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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished276 pages

अध्याय १ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        ८७

Page 101Permalink

शीर्षक (Header):
अध्याय १ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        ८७


वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्य):

केन हेतुना नानायोनिषु
परिवर्तते ? इति तत्राह—पृथगा-
त्मानं प्रेरितारं च मत्वेति । आ-
त्मानं जीवात्मानं प्रेरितारं चेश्वरं
पृथग्भेदेन मत्वा ज्ञात्वा'अन्योऽसा-
वन्योऽहमस्मि' इति जीवेश्वरभेद-
दर्शनेन संसारे परिवर्तत इत्यर्थः ।
केन मुच्यते ? इत्याह—जुष्टः
सेवितस्तेनेश्वरेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मनाहं ब्रह्मास्मीति
समाधानं कृत्वेत्यर्थः । तेनेश्वर-
सेवनादमृतत्वमेति । यस्तु पूर्णा-
नन्दब्रह्मरूपेणात्मानमवगच्छति स
मुच्यते । यस्तु परमात्मनोऽन्य-
मात्मानं जानाति स बध्यत इति ।
तथा च बृहदारण्यके भेददर्श-
नस्य संसारहेतुत्वं प्रदर्शितम्—
“य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स
इदं सर्वं भवतीति तस्य ह न
देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा


दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद/भाष्यार्थ):

किस कारणसे अनेकों योनियोंमें
घूमता है ? इसके उत्तरमें कहते हैं—
'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा' इति ।
आत्मा अर्थात् जीवात्मा और प्रेरक—
ईश्वरको पृथक्—विभिन्नरूपसे मान-
कर; तात्पर्य यह है कि 'यह अन्य
है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार जीव
और ईश्वरका भेद देखनेसे वह
संसारमें घूमता है ।
किस उपायसे वह मुक्त होता है,
सो बतलाते हैं—उस ईश्वरसे जुष्ट—
सेवित होनेपर अर्थात् सच्चिदानन्द-
मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे 'मैं
ब्रह्म ही हूँ'—ऐसा समाधान (समाधि)
करनेपर । इस समाधिद्वारा ईश्वरका
सेवन करनेसे वह मुक्त हो जाता
है। जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द
ब्रह्मस्वरूपसे अनुभव करता है वही
मुक्त होता है और जो अपनेको
परमात्मासे भिन्न जानता है वह
बँधता है । इसी प्रकार बृहदारण्यक-
में भी भेददृष्टिको संसारका हेतु
दिखलाया है—"जो ऐसा जानता
है कि मैं ब्रह्म हूँ वह सर्वरूप हो
जाता है; देवगण भी उसके सर्वात्मक
ब्रह्मभावकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेको
समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका