
त्मा" (बृ० उ० १।४।७) इति । | कुछ भी जाननेयोग्य नहीं है ।
| बृहदारण्यकश्रुतिमें भी ऐसा ही है—
| "यह जो आत्मा है वही समस्त
| जीवोंका गन्तव्य स्थान है ।"
कथमेतज्ज्ञेयम् ? इत्याह—भोक्ता | इसे किस प्रकार जानना चाहिये ?
जीवो भोग्यमितरत्सर्वं प्रेरितान्त- | सो श्रुति बतलाती है—जीव भोक्ता
र्यामी परमेश्वरः । तदेतत्त्रिविधं | है, भोक्ता और अन्तर्यामीसे
प्रोक्तं ब्रह्मैवेति । भोक्त्राद्यशेष- | अतिरिक्त और सब भोग्य है तथा
भेदप्रपञ्चविलापनेनैव निर्विशेषं | अन्तर्यामी परमेश्वर प्रेरिता है—यह तीन
ब्रह्मात्मानं जानीयादित्यर्थः । | प्रकारसे कहा हुआ ब्रह्म ही है इस
| प्रकार [ जानना चाहिये ] । तात्पर्य यह
| है कि भोक्तादि सम्पूर्ण भेदरूप प्रपञ्च-
| का लय करके ही निर्विशेष ब्रह्मको
| आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये ।