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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages
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३२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कामातुर, मलिन, बाल्यावस्थामें रोगी और आलसी
होता है। किंतु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ)
या अपने उच्च (तुला)में हो तो जातक भूपति,
ग्रामपति, पण्डित और सुन्दर शरीरवाला होता
है। अन्य (द्वितीय आदि) भावोंमें सूर्यके समान
ही शनिके भी फल होते हैं॥ २५७-२५८॥

(फलमें न्यूनाधिकत्व—) शुभग्रह यदि अपने
उच्चमें हों तो पूर्णरूपसे उपर्युक्त फल प्राप्त होता
है। यदि अपने मूल त्रिकोणमें हो तो तीन चरण,
अपनी राशिमें हो तो आधा, मित्रके गृहमें हो तो
एक चरण तथा शत्रु की राशिमें हो तो उससे भी
कम फल प्राप्त होता है और नीचमें या अस्त हो
तो कुछ भी फल नहीं होता है। (इस प्रकार शुभ
ग्रहके फल कहनेसे सिद्ध होता है कि पापग्रहका
फल इसके विपरीत होता है। अर्थात् पापग्रह
नीचमें या अस्त हो तो पूर्ण फल, शत्रु-राशिमें
तीन चरण, मित्र-राशिमें आधा, अपनी राशिमें
एक चरण, अपने मूल त्रिकोणमें उससे भी अल्प
और अपने उच्चमें हो तो अपना कुछ भी फल
नहीं देता है)॥ २५९ १/२ ॥

(स्वराशिस्थ ग्रहफल—) यदि अपनी राशिमें
एक ग्रह हो तो जातक अपने पिताके सदृश
धनवान् और यशस्वी होता है। दो ग्रह अपनी
राशिमें हों तो बालक अपने कुलमें श्रेष्ठ, तीन ग्रह
हों तो बन्धुओंमें माननीय, चार ग्रह हों तो विशेष
धनवान्, पाँच ग्रह हों तो सुखी, छः ग्रह हों तो
भोगी और यदि सातों ग्रह अपनी राशिमें स्थित
हों तो जातक राजा होता है॥ २६० १/२ ॥

यदि अपने मित्रकी राशिमें एक ग्रह हो तो
जातक दूसरेके धनसे पालित, दो ग्रह हों तो
मित्रोंके द्वारा पोषित और तीन ग्रह हों तो वह
अपने बन्धुओंके द्वारा पालित होता है। यदि चार
ग्रह मित्रराशिमें हों तो बालक अपने बाहुबलसे
जीवननिर्वाह करता है। पाँच ग्रह हों तो बहुत
लोगोंका पालन करनेवाला होता है। छः ग्रह हों
तो सेनापति और सातों ग्रह मित्रराशिमें हों तो
जातक राजा होता है॥ २६१ १/२ ॥

पापग्रह यदि विषम राशि और सूर्यकी होरा
(राश्यर्ध)-में हों तो जातक लोकमें विख्यात,
महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान्
और बलवान् होता है। तथा शुभग्रह यदि
समराशि और चन्द्रमाकी होरामें हों तो जातक
कान्तिमान्, मृदु (कोमल) शरीरवाला, भाग्यवान्,
भोगी और बुद्धिमान् होता है। यदि पापग्रह
समराशि और सूर्यकी होरामें हों तो पूर्वोक्त फल
मध्यम (आधा) होता है। एवं शुभ यदि विषमराशि
और सूर्यकी होरामें हों तो ऊपर कहे हुए फल
नहीं प्राप्त होते हैं॥ २६२-२६४॥

चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्रके द्रेष्काणमें
हो तो जातक सुन्दर स्वरूपवाला और गुणवान्
होता है। अन्य द्रेष्काणमें हो तो उस द्रेष्काणकी
राशि और द्रेष्काणपतिके सदृश ही फल प्राप्त
होता है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणका
स्वामी यदि चन्द्रमाका मित्र हो तो तीन चरण
फल मिलता है, सम हो तो दो चरण (आधा)
फल मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल
होता है।) यदि सर्प द्रेष्काण*, शस्त्र द्रेष्काण,
चतुष्पद द्रेष्काण और पक्षी द्रेष्काणमें चन्द्रमा हो
तो जातक क्रमशः उग्र-स्वभाव, हिंसाके
स्वभाववाला, गुरुकी शय्यापर बैठनेवाला और
भ्रमणशील होता है॥ २६५-२६६ १/२ ॥

(लग्ननवमांश राशिफल—) लग्नमें मेषका
नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश
हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क-
नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो
राजा, कन्या-नवमांश हो तो नपुंसक, तुला-
नवमांश हो तो शत्रुको जीतनेवाला, वृश्चिक-
नवमांश हो तो बेगारी करनेवाला, धनुका नवमांश


* द्रेष्काणनिरूपणमें देखिये।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२९

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३२९

हो तो दासकर्म करनेवाला, मकर-नवमांश हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-नवमांश हो तो हिंसाके स्वभाववाला और मीन-नवमांश लग्नमें हो तो बुद्धिहीन होता है। किंतु यदि वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसीका नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोरस्वभाव आदि सब)-का शासक होता है। (जैसे मेष-नवमांशमें उत्पन्न मनुष्य चोरस्वभाव होता है, किंतु यदि मेष राशिमें मेषका नवमांश हो तो वह चोरस्वभाववालोंका शासक होता है, इत्यादि।) इसी प्रकार मेषादि राशियोंके द्वादशांशमें मेषादि राशियोंके समान फल प्राप्त होते हैं॥ २६७-२६८॥

(मङ्गल आदि ग्रहोंके त्रिंशांशफल—) मङ्गल अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण तथा परिजनादिसे सम्पन्न, साहसी और तेजस्वी होता है। शनि अपने त्रिंशांशमें हो तो रोगी, स्त्रीके प्रति कुटिल, परस्त्रीमें आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि आवश्यक सामग्रीसे सम्पन्न, किंतु मलिन होता है। गुरु अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्, धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोकमें मान्य, रोगहीन, उद्यमी और भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांशमें हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य और शिल्पविद्याका ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्त्वज्ञ तथा साहसी होता है। शुक्र अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक अधिक संतान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य और धनसे युक्त, मनोहर शरीरवाला तथा अजितेन्द्रिय होता है॥२६९–२७३॥

(सूर्य-चन्द्र-फल—) मङ्गलके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा हो तो दीर्घसूत्री, बुधके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो जातक कुटिल और चन्द्रमा हो तो हिंसाके स्वभाववाला होता है। गुरुके त्रिंशांशमें रवि हो तो गुणी और चन्द्रमा हो तो भी गुणी होता है। शुक्रके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो बालक सुखी और चन्द्रमा हो तो विद्वान् होता है। शनिके त्रिंशांशमें रवि हो तो सुन्दर शरीरवाला तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता है॥ २७४॥

(कारक ग्रह—) अपने-अपने मूल त्रिकोण, स्वराशि या स्वोच्चमें स्थित ग्रह यदि केन्द्रमें हों तो वे सब परस्पर कारक (शुभफलदायक) होते हैं, उनमें दशम स्थानमें रहनेवाला सबसे बढ़कर कारक होता है॥ २७५॥

(शुभजन्मलक्षण—) लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांशमें हो या वेशि (सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें शुभग्रह हो अथवा केन्द्रोंमें कारक ग्रह हों तो जन्म शुभप्रद होता है। अर्थात् इस स्थितिमें जन्म लेनेवाला बालक सुखी और यशस्वी होता है॥ २७६॥ गुरु, जन्मराशि और जन्म-लग्नश ये सभी या इनमेंसे एक भी केन्द्रमें हो तो जीवनके मध्यभागमें सुखप्रद होते हैं।* तथा पृष्ठोदय राशिमें रहनेवाला ग्रह वयस्के अन्तमें, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह वयस्के मध्यमें और शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह पूर्ववयस्में अपने-अपने फल देते हैं॥ २७७॥

(ग्रहगोचरफलसमय—) सूर्य और मङ्गल ये दोनों राशिमें प्रवेश करते ही अपने राशि-सम्बन्धी (गोचर) फल देते हैं। शुक्र और बृहस्पति राशिके मध्यमें जानेपर और चन्द्रमा तथा शनि ये दोनों राशिके अन्तिम तृतीयांशमें पहुँचनेपर अपने शुभ या अशुभ गोचर फल देते हैं। तथा बुध सर्वदा (आदि, मध्य, अन्तमें) अपने शुभाशुभ फलको देता है॥ २७८॥

(शुभाशुभ योग—) लग्न या चन्द्रमासे पञ्चम और सप्तम भाव शुभग्रह और अपने स्वामीसे युक्त या दृष्ट हों तो जातकको उन दोनों (पुत्र और स्त्री)-का सुख सुलभ होता है,


*आशय यह है कि पूर्वकेन्द्र (१ लग्न) में हों तो वयस्के आरम्भमें, मध्यकेन्द्र (४, १०)-में हों तो मध्य वयस् (युवावस्था)में, यदि पश्चिम केन्द्र (७)में हों तो अंतिम वयस्में सुखप्रद होते हैं। इससे सिद्ध है कि जिसके जन्म-समयमें तीन केन्द्रोंमें शुभग्रह हों, वह जीवनपर्यन्त सुखी रहता है।

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३३० * संक्षिप्त नारदपुराण *


अन्यथा नहीं। तथा कन्या लग्नमें रवि और मीन लग्नमें शनि हो तो ये दोनों स्त्रीका नाश करनेवाले होते हैं। इसी प्रकार पञ्चम भाव (मेष-वृश्चिकसे अतिरिक्त राशि)-में मङ्गल हो तो पुत्रका नाश करनेवाला होता है। यदि शुक्रसे केन्द्र (१, ४, ७, १०)-में पापग्रह हों अथवा दो पापग्रहोंके बीचमें शुक्र हों, उनपर शुभग्रहका योग या दृष्टि नहीं हो तो उस जातककी स्त्रीका मरण अग्निसे या गिरनेसे होता है। लग्नसे १२, ६ भावोंमें चन्द्रमा और सूर्य हों तो वह स्त्रीसहित* एक नेत्रवाले (काण) पुरुषको जन्म देता है। ऐसा मुनियोंने कहा है। लग्नसे सप्तम या नवम, पञ्चममें शुक्र और सूर्य दोनों हों तो उस जातककी स्त्री विकल (अङ्गहीना) होती है॥ २७९-२८२॥

शनि लग्नमें और शुक्र सप्तम भावमें राशिसन्धि (कर्क, वृश्चिक, मीनके अन्तिमांश) में हों तो वह जातक वन्ध्या स्त्रीका पति होता है। यदि पञ्चम भाव शुभग्रहसे युक्त या दृष्ट न हो, लग्नसे १२, ७वें और लग्नमें यदि पापग्रह हों तथा पञ्चम भावमें क्षीण चन्द्रमा स्थित हों तो वह पुरुष पुत्र और स्त्रीसे रहित होता है। शनिके वर्ग (राशि-नवांश)-में शुक्र सप्तम भावमें हो और शनिसे दृष्ट हो तो वह जातक परस्त्रीमें आसक्त होता है। यदि वे दोनों (शनि और शुक्र) चन्द्रमाके साथ हों तो वह स्वयं परस्त्रीमें आसक्त और उसकी पत्नी परपुरुषमें आसक्त होती है॥ २८३-२८४ १/२॥

शुक्र और चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें हों तो जातक स्त्रीहीन अथवा पुत्रहीन होता है। पुरुष और स्त्री ग्रह सप्तम भावमें हों और उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तो पति-पत्नी दोनों परिणताङ्ग (परमायुर्दाय भोगकर वृद्धावस्थातक जीनेवाले) होते हैं। दशम, सप्तम और चतुर्थ भावमें क्रमशः चन्द्रमा, शुक्र और पापग्रह हों तो जातक वंशका नाशक होता है। अर्थात् उसका वंश नष्ट हो जाता है। बुध जिस द्रेष्काणमें हो उसपर यदि केन्द्र-स्थित शनिकी दृष्टि हो तो जातक शिल्पकलामें कुशल होता है। शुक्र यदि शनिके नवमांशमें होकर द्वादश भावमें स्थित हो तो जातक दासीका पुत्र होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें रहकर शनिसे दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाववाला होता है। शुक्र और मङ्गल दोनों सप्तम भावमें स्थित हों और उनपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो जातक वातरोगी होता है। कर्क या वृश्चिकके नवमांशमें स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रहसे युक्त हो तो बालक गुह्य रोगसे ग्रस्त होता है। चन्द्रमा यदि पापग्रहोंके बीचमें रहकर लग्नमें स्थित हो तो उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है। चन्द्रमा दशम भावमें, मङ्गल सप्तम भावमें और शनि यदि वेशि (सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें हो तो जातक विकल (अङ्गहीन) होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों परस्पर नवमांशमें हों तो बालक शूलरोगी होता है। यदि दोनों किसी एक ही स्थानमें हों तो कृश (क्षीणशरीर) होता है। यदि सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल और शनि—ये चारों क्रमशः ८, ६, २, १२ भावोंमें स्थित हों तो इनमें जो बली हो, उस ग्रहके दोष (कफ, पित्त और वात-सम्बन्धी विकार)-से जातक नेत्रहीन होता है। यदि ९, ११, ३, ५—इन भावोंमें पापग्रह हों तथा उनपर शुभग्रहकी दृष्टि नहीं हो तो वे उत्पन्न शिशुके लिये कर्णरोग उत्पन्न करनेवाले होते हैं। सप्तम भावमें स्थित पापग्रह यदि शुभग्रहसे दृष्ट न हों तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते हैं। लग्नमें गुरु और सप्तम भावमें शनि हो तो जातक वातरोगसे पीड़ित होता है। ४ या ७ भावमें मङ्गल और लग्नमें बृहस्पति हो अथवा शनि लग्नमें और मङ्गल ९, ५, ७ भावमें हो अथवा बुधसहित चन्द्रमा १२ भावमें हो तो जातक उन्मादरोगसे पीड़ित होता है॥ २८५-२९३ १/२॥

यदि ५, ९, २ और १२ भावोंमें पापग्रह हों


*सारांश यह कि पुरुष तो काना होता ही है, उसे स्त्री भी कानी ही मिलती है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३३१

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३३१

तो उस जातकको बन्धन प्राप्त होता है (उसे जेलका कष्ट भोगना पड़ता है)। लग्नमें जैसी राशि हो उसके अनुकूल ही बन्धन समझना चाहिये। (जैसे चतुष्पद राशि लग्न हो तो रस्सीसे बँधकर, द्विपदराशि लग्न हो तो बेड़ीसे बँधकर तथा जलचर राशि लग्न हो तो बिना बन्धनके ही वह जेलमें रहता है।) यदि सर्प, शृङ्खला, पाशसंज्ञक द्रेष्काण लग्नमें हों तथा उनपर बली पापग्रहकी दृष्टि हो तो भी पूर्वोक्त प्रकारसे बन्धन प्राप्त होता है। मण्डल (परिवेष)-युक्त चन्द्रमा यदि शनिसे युक्त और मङ्गलसे देखा जाता हो तो जातक मृगी रोगसे पीड़ित, अप्रियभाषी और क्षयरोगसे युक्त होता है। मण्डल (परिवेष)-युक्त चन्द्रमा यदि दशम भावस्थित सूर्य, शनि और मङ्गलसे दृष्ट हो तो जातक भृत्य (दूसरेका नौकर) होता है; उनमें भी एकसे दृष्ट हो तो श्रेष्ठ दोसे दृष्ट हो तो मध्यम और तीनोंसे दृष्ट हो तो अधम भृत्य होता है॥ २९४-२९६॥

(स्त्रीजातककी विशेषता-) ऊपर कहे हुए पुरुष जातकके जो-जो फल स्त्री-जातकमें सम्भव हों, वे वैसे योगमें उत्पन्न स्त्रीमात्रके लिये समझने चाहिये। जो फल स्त्रीमें असम्भव हों, वे सब उसके पतिमें समझने चाहिये। स्त्रीके स्वामीकी मृत्युका विचार अष्टम भावसे, शरीरके शुभाशुभ फलका विचार लग्न और चन्द्रमासे तथा सौभाग्य और पतिके स्वरूप, गुण आदिका विचार सप्तम भावसे करना चाहिये॥ २९७ १/२॥ स्त्रीके जन्मसमयमें लग्न और चन्द्रमा दोनों समराशि और सम नवमांशमें हों तो वह स्त्री अपनी प्रकृति (स्त्रीस्वभाव)-से युक्त होती है। यदि उन दोनों (लग्न और चन्द्रमा) पर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो वह सुशीलतारूप आभूषणसे विभूषित होती है। यदि वे दोनों (लग्न तथा चन्द्रमा) विषमराशि और विषम नवमांशमें हों तो वह स्त्री पुरुषसदृश आकार और स्वभाववाली होती है। यदि उन दोनोंपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो स्त्री पापस्वभाववाली और गुणहीना होती है॥ २९८ १/२॥

लग्न और चन्द्रमाके आश्रित मङ्गलकी राशि (मेष-वृश्चिक)-में यदि मङ्गलका त्रिंशांश हो तो वह स्त्री बाल्यावस्थामें ही दुष्ट-स्वभाववाली होती है। शनिका त्रिंशांश हो तो दासी होती है। गुरुका त्रिंशांश हो तो सच्चरित्रा, बुधका त्रिंशांश हो तो मायावती (धूर्त) और शुक्रका त्रिंशांश हो तो वह उतावली होती है। शुक्रराशि (वृष-तुला)-में स्थित लग्न या चन्द्रमामें मङ्गलका त्रिंशांश हो तो नारी बुरे स्वभाववाली, शनिका त्रिंशांश हो तो पुनर्भू* (दूसरा पति करनेवाली), गुरुका त्रिंशांश हो तो गुणवती, बुधका त्रिंशांश हो तो कलाओंको जाननेवाली और शुक्रका त्रिंशांश हो तो लोकमें विख्यात होती है। बुधराशि (मिथुन-कन्या)-में स्थित लग्न या चन्द्रमामें यदि मङ्गलका त्रिंशांश हो तो मायावती, शनिका हो तो हीजड़ी, गुरुका हो तो पतिव्रता, बुधका हो तो गुणवती और शुक्रका हो तो चञ्चला होती है। चन्द्र-राशि (कर्क)-में स्थित लग्न या चन्द्रमामें यदि मङ्गलका त्रिंशांश हो तो नारी स्वेच्छाचारिणी, शनिका हो तो पतिके लिये घातक, गुरुका हो तो गुणवती, बुधका हो तो शिल्पकला जाननेवाली और शुक्रका त्रिंशांश हो तो नीच स्वभाववाली होती है। सिंहराशिस्थ लग्न या चन्द्रमामें यदि मङ्गलका त्रिंशांश हो तो पुरुषके समान आचरण करनेवाली, शनिका हो तो कुलटा स्वभाववाली, गुरुका हो तो रानी, बुधका हो तो पुरुषसदृश बुद्धिवाली और शुक्रका त्रिंशांश हो तो अगम्यागामिनी होती है। गुरुराशि (धनु-मीन)-स्थित लग्न या चन्द्रमामें मङ्गलका त्रिंशांश हो तो नारी गुणवती, शनिका हो तो भोगोंमें अल्प आसक्तिवाली, गुरुका हो तो गुणवती, बुधका हो


*पुनर्भू कहनेसे यह सिद्ध हुआ कि उसका जन्म शूद्रकुलमें होता है; क्योंकि शूद्रजातिमें स्त्रीके पुनर्विवाहकी प्रथा है।

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३३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

तो ज्ञानवती और शुक्रका त्रिंशांश हो तो पतिव्रता होती है। शनिराशि (मकर-कुम्भ) स्थित लग्न या चन्द्रमामें मङ्गलका त्रिंशांश हो तो स्त्री दासी, शनिका हो तो नीच पुरुषमें आसक्त, गुरुका हो तो पतिव्रता, बुधका हो तो दुष्ट-स्वभाववाली और शुक्रका त्रिंशांश हो तो संतान-हीना होती है। इस प्रकार लग्न और चन्द्राश्रित राशियोंके फल ग्रहोंके बलके अनुसार न्यून या अधिक समझने चाहिये॥ २९९ १/२—३०४॥

शुक्र और शनि ये दोनों परस्पर नवमांशमें (शुक्रके नवमांशमें शनि और शनिके नवमांशमें शुक्र) हों अथवा शुक्रराशि (वृष-तुला) लग्नमें कुम्भका नवमांश हो तो इन दोनों योगोंमें जन्म लेनेवाली स्त्री कामाग्निसे संतप्त हो स्त्रियोंसे भी क्रीड़ा करती है॥ ३०५॥

(पतिभाव—) स्त्रीके जन्मलग्नसे सप्तम भावमें कोई ग्रह नहीं हो तो उसका पति कुत्सित होता है। सप्तम स्थान निर्बल हो और उसपर शुभग्रहकी दृष्टि नहीं हो तो उस स्त्रीका पति नपुंसक होता है। सप्तम स्थानमें बुध और शनि हों तो भी पति नपुंसक होता है। यदि सप्तम भावमें चरराशि हो तो उसका पति परदेशवासी होता है। सप्तम भावमें सूर्य हो तो उस स्त्रीको पति त्याग देता है। मङ्गल हो तो वह स्त्री बालविधवा होती है। शनि सप्तम भावमें पापग्रहसे दृष्ट हो तो वह स्त्री कन्या (अविवाहिता) रहकर ही वृद्धावस्थाको प्राप्त होती है॥ ३०६-३०७॥

यदि सप्तम भावमें एकसे अधिक पापग्रह हो तो भी स्त्री विधवा होती है, शुभ और पाप दोनों हों तो वह पुनर्भू होती है। यदि सप्तम भावमें पापग्रह निर्बल हो और उसपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो भी स्त्री अपने पतिद्वारा त्याग दी जाती है, अन्यथा शुभग्रहकी दृष्टि होनेपर वह पतिप्रिया होती है॥ ३०८॥

मङ्गलके नवमांशमें शुक्र और शुक्रके नवमांशमें मङ्गल हो तो वह स्त्री परपुरुषमें आसक्त होती है। इस योगमें चन्द्रमा यदि सप्तम भावमें हो तो वह अपने पतिकी आज्ञासे कार्य करती है॥ ३०९॥

यदि चन्द्रमा और शुक्रसे संयुक्त शनि एवं मङ्गलकी राशि (मकर, कुम्भ, मेष और वृश्चिक) लग्नमें हों तो वह स्त्री कुलटा-स्वभाववाली होती है। यदि उक्त लग्नपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो वह स्त्री अपनी मातासहित कुलटा-स्वभाववाली होती है। यदि सप्तम भावमें मङ्गलका नवमांश हो और उसपर शनिकी दृष्टि हो तो वह नारी रोगयुक्त योनिवाली होती है। यदि सप्तम भावमें शुभग्रहका नवमांश हो तब तो वह पतिकी प्यारी होती है। शनिकी राशि या नवमांश सप्तम भावमें हो तो उस स्त्रीका पति वृद्ध और मूर्ख होता है। सप्तम भावमें मङ्गलकी राशि या नवमांश हो तो उसका पति स्त्रीलोलुप और क्रोधी होता है। बुधकी राशि या नवमांश हो तो विद्वान् और सब कार्यमें निपुण होता है। गुरुकी राशि या नवमांश हो तो जितेन्द्रिय और गुणी होता है। चन्द्रमाकी राशि या नवमांश हो तो कामी और कोमल होता है। शुक्रकी राशि या नवमांश हो तो भाग्यवान् तथा मनोहर स्वरूपवाला होता है। सूर्यकी राशि या नवमांश सप्तम भावमें हो तो उस स्त्रीका पति अत्यन्त कोमल और अधिक कार्य करनेवाला होता है॥ ३१०-३१२ १/२॥

शुक्र और चन्द्रमा लग्नमें हों तो वह स्त्री सुख तथा ईर्ष्यावाली होती है। यदि बुध और चन्द्रमा लग्नमें हों तो कलाओंको जाननेवाली तथा सुख और गुणोंसे युक्त होती है। शुक्र और बुध लग्नमें हों तो सौभाग्यवती, कलाओंको जाननेवाली और अत्यन्त सुन्दरी होती है। लग्नमें तीन शुभग्रह हों तो वह अनेक प्रकारके सुख, धन और गुणोंसे युक्त होती है॥ ३१३-३१४ १/२॥

पापग्रह अष्टम भावमें हो तो वह स्त्री अष्टमेश जिस ग्रहके नवमांशमें हो उस ग्रहके पूर्वकथित बाल्य आदि वयस्में विधवा होती है। यदि

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३३३

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३३३

द्वितीय भावमें शुभग्रह हों तो वह स्त्री स्वयं ही स्वामीके सम्मुख मृत्युको प्राप्त होती है। कन्या, वृश्चिक, सिंह या वृष राशिमें चन्द्रमा हो तो स्त्री थोड़ी संततिवाली होती है। यदि शनि मध्यम बली तथा चन्द्रमा, शुक्र और बुध ये तीनों निर्बल हों तथा शेष ग्रह (रवि, मङ्गल और गुरु) सबल होकर विषम राशि-लग्नमें हों तो वह स्त्री कुरूपा होती है ॥ ३१५-३१७ ॥

गुरु, मङ्गल, शुक्र, बुध ये चारों बली होकर समराशि लग्नमें स्थित हों तो वह स्त्री अनेक शास्त्रोंको और ब्रह्मको जाननेवाली तथा लोकमें विख्यात होती है ॥ ३१८ ॥

जिस स्त्रीके जन्मलग्नसे सप्तममें पापग्रह हो और नवम भावमें कोई ग्रह हो तो स्त्री पूर्वकथित नवमस्थ ग्रहजनित प्रव्रज्याको प्राप्त होती है। इन (कहे हुए) विषयोंका विवाह, वरण या प्रश्नकालमें भी विचार करना चाहिये ॥ ३१९ ॥

(निर्याण (मृत्यु) विचार—) लग्नसे अष्टम भावको जो-जो ग्रह देखते हैं, उनमें जो बलवान् हो उसके धातु (कफ, पित्त या वात)-के प्रकोपसे जातक (स्त्री-पुरुष)-का मरण होता है। अष्टम भावमें जो राशि हो, वह काल पुरुषके जिस अङ्ग (मस्तकादि)-में पड़ती हो; उस अङ्गमें रोग होनेसे जातककी मृत्यु होती है। बहुत ग्रहोंकी दृष्टि या योग हो तो उन-उन ग्रहोंसे सम्बन्ध रखनेवाले रोगोंसे मरण होता है। यथा अष्टममें सूर्य हों तो अग्निसे, चन्द्रमा हों तो जलसे; मङ्गल हों तो शस्त्रघातसे, बुध हों तो ज्वरसे, गुरु हों तो अज्ञात रोगसे, शुक्र हों तो प्याससे और शनि हों तो भूखसे मरण होता है। तथा अष्टम भावमें चर राशि हो तो परदेशमें, स्थिर राशि हो तो स्वस्थानमें और द्विस्वभाव राशि हो तो मार्गमें मृत्यु होती है। सूर्य और मङ्गल यदि १०, ४ भावमें हों तो पर्वत आदि ऊँचे स्थानसे गिरकर मनुष्यकी मृत्यु होती है ॥ ३२०-३२२ ॥

४, ७, १० भावोंमें यदि शनि, चन्द्र, मङ्गल हों तो कूपमें गिरकर मरण होता है। कन्या-राशिमें रवि और चन्द्रमा दोनों हों, उनपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो अपने सम्बन्धीके द्वारा मरण होता है। यदि उभयोदय (मीन) लग्नमें चन्द्रमा और सूर्य दोनों हों तो जलमें मरण होता है। यदि मङ्गलकी राशिमें स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहोंके बीचमें हो तो शस्त्र या अग्निसे मृत्यु होती है ॥ ३२३-३२४ ॥

मकरमें चन्द्रमा और कर्कमें शनि हों तो जलोदररोगसे मरण होता है। कन्याराशिमें स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहोंके बीचमें हों तो रक्तशोषरोगसे मृत्यु होती है। यदि दो पापग्रहोंके बीचमें स्थित चन्द्रमा, शनिकी राशि (मकर और कुम्भ)-में हों तो रज्जु (रस्सी), अग्नि अथवा ऊँचे स्थानसे गिरकर मृत्यु होती है। ५, ९ भावोंमें पापग्रह हो और उनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो बन्धनसे मृत्यु होती है। अष्टम भावमें पाश, सर्प या निगड द्रेष्काण हो तो भी बन्धनसे ही मृत्यु होती है। पापग्रहके साथ बैठा हुआ चन्द्रमा यदि कन्याराशिमें होकर सप्तम भावमें स्थित हो तथा मेषमें शुक्र और लग्नमें सूर्य हो तो अपने घरमें स्त्रीके निमित्तसे मरण होता है। चतुर्थ भावमें मङ्गल या सूर्य हों, दशम भावमें शनि हो और लग्न, ५, ९ भावोंमें पापग्रहसहित चन्द्रमा हो अथवा चतुर्थ भावमें सूर्य और दशममें मङ्गल रहकर क्षीण चन्द्रमासे दृष्ट हों तो इन योगोंमें काष्ठसे आहत होकर मनुष्यकी मृत्यु होती है। यदि ८, १०, लग्न तथा ४ भावोंमें क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनि और सूर्य हों तो लाठीके प्रहारसे मृत्यु होती है। यदि वे ही (क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनि तथा सूर्य) १०, ९ लग्न और ५ भावोंमें हों तो मुद्गर आदिके आघातसे मृत्यु होती है। यदि ४, ७, १० भावोंमें क्रमशः मङ्गल, रवि और शनि हों तो शस्त्र, अग्नि तथा राजाके द्वारा मृत्यु होती है। यदि शनि, चन्द्रमा और मङ्गल—ये २, ४, १० भावोंमें हों तो कीड़ोंके

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३३४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


क्षतसे शरीरका पतन (मरण) होता है। यदि दशम भावमें सूर्य और चतुर्थ भावमें मङ्गल हों तो सवारीपरसे गिरनेके कारण मृत्यु होती है। यदि क्षीण चन्द्रमाके साथ मङ्गल सप्तम भावमें हो तो यन्त्र (मशीन)-के आघातसे मृत्यु होती है। यदि मङ्गल, शनि और चन्द्रमा—ये तुला, मेष तथा शनिकी राशि (मकर-कुम्भ)-में हों अथवा क्षीण चन्द्रमा, सूर्य और मङ्गल—ये १०, ७, ४ भावोंमें स्थित हो तो विष्ठाके समीप मृत्यु होती है। क्षीण चन्द्रमापर मङ्गलकी दृष्टि हो और शनि सप्तम भावमें हो तो गुह्य (बवासीर आदि)-रोग या कीड़ा, शस्त्र, अग्नि अथवा काष्ठके आघातसे मरण होता है। मङ्गलसहित सूर्य सप्तम भावमें, शनि अष्टममें और क्षीण चन्द्रमा चतुर्थ भावमें हों तो पक्षीद्वारा मरण होता है। यदि लग्न, ५, ८, ९ भावोंमें सूर्य, मङ्गल, शनि और चन्द्रमा हों तो पर्वत-शिखरसे गिरनेके कारण अथवा वज्रपातसे या दीवार गिरनेसे मृत्यु होती है॥ ३२५-३३५॥

लग्नसे २२ वाँ द्रेष्काण अर्थात् अष्टम भावका द्रेष्काण जो हो, उसका स्वामी अथवा अष्टम भावका स्वामी—ये दोनों या इनमेंसे जो बली हो, वह अपने गुणोंसे (पूर्वोक्त अग्निशस्त्रादिद्वारा) मनुष्यके लिये मरणकारक होता है। लग्नमें जो नवमांश होता है, उसका स्वामी जो ग्रह हो उसके समान स्थान (अर्थात् वह जिस राशिमें हो उस राशिका जैसा स्थान बताया गया है, वैसे स्थान) तथा उसपर जिस ग्रहका योग या दृष्टि हो उसके समान स्थानमें, परदेशमें मनुष्यका मरण होता है तथा लग्नके जितने अंश अनुदित (भोग्य) हों, उन अंशोंमें जितने समय हों¹, उतने समयतक मरणकालमें मोह होता है। यदि उसपर अपने स्वामीकी दृष्टि हो तो उससे द्विगुणित और शुभग्रहकी दृष्टि हो तो उससे त्रिगुणित समयपर्यन्त मोह होता है। इस विषयकी अन्य बातें अपनी बुद्धिसे विचारकर समझनी चाहिये॥ ३३६-३३७ १/२॥

(शव-परिणाम—) अष्टम स्थानमें जिस प्रकारका द्रेष्काण हो उसके अनुसार देहधारीकी मृत्यु और उसके शवके परिणामपर विचार करना चाहिये। यथा—अग्नि (पापग्रह)-का द्रेष्काण हो तो मृत्युके बाद उसका शव जलाकर भस्म किया जाता है। जल (सौम्य) द्रेष्काण हो तो जलमें फेंका जानेपर वह वहीं गल जाता है। यदि सौम्य द्रेष्काण पापग्रहसे युक्त या पाप द्रेष्काण शुभग्रहसे युक्त हो तो मुर्दा न जलाया जाता है, न जलमें गलाया जाता है, अपितु सूर्यकिरण और हवासे सूख जाता है। यदि सर्प द्रेष्काण² अष्टम भावमें हो तो उस मुर्देको गीदड़ और कौए आदि नोंचकर खाते हैं॥ ३३८ १/२॥

(पूर्वजन्मस्थिति—) सूर्य और चन्द्रमामें जो अधिक बलवान् हो, वह जिस द्रेष्काणमें स्थित हो उस द्रेष्काणके स्वामीके अनुसार पूर्वजन्मकी स्थिति समझी जाती है। यथा—उक्त द्रेष्काणका स्वामी गुरु हो तो जातक पूर्वजन्ममें देवलोकमें था। चन्द्रमा या शुक्र द्रेष्काणका स्वामी हो तो वह पितृलोकमें था। सूर्य या मङ्गल द्रेष्काणका स्वामी हो तो वह जातक पहले जन्ममें भी मर्त्यलोकमें ही था और शनि या बुध हो तो वह पहले नरकलोकमें रहा है—ऐसा समझना चाहिये। यदि उक्त द्रेष्काणका स्वामी अपने उच्चमें हो तो जातक पूर्वजन्ममें देवादि लोकमें श्रेष्ठ था। यदि उच्च और नीचके मध्यमें हो तो उस लोकमें उसकी मध्यम स्थिति थी और यदि अपने नीचमें हो तो वह उस लोकमें निम्नकोटिकी अवस्थामें था—ऐसा उच्च और नीच स्थानके तारतम्यसे समझना चाहिये।

(गति—भावी जन्मकी स्थिति—) षष्ठ और अष्टम भावके द्रेष्काणोंके स्वामीमेंसे जो अधिक


१. ३० अंशोंमें मध्यममानसे दो घंटा (५ घटी) समय होता है; उसी अनुपातसे समय समझना चाहिये।
२. आगे (पृष्ठ ३१६ में) द्रेष्काणके स्वरूप देखिये।

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ३३५
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बली हो, मरनेके बाद जातक उसी ग्रहके (पूर्वदर्शित) लोकमें जाता है तथा सप्तम स्थानमें स्थित ग्रह बली हो तो वह अपने लोकमें ले जाता है।

(मोक्षयोग—) यदि बृहस्पति अपने उच्चमें होकर ६, १, ४, ७, ८, १० अथवा १२ में शुभग्रहके नवमांशमें हो और अन्य ग्रह निर्बल हों तो मरण होनेपर मनुष्यका मोक्ष होता है। यह योग जन्म और मरण दोनों कालोंसे देखना चाहिये ॥ ३३९–३४१\frac{१}{२} ॥

(अज्ञात जन्म-समयको जाननेका प्रकार—) जिस व्यक्तिके आधान या जन्मका समय अज्ञात हो, उसके प्रश्न-लग्नसे जन्म-समय समझना चाहिये। प्रश्न-लग्नके पूर्वार्ध (१५ अंशतक)-में उत्तरायण और उत्तरार्ध (१५ अंशके बाद)-में दक्षिणायन जन्मका समय समझना चाहिये। त्र्यंश (द्रेष्काण) द्वारा क्रमशः लग्न, ५, ९ राशिमें गुरु समझकर फिर प्रश्नकर्ताके वयस्के अनुसार वर्षमानकी कल्पना करनी चाहिये¹। लग्नमें सूर्य हो तो ग्रीष्मऋतु, अन्यथा अन्य ग्रहोंके ऋतुका वर्णन पहले किया जा चुका है। अयन और ऋतुमें भिन्नता हो तो चन्द्रमा, बुध और गुरुकी ऋतुओंके स्थानमें क्रमसे शुक्र, मङ्गल, शनिकी ऋतु परिवर्तित करके समझना चाहिये तथा ऋतु सर्वथा सूर्यकी राशिसे ही (सौरमाससे ही) ग्रहण करनी चाहिये। इस प्रकार अयन और ऋतुके ज्ञान होनेपर लग्नके द्रेष्काणमें पूर्वार्ध हो तो ऋतुका प्रथम मास, उत्तरार्ध हो तो द्वितीय मास समझना चाहिये तथा द्रेष्काणके पूर्वार्ध या उत्तरार्धके भुक्तांशोंसे अनुपात² द्वारा तिथि (सूर्यके गत अंशादि) का ज्ञान करना चाहिये ॥ ३४२–३४४\frac{१}{२} ॥


१. अर्थात् लग्नमें प्रथम द्रेष्काण हो तो प्रश्नकर्ताके जन्म-समयमें लग्नराशिमें ही गुरु था, द्वितीय द्रेष्काण हो तो प्रश्नलग्नसे ५वीं राशिमें, तृतीय द्रेष्काण हो तो प्रश्नलग्नसे ९वीं राशिमें जन्मकालीन गुरुकी स्थिति समझे। फिर वर्तमान समयमें गुरुकी राशितक गिनकर वर्ष-संख्या बनावे। इस प्रकार संख्या १२ से कम ही होगी। इतने वर्षका वयस् यदि प्रश्नकर्ताके अनुमानसे ठीक हो तो ठीक माने, नहीं तो उस संख्यामें १२ जोड़ता जाय। जब प्रश्नकर्ताके वयस्के अनुसार वर्ष-संख्याका अनुमान हो जाय तो उस संख्याको वर्तमान संवत्में घटानेसे प्रश्नकर्ताका जन्मसंवत् होगा। उस संवत्में गुरु उस राशिमें मिलेगा ही, चाहे १ वर्ष आगे मिले या पीछे। जहाँ उस राशिमें गुरु मिले, वही प्रश्नकर्ताका जन्म-संवत्सर समझना चाहिये। फिर उक्त रीतिसे अयनका ज्ञान करना चाहिये।

२. अनुपात इस प्रकार है कि ५ अंशकी कला (३००)-में ३० तिथि (अंश) हैं तो भुक्त द्रेष्काणांशांकी कलामें क्या होंगी ?

इसकी उत्तर-क्रिया नीचे देखिये—

मान लीजिये, किसी अनाथ-बालकको अपने जन्म-समयका ज्ञान नहीं है। उसकी उम्र अनुमानसे ८ या ९ वर्षकी प्रतीत होती है। उसने अपना जन्म-समय जाननेके लिये संवत् २०१० ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमा गुरुवारको प्रश्न किया। उस समयकी लग्न-राश्यादि २।१४।४५ है और बृहस्पति-राश्यादि १।१८।२।५ (वृष राशिमें) है। यहाँ लग्नमें द्वितीय द्रेष्काण है, अतः लग्न (मिथुन)- से पाँचवीं तुला राशिमें उसके जन्म-समयमें बृहस्पतिकी स्थिति ज्ञात हुई। प्रश्न-समयका बृहस्पति वृषभमें है, जो तुलासे ८वीं संख्यामें है, इसलिये गत वर्ष-संख्या ७ हुई, इससे ज्ञात हुआ कि आजसे ७, १९ तथा ३१ इत्यादि वर्ष पूर्व बृहस्पतिकी तुलामें स्थिति हो सकती है, क्योंकि बृहस्पति एक राशिमें एक वर्ष रहता है। परंतु इन (७, १९, ३१) संख्याओंमें ७ संख्या ही प्रश्नकर्ताकी उम्रके समीप होनेके कारण आजसे ७ वर्ष पूर्व जन्म-समय स्थिर हुआ। इसलिये प्रश्न-संवत् २०१० में ७ घटानेसे शेष २००३ जन्मका संवत् निश्चित हुआ। उस संवत्के पञ्चाङ्गको देखा तो तुलामें बृहस्पतिकी स्थिति ज्ञात हुई। राशिके पूर्वार्धमें प्रश्नलग्न है, अतः जन्मका समय उत्तरायण सिद्ध हुआ। तथा प्रश्नलग्नमें शुक्रका द्रेष्काण है, अतः वसन्त-ऋतु होनेका निश्चय हुआ। प्रश्नकालमें द्वितीय द्रेष्काणका पूर्वार्ध होनेके कारण वसन्त-ऋतुका प्रथम मास (सौर चैत्र) जन्मका मास निश्चित हुआ।

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३३६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


(दिन-रात्रि जन्म-ज्ञान—) प्रश्न लग्नमें दिनसंज्ञक, रात्रि-संज्ञक राशियाँ हों तो विलोमक्रमसे (दिनसंज्ञक राशिमें रात्रि और रात्रिसंज्ञक राशिमें दिन) जन्मका समय समझना चाहिये और लग्नके अंशादिसे अनुपात¹ द्वारा इष्ट घट्यादिको समझना चाहिये।

(जन्म-लग्नज्ञान—) केवल जन्म-लग्न जाननेके लिये प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो लग्नसे (१, ५, ९में) जो राशि बली हो, वही उसका जन्म-लग्न समझना चाहिये अथवा वह जिस अङ्गका स्पर्श करते हुए प्रश्न करे, उस अङ्गकी राशिको ही जन्म-लग्न कहना चाहिये।

(जन्म-राशि-ज्ञान—) जन्म-राशि जाननेके लिये प्रश्न करे तो प्रश्न-लग्नसे जितने आगे चन्द्रमा हो, चन्द्रमासे उतने ही आगे जो राशि हो वह पूछनेवालेकी जन्मराशि समझनी चाहिये॥ ३४५-३४६॥

(प्रकारन्तरसे अज्ञात जन्मकालादिका ज्ञान—) प्रश्नलग्नमें वृष या सिंह हो तो लग्नराश्यादिको कलात्मक बनाकर १० से गुणा करे। मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से, मेष या तुला हो तो ७ से, मकर या कन्या हो तो ५ से गुणा करे। शेष राशियों (कर्क, धनु, कुम्भ, मीन)-मेंसे कोई लग्न हो तो उसकी कलाको अपनी संख्यासे (जैसे कर्कको ४ से) गुणा करे। यदि लग्नमें ग्रह हो तो फिर उसी गुणनफलको ग्रहगुणकोंसे भी गुणा करे। जैसे—बृहस्पति हो तो १० से, मङ्गल हो तो ८ से, शुक्र हो तो ७ से, बुध हो तो ५ से, अन्य ग्रह (रवि, शनि और चन्द्रमा) हो तो ५ से गुणा करे। इस प्रकार लग्नकी राशिके अनुसार गुणन तो निश्चित ही रहता है। यदि उसमें ग्रह हो तभी ग्रहका गुणन भी करना चाहिये। जितने ग्रह हों, सबके गुणकसे गुणा करना चाहिये इस प्रकार गुणनफलको ध्रुवपिण्ड मानकर उसको ७ से गुणाकर २७ के द्वारा भाग देकर १ आदि शेषके अनुसार अश्विनी आदि जन्म-नक्षत्र समझने चाहिये। इस प्रणालीमें विशेषता यह है कि उक्त रीतिसे आयी हुई संख्यामें कभी ९ जोड़कर और कभी ९ घटाकर नक्षत्र लिया जाता है।² तथा उक्त ध्रुवपिण्डको १० से गुणा करके गुणनफलसे वर्ष, ऋतु और मास समझे³। पक्ष और तिथि जाननी हो तो ध्रुवपिण्डको ८ से गुणा करके २ से भाग देकर


फिर प्रश्नलग्नस्थ द्रेष्काणके गतांशादि ४।४५।० की कला २८५ को ३० से गुणा कर गुणनफल ८५५० में ३०० का भाग देनेसे लब्ध २८।३० यह मीनमें सूर्यके भुक्तांश हुए। अतः मेषसे ११ वीं राशि जोड़नेपर जन्मकालका स्पष्ट सूर्य ११।२८।३० हुआ। यह चैत्र शुक्ला ११ शुक्रवारको मिलता है, अतः प्रश्नकर्ताका वही जन्म-मास और संवत् निश्चित हुआ।

अब इष्टकाल जाननेके लिये उस दिन उदयकालिक स्पष्ट सूर्य-राश्यादि ११।२८।१५।२० तथा सूर्यकी गति ५८।४५ है तो निश्चित किये हुए जन्मकालिक सूर्य ११।२८।३०।० और उदयकालिक सूर्य ११।२८।१५।२० के अन्तर १४।४० कलाको ६० से गुणा कर गुणनफल ८८० में सूर्यकी गति ५८।४५ का भाग देनेपर लब्ध घट्यादि १४।५९ हुई। यह जन्म सूर्यसे अधिक होनेके कारण उदयकालके बादका इष्टकाल हुआ। इसके द्वारा तात्कालिक अन्य ग्रह और लग्नादि द्वादश भावोंका साधन करके जन्म-पत्र बनता है, वह नष्ट जन्म-पत्र कहलाता है, उससे भी असली जन्म-पत्रके समान ही फल घटित होता है।

१.यहाँ अनुपात ऐसा है कि ३० अंशमें दिनमान या रात्रिमानकी घटी तो लग्न भुक्तांशमें क्या ?
२.९ जोड़ने-घटानेका नियम यह है कि प्रश्नलग्नमें प्रथम द्रेष्काण हो तो ९ जोड़कर, तीसरा द्रेष्काण हो तो ९ घटाकर तथा मध्य द्रेष्काण हो तो यथाप्राप्त नक्षत्र ग्रहण करे।
३.यथा—गुणनफलमें १२० का भाग देकर शेष तुल्य वर्ष तथा इसी गुणनफलमें ६ का भाग देकर शेषके अनुसार शिशिरादि ऋतु जाने एवं मास जानना हो तो गुणनफलमें १२ से भाग देकर शेष तुल्य चैत्रादि मास समझे। यदि ऋतुज्ञान होनेपर मास जानना हो तो उक्त गुणनफलमें दोसे भाग देकर एक शेषमें प्रथम और दो शेषमें द्वितीय मास समझे।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३३७

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३३७

एक शेष हो तो शुक्लपक्ष और दो शेष हो तो कृष्णपक्ष समझे। इसमें भी ९ जोड़ या घटाकर ग्रहण करना चाहिये। अर्थात् गुणनफलमें ९ जोड़ या ९ घटाकर भाग देना चाहिये। इसी प्रकार पक्षज्ञान होनेपर गुणनफलमें ही १५ से भाग देकर शेषके अनुसार प्रतिपदा आदि तिथि समझे तथा अहोरात्र जानना हो तो ध्रुवपिण्डको ७ से गुणा करके दोसे भाग देकर एक शेष हो तो दिन और दो शेष हो तो रात्रि समझे। लग्न-नवांश, इष्ट-घड़ी तथा होरा जानना हो तो ध्रुवपिण्डको ५ से गुणा करके अपने-अपने विकल्पसे (अर्थात् लग्न जाननेके लिये १२से, इष्ट घड़ी¹ जाननेके लिये ६० से (अथवा दिन या रात्रिका ज्ञान होनेपर दिनमान या रात्रिमान-घटीसे), नवमांशके लिये ९ से तथा होराके लिये २ से भाग देकर शेषद्वारा सबका ज्ञान करना चाहिये। इस प्रकार जिनके जन्म-समय आदिका ज्ञान न हो उनके लिये इन सब बातोंका विचार करना चाहिये॥ ३४७-३५०॥

(द्रेष्काणका स्वरूप—) हाथमें फरसा लिये हुए काले रंगका पुरुष, जिसकी आँखें लाल हों और जो सब जीवोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो, मेषके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। प्याससे पीडित एक पैरसे चलनेवाला, घोड़ेके समान मुख, लाल वस्त्रधारी और घड़ेके समान आकार—यह मेषके द्वितीय द्रेष्काणका स्वरूप है। कपिलवर्ण, क्रूरदृष्टि, क्रूरस्वभाव, लाल वस्त्रधारी और अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाला—यह मेषके तृतीय द्रेष्काणका स्वरूप है। भूख और प्याससे पीड़ित, कटे-छँटे घुँघराले केश तथा दूधके समान धवल वस्त्र—यह वृषके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। मलिनशरीर, भूखसे पीडित, बकरेके समान मुख और कृषि आदि कार्योंमें कुशल—यह वृषके दूसरे द्रेष्काणका रूप है। हाथीके समान विशालकाय, शरभ²के समान पैर, पिङ्गल वर्ण और व्याकुल चित्त—यह वृषके तीसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। सुईसे सीने-पिरोनेका काम करनेवाली, रूपवती, सुशीला तथा संतानहीना नारी, जिसने हाथको ऊपर उठा रखा है, मिथुनका प्रथम द्रेष्काण है। कवच और धनुष धारण किये हुए उपवनमें क्रीडा करनेकी इच्छासे उपस्थित गरुडसदृश मुखवाला पुरुष मिथुनका दूसरा द्रेष्काण है। नृत्य आदिकी कलामें प्रवीण, वरुणके समान रत्नोंके अनन्त भण्डारसे भरा-पूरा,


१. जैसे—संवत् २०१० चैत्र शुक्ला ५ गुरुवारको अनुमानतः ३० वर्षकी अवस्थावाले किसी पुरुषने अपना अज्ञात जन्म-समय जाननेके लिये प्रश्न किया। उस समयकी लग्न-(वृष) राश्यादि १।५।२९ है और लग्नमें कोई ग्रह नहीं है तो लग्न-राश्यादिकी २१२९ कलाको वृषलग्नके गुणकाङ्क १० से गुणा करनेपर २१२९० यह ध्रुवपिण्ड हुआ। लग्नमें कोई ग्रह नहीं है, अतः दूसरा गुणक नहीं प्राप्त हुआ। अब प्रश्नकर्ताकी गत वर्ष-संख्या जाननेके लिये ध्रुवपिण्डको फिर १० से गुणा करके गुणनफल २१२९०० में १२० का भाग देनेसे शेष २० वर्ष-संख्या हुई; परंतु यह संख्या अनुमानसे कुछ न्यून है, अतः लग्नमें प्रथम द्रेष्काण होनेके कारण आगत शेषमें ९ जोड़नेसे २९ हुआ। यही सम्भावित वर्ष होनेके कारण प्रश्नकर्ताके जन्मसे गत वर्ष हुए। इस संख्याको वर्तमान संवत् २०१० में घटानेपर शेष १९८१ यह प्रश्नकर्ताका जन्म-संवत् हुआ। पुनः मास जाननेके लिये दशगुणित ध्रुवपिण्डमें ९ जोड़ा गया तो २१२९०९ हुआ। इसमें १२ का भाग देनेसे शेष ५ रहा। अतः चैत्रसे पाँचवाँ श्रावण जन्म-मास हुआ। पक्ष जाननेके लिये ध्रुवपिण्ड २१२९० को ८ से गुणा कर गुणनफल १७०३२० में ९ जोड़कर २ का भाग देनेसे १ शेष रहनेके कारण शुक्लपक्ष हुआ। तिथि जाननेके लिये उसी अष्टगुणित एवं नवयुत ध्रुवपिण्ड १७०३२९ में १५ का भाग देनेपर शेष ८ रहा, अतः चतुर्थी तिथि हुई। इष्ट घड़ी जाननेके लिये ध्रुवपिण्ड २१२९० को ५ से गुणाकर गुणनफलमें ९ जोड़कर योगफल १०६४५९ में ६० का भाग देनेपर शेष १९ रहा। वही इष्ट घड़ी हुई। इस प्रकार संवत् १९८१ श्रावण शुक्ला ४ की गतघटी १९ (घड़ी बीतनेपर) प्रश्नकर्ताका जन्म-समय निश्चित हुआ।

२. पुराणोंमें शरभके आठ पैर कहे गये हैं और उसे व्याघ्र-सिंहसे भी अधिक बलिष्ठ एवं भयङ्कर बताया गया है; परंतु यह अब कहीं उपलब्ध नहीं होता। शरभका दूसरा अर्थ ऊँट भी है।

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३३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

धनुर्धर वीर पुरुष मिथुनका तीसरा द्रेष्काण है। गणेशजीके समान कण्ठ, शूकरके सदृश मुख, शरभके-से पैर और वनमें रहनेवाला—यह कर्कके प्रथम द्रेष्काणका रूप है। सिरपर सर्प धारण किये, पलाशकी शाखा पकड़कर रोती हुई कर्कशा स्त्री—यह कर्कके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। चिपटा मुख, सर्पसे वेष्टित, स्त्रीकी खोजमें नौकापर बैठकर जलमें यात्रा करनेवाला पुरुष—यह कर्कके तीसरे द्रेष्काणका रूप है॥ ३५१-३५६॥ सेमलके वृक्षके नीचे गीदड़ और गीधको लेकर रोता हुआ कुत्ते-जैसा मनुष्य—यह सिंहके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। धनुष और कृष्ण मृगचर्म धारण किये, सिंह-सदृश पराक्रमी तथा घोड़ेके समान आकृतिवाला मनुष्य—यह सिंहके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। फल और भोज्यपदार्थ रखनेवाला, लंबी दाढ़ीसे सुशोभित, भालू-जैसा मुख और वानरोंके-से चपल स्वभाववाला मनुष्य—सिंहके तृतीय द्रेष्काणका रूप है। फूलसे भरे कलशवाली, विद्याभिलाषिणी, मलिन वस्त्रधारिणी कुमारी कन्या—यह कन्या राशिके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। हाथमें धनुष, आय-व्ययका हिसाब रखनेवाला, श्याम-वर्ण शरीर, लेखनकार्यमें चतुर तथा रोएँसे भरा मनुष्य—यह कन्या राशिके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप है। गोरे अङ्गोंपर धुले हुए स्वच्छ वस्त्र, ऊँचा कद, हाथमें कलश लेकर देवमन्दिरकी ओर जाती हुई स्त्री—यह कन्या राशिके तीसरे द्रेष्काणका परिचय है॥ ३५७-३५९॥ हाथमें तराजू और बटखरे लिये बाजारमें वस्तुएँ तौलनेवाला तथा बर्तन-भाँड़ोंकी कीमत कूतनेवाला पुरुष तुलाराशिका प्रथम द्रेष्काण है। हाथमें कलश लिये भूख-प्याससे व्याकुल तथा गीधके समान मुखवाला पुरुष, जो स्त्री-पुत्रके साथ विचरता है, तुलाका दूसरा द्रेष्काण है। हाथमें धनुष लिये हरिनका पीछा करनेवाला, किन्नरके समान चेष्टावाला, सुवर्णकवचधारी पुरुष तुलाका तृतीय द्रेष्काण है। एक नारी, जिसके पैर नाना प्रकारके सर्प लिपटे होनेसे श्वेत दिखायी देते हैं, समुद्रसे किनारेकी ओर जा रही है, यही वृश्चिकके प्रथम द्रेष्काणका रूप है। जिसके सब अङ्ग सर्पोंसे ढके हैं और आकृति कछुएके समान है तथा जो स्वामीके लिये सुखकी इच्छा करनेवाली है; ऐसी स्त्री वृश्चिकका दूसरा द्रेष्काण है। मलयगिरिका निवासी सिंह, मुखाकृति कछुए-जैसी है, कुत्ते, शूकर और हरिन आदिको डरा रहा है, वही वृश्चिकका तीसरा द्रेष्काण है॥ ३६०-३६२॥ मनुष्यके समान मुख, घोड़े-जैसा शरीर, हाथमें धनुष लेकर तपस्वी और यज्ञोंकी रक्षा करनेवाला पुरुष धनुराशिका द्रेष्काण है। चम्पापुष्पके समान कान्तिवाली, आसनपर बैठी हुई, समुद्रके रत्नोंको बढ़ानेवाली, मझोले कदकी स्त्री धनुका दूसरा द्रेष्काण है। दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये, आसनपर बैठा हुआ, चम्पापुष्पके सदृश कान्तिमान्, दण्ड, पट्ट-वस्त्र और मृगचर्म धारण करनेवाला पुरुष धनुका तीसरा द्रेष्काण है। मगरके समान दाँत, रोएँसे भरा शरीर तथा सूअर-जैसी आकृतिवाला पुरुष मकरका प्रथम द्रेष्काण है। कमलदलके समान नेत्रोंवाली, आभूषण-प्रिया श्यामा स्त्री मकरका दूसरा द्रेष्काण है। हाथमें धनुष, कम्बल, कलश और कवच धारण करनेवाला किन्नरके समान पुरुष मकरका तीसरा द्रेष्काण है॥३६३-३६६॥ गीधके समान मुख, तेल, घी और मधु पीनेकी इच्छावाला, कम्बलधारी पुरुष कुम्भका प्रथम द्रेष्काण है। हाथमें लोहा, शरीरमें आभूषण तथा मस्तकपर भाँड़ (बर्तन) लिये मलिन वस्त्र पहनकर जली गाड़ीपर बैठी हुई स्त्री कुम्भका दूसरा द्रेष्काण है। कानमें बड़े-बड़े रोम, शरीरमें श्याम कान्ति, मस्तकपर किरीट तथा हाथमें फल-पत्र धारण करनेवाला बर्तनका व्यापारी कुम्भका तीसरा द्रेष्काण है। भूषण बनानेके लिये नाना प्रकारके रत्नोंको हाथमें लेकर समुद्रमें नौकापर बैठा हुआ पुरुष मीनका प्रथम द्रेष्काण है। जिसके मुखकी कान्ति चम्पाके

(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५५)

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ३३१
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पुष्पके सदृश मनोहर है, वह अपने परिवारके साथ नौकापर बैठकर समुद्रके बीचसे तटकी ओर आती हुई स्त्री मीनका दूसरा द्रेष्काण है। गड्ढेके समीप तथा चोर और अग्निसे पीड़ित होकर रोता हुआ, सर्पसे वेष्टित, नग्न शरीरवाला पुरुष मीन राशिका तीसरा द्रेष्काण है। इस प्रकार मेषादि बारहों राशियोंमें होनेवाले छत्तीस द्रेष्काणांशके रूप क्रमसे बताये गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! यह संक्षेपमें जातक नामक स्कन्ध कहा गया है। अब लोक-व्यवहारके लिये उपयोगी संहितास्कन्धका वर्णन सुनो— ॥ ३६७-३७० ॥

(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५५)


त्रिस्कन्ध ज्योतिषका संहिताप्रकरण (विविध उपयोगी विषयोंका वर्णन)

सनन्दनजी बोले—नारदजी! चैत्रादि मासोंमें क्रमशः मेषादि राशियोंमें सूर्यकी संक्रान्ति होती है*। चैत्र शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भमें जो वार (दिन) हो, वही ग्रह उस (चान्द्र) वर्षका राजा होता है। सूर्यके मेषराशि-प्रवेशके समय जो वार हो, वह सेनापति (या मन्त्री) होता है। कर्क राशिकी संक्रान्तिके समय जो वार हो, वह सस्य (धान्य)-का अधिपति होता है। उक्त वर्ष आदिका अधिपति यदि सूर्य हो तो वह मध्यम (शुभ और अशुभ दोनों) फल देता है। चन्द्रमा हो तो उत्तम फल देता है। मङ्गल अधिपति हो तो अनिष्ट (अशुभ) फल देनेवाला होता है। बुध, गुरु और शुक्र—ये तीनों अति उत्तम (शुभ) फलकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। शनि अधिपति हो तो अशुभ फल होता है। इन ग्रहोंके बलाबल देखकर तदनुसार इनके न्यून या पूर्ण फल समझने चाहिये ॥ १-३ ॥

(धूमकेतु—पुच्छलतारा आदिके फल—)
यदि कदाचित् कहींसे सूर्य-मण्डलमें दण्ड (लाठी), कबन्ध (मस्तकहीन शरीर) कौआ या कीलके आकारवाले केतु (चिह्न) देखनेमें आवे, तो वहाँ व्याधि, भ्रान्ति तथा चोरोंके उपद्रवसे धनका नाश होता है। छत्र, ध्वज, पताका या सजल मेघखण्ड-सदृश अथवा स्फुलिङ्ग (अग्निकण)-सहित धूम सूर्यमण्डलमें दीख पड़े, तो उस देशका नाश होता है। शुक्ल, लाल, पीला अथवा काला सूर्यमण्डल दीखनेमें आवे, तो क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णोंको पीड़ा होती है। मुनिवर! यदि दो, तीन या चार प्रकारके रंग सूर्यमण्डलमें दीख पड़ें, तो राजाओंका नाश होता है। यदि सूर्यकी ऊर्ध्वगामिनी किरण लाल रंगकी दीख पड़े, तो सेनापतिका नाश होता है। यदि उसका पीला वर्ण हो तो राजकुमारका, श्वेत वर्ण हो तो राजपुरोहितका तथा उसके अनेक वर्ण हों तो प्रजाजनोंका नाश होता है। इसी तरह धूम्र वर्ण हो तो राजाका और पिशङ्ग (कपिल) वर्ण हो तो मेघका नाश होता है। यदि सूर्यकी उक्त किरणें नीचेकी ओर हों, तो संसारका नाश होता है ॥ ४-७½ ॥

सूर्य शिशिर-ऋतु (माघ-फाल्गुन)-में ताँबेके समान (लाल) दीख पड़े, तो संसारके लिये शुभ (कल्याणकारी) होता है। ऐसे ही वसन्त (चैत्र-वैशाख)-में कुंकुमवर्ण, ग्रीष्ममें पाण्डु (श्वेत-पीत-मिश्रित)-वर्ण, वर्षामें अनेक वर्ण, शरद्-ऋतुमें कमलवर्ण तथा हेमन्तमें रक्तवर्णका सूर्यबिम्ब दिखायी दे तो उसे शुभप्रद समझना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ नारद! यदि शीतकालमें (अग्रहनसे फाल्गुनतक) सूर्यका बिम्ब पीला, वर्षामें (श्रावणसे कार्तिकतक) श्वेत (उजला) तथा ग्रीष्ममें (चैत्रसे आषाढ़तक)


*जैसे मेषमें सूर्यके रहते जो अमावास्या होती है, वहाँ चैत्रकी समाप्ति समझी जाती है एवं वृषादिके सूर्यमें वैशाखादि मास समझना चाहिये।

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३४० * संक्षिप्त नारदपुराण *

लाल रंगका दीख पड़े तो क्रमसे रोग, अवर्षण तथा भय उपस्थित करनेवाला होता है। यदि कदाचित् सूर्यका आधा बिम्ब इन्द्रधनुषके सदृश दीख पड़े तो राजाओंमें परस्पर विरोध बढ़ता है। खरगोशके रक्तके सदृश सूर्यका वर्ण हो तो शीघ्र ही राजाओंमें महायुद्ध प्रारम्भ होता है। यदि सूर्यका वर्ण मोरकी पाँखके समान हो तो वहाँ बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं होती है। यदि सूर्य कभी चन्द्रमाके समान दिखायी दे तो वहाँके राजाको जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है। यदि सूर्य श्याम रंगका दीख पड़े तो कीड़ोंका भय होता है। भस्म समान दीख पड़े तो समूचे राज्यपर भय उपस्थित होता है और यदि सूर्यमण्डलमें छिद्र दिखायी दे तो वहाँके सबसे बड़े सम्राट्की मृत्यु होती है। कलशके समान आकारवाला सूर्य देशमें भुखमरीका भय उपस्थित करता है। तोरण-सदृश आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरोंका नाशक होता है। छत्राकार सूर्य उदित हो तो देशका नाश और सूर्य-बिम्ब खण्डित दीख पड़े तो राजाका नाश होता है॥ ८-१४॥

यदि सूर्योदय या सूर्यास्तके समय बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपात एवं उल्कापात हो तो राजाका नाश या राजाओंमें परस्पर युद्ध होता है। यदि पंद्रह या साढ़े सात दिनतक दिनमें सूर्यपर तथा रातमें चन्द्रमापर परिवेश (मण्डल) हो अथवा उदय और अस्त-समयमें वह अत्यन्त रक्तवर्णका दिखायी दे तो राजाका परिवर्तन होता है॥ १५-१६॥ उदय या अस्तके समय यदि सूर्य शस्त्रके समान आकारवाले या गदहे, ऊँट आदिके सदृश अशुभ आकारवाले मेघसे खण्डित-सा प्रतीत हो तो राजाओंमें युद्ध होता है॥ १७॥

(चन्द्रशृङ्गोन्नति-फल—) मीन तथा मेष राशिमें यदि (द्वितीया-तिथिको उदयकालमें) चन्द्रमाका दक्षिण शृङ्ग उन्नत (ऊपर उठा) हो तो वह शुभप्रद होता है। मिथुन और मकरमें यदि उत्तर शृङ्ग उन्नत हो तो उसे श्रेष्ठ समझना चाहिये। कुम्भ और वृषमें यदि दोनों शृङ्ग सम हों तो शुभ है। कर्क और धनुमें यदि शृङ्ग शरसदृश हो तो शुभ है। वृश्चिक और सिंहमें भी धनुष-सदृश हो तो शुभ है तथा तुला और कन्यामें यदि चन्द्रमाका शृङ्ग शूलके सदृश दीख पड़े तो शुभ फल समझना चाहिये। इससे विपरीत स्थितिमें चन्द्रमाका उदय हो तो उस मासमें पृथ्वीपर दुर्भिक्ष, राजाओंमें परस्पर विरोध तथा युद्ध आदि अशुभ फल प्रकट होते हैं॥ १८-१९½॥

पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, मूल और ज्येष्ठा—इन नक्षत्रोंमें चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशामें हो¹ तो जलचर, वनचर और सर्पका नाश तथा अग्निका भय होता है। विशाखा और अनुराधामें यदि दक्षिणभागमें हो तो पापफल देनेवाला होता है। मघा और विशाखामें यदि चन्द्रमा मध्यभागमें होकर चले तो भी सौम्य (शुभ)-प्रद होता है। रेवतीसे मृगशिरापर्यन्त ६ नक्षत्र 'अनागत', आर्द्रासे अनुराधापर्यन्त बारह नक्षत्र 'मध्ययोगी' और वासव (ज्येष्ठा) से नौ नक्षत्र 'गतयोगी' हैं। इनमें भी चन्द्रमा उत्तर भागमें रहनेपर शुभप्रद होता है॥ २०-२२½॥

भरणी, ज्येष्ठा, आश्लेषा, आर्द्रा, शतभिषा और स्वाती ये अर्धभोग (४०० कला), ध्रुव (तीनों उत्तरा, रोहिणी), पुनर्वसु और विशाखा—ये सार्धैकभोग (१२०० कला) तथा अन्य नक्षत्र सम (पूर्ण) भोग (८०० कला) हैं²। साधारणतया चन्द्रमाकी दक्षिण शृङ्गोन्नति अशुभ और उत्तर


१. दिशाका ज्ञान तात्कालिक शरके ज्ञानसे होता है। इसकी विधि पृष्ठ २३६ में देखिये।
२. राशि-मण्डलमें सब नक्षत्रोंका भोग ८०० कलाके बराबर है। परंतु प्रत्येक नक्षत्रविभागमें योगताराका स्थान जहाँ पड़ता है, वहाँ उसका भोग-स्थान कहलाता है। वह छः नक्षत्रोंमें मध्यभागमें पड़ता है और छः नक्षत्रोंमें आगे बढ़ जाता है। जिसका वास्तविक मान क्रमसे ३९५ कला १७ विकला और ११८४ कला ५२ विकला है, जो स्वल्पान्तरसे

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    ३४१

शृङ्गोन्नति शुभप्रद है। तिथिके अनुसार चन्द्रमामें शुक्ल न होकर यदि शुक्लतामें हानि (कमी) हो तो प्रजाके कार्योंमें हानि और शुक्लतामें वृद्धि (अधिकता) हो तो प्रजाजनकी वृद्धि होती है*। समतामें समता समझनी चाहिये। यदि चन्द्रमाका विम्ब मध्यम मानसे विशाल (बड़ा) देखनेमें आवे तो सुभिक्षकारक (सस्ती लानेवाला) और छोटा दीख पड़े तो दुर्भिक्षकारक (महँगी या अकाल लानेवाला) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अधोमुख हो तो शस्त्रका भय लाता है। दण्डाकार हो तो कलह (राजा-प्रजामें युद्ध) होता है। चन्द्रमाका शृङ्ग अथवा विम्ब मङ्गलादि ग्रहों (मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि)-से आहत (भेदित) दीख पड़े तो क्रमशः क्षेम, अन्नादि, वर्षा, राजा और प्रजाका नाश होता है॥ २३-२६ १/२ ॥

(भौम-चार-फल—) जिस नक्षत्रमें मङ्गलका उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह 'उष्ण' नामक वक्र होता है। उसमें प्रजाको पीड़ा और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदयके नक्षत्रसे दसवें, ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्रमें मङ्गल वक्र हो तो वह 'अश्वमुख' नामक वक्र होता है। उसमें अन्न और वर्षाका नाश होता है। यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'व्यालमुख' वक्र कहलाता है। उसमें भी अन्न और वर्षाका नाश होता है। पंद्रहवें या सोलहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो 'रुधिरमुख' वक्र कहलाता है। उसमें मङ्गल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोगको बढ़ाता है। सत्रहवें या अट्ठारहवें नक्षत्रमें वक्र हो तो वह 'मुसल' नामक वक्र होता है। उससे धन-धान्यका नाश तथा दुर्भिक्षका भय होता है। यदि मङ्गल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उदित होकर उत्तराषाढ़में वक्र हो तथा रोहिणीमें अस्त हो तो तीनों लोकोंके लिये नाशकारी होता है। यदि मङ्गल श्रवणमें उदित होकर पुष्यमें वक्रगति हो तो धनकी हानि करनेवाला होता है॥ २७-३३॥

मङ्गल जिस दिशामें उदित होता है, उस दिशाके राजाके लिये भयकारक होता है। यदि मघा-नक्षत्रके मध्य होकर चलता हुआ मङ्गल उसीमें वक्र हो जाय तो अवर्षण (वर्षाका अभाव) और शस्त्रका भय लाता है तथा राजाके लिये विनाशकारी होता है। यदि मङ्गल मघा, विशाखा या रोहिणीके योगताराका भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष, मरण तथा रोग लानेवाला होता है। उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, मूल, श्रवण और मृगशिरा—इन नक्षत्रोंके बीचमें तथा रोहिणीके दक्षिण होकर मङ्गल चले तो अनावृष्टिकारक होता है। मङ्गल सब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल देनेवाला तथा प्रजामें कलह उत्पन्न करनेवाला होता है॥ ३४-३७ १/२ ॥

(बुध-चार-फल—) यदि कदाचित् आँधी, मेघ आदि उत्पात न होनेपर (शुद्ध आकाशमें) भी बुधका उदय देखनेमें न आवे तो अनावृष्टि, अग्निभय, अनर्थ और राजाओंमें युद्धकी सम्भावना समझनी चाहिये। धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराषाढ़, मृगशिरा और रोहिणीमें चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो वह लोकमें बाधा और अनावृष्टि आदिके द्वारा भयकारी होता है। यदि आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रोंमें बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग तथा अनावृष्टि आदिका भय उपस्थित करनेवाला


४०० और १२०० मान लिये गये हैं। क्रमशः इन्हें ही 'अनागत' और 'गतयोगी' कहा गया है। शेष नक्षत्रोंके भोगस्थान अन्तिमांशमें ही पड़ते हैं; अतः इनके मान ८०० कला हैं। ये ही मध्ययोगी हैं।
*प्रतिपदाके अन्तमें (शुक्ल-द्वितीयारम्भमें) चन्द्रमा दृश्य हो तो समता, उससे पश्चात् दृश्य हो तो हानि और पूर्व दृश्य हो तो वृद्धि समझी जाती है।

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३४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

होता है। हस्तसे छः (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा तथा ज्येष्ठा) नक्षत्रोंमें बुधके रहनेसे लोकमें कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता है। उत्तर भाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, कृत्तिका और भरणीमें विचरनेवाला बुध वैद्य, घोड़े और व्यापारियोंका नाश करनेवाला होता है। पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपदमें विचरता हुआ बुध यदि इन नक्षत्रोंके योगताराओंका भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र, अग्नि और चोरोंसे प्राणियोंको भय प्राप्त होता है॥ ३८–४३ १/२॥

भरणी, कृत्तिका, रोहिणी और स्वाती—इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति 'प्राकृतिकी' कही गयी है। आर्द्रा, मृगशिरा, आश्लेषा और मघा—इन नक्षत्रोंमें बुधकी गति 'मिश्रा' मानी गयी है। पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य और पुनर्वसु—इनमें बुधकी 'संक्षिप्ता' गति कही गयी। पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद, रेवती और अश्विनी—इनमें बुधकी 'तीक्ष्णा' गति होती है। उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़ और मूलमें उनकी 'योगान्तिका' गति मानी गयी है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषामें 'घोरा' गति और विशाखा, अनुराधा तथा हस्त—इन नक्षत्रोंमें बुधकी 'पाप' संज्ञक गति होती है। इन प्राकृत आदि सात प्रकारकी गतियोंमें उदित होनेपर जितने दिनतक बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन उनमें अस्त होनेपर अदृश्य रहता है। उन दिनोंकी संख्या क्रमसे ४०, ३०, २२, १८, ९, १५ और ११ है। बुध जब प्राकृत गतिमें रहता है, तब संसारमें कल्याण, आरोग्य और सुभिक्ष (अन्न-वस्त्र आदिकी वृद्धि) करता है। मिश्र और संक्षिप्त गतिमें मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियोंमें अनावृष्टि (दुर्भिक्ष)-कारक होता है। वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ़में उदित होनेपर बुध पापरूप फल देता है और अन्य मासोंमें उदित होनेपर वह शुभ फल देता है। आश्विन और कार्तिकमें बुधका उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्निका भय प्राप्त होता है। यदि उदित हुए बुधकी कान्ति चाँदी अथवा स्फटिकके समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देनेवाला होता है॥ ४४–५२॥

(बृहस्पति-चार-फल—) कृत्तिका आदि दो-दो नक्षत्रोंके आश्रयसे कार्तिक आदि मास होते हैं; परंतु अन्तिम (आश्विन), पञ्चम (फाल्गुन) और एकादश (भाद्रपद)—ये तीन नक्षत्रोंसे पूर्ण होते हैं*। इसी प्रकार बृहस्पतिका जिन नक्षत्रोंमें उदय होता है, उन नक्षत्रोंसे (मासके अनुसार ही) संवत्सरोंके नाम होते हैं। उन संवत्सरोंमें कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियोंके लिये अशुभ फलदायक होते हैं। पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देनेवाले होते हैं। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्यम (शुभ-अशुभ दोनों) फल देते हैं। वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देनेवाला होता है। आषाढ़ मध्यम और श्रावण श्रेष्ठ होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता; परंतु आश्विन संवत्सर तो प्रजाजनोंके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार संवत्सरोंका फल समझना चाहिये॥ ५३–५५ १/२॥


*कृत्तिका आदि नक्षत्रोंमें पूर्णिमा होनेसे मासोंके कार्तिक आदि नाम होते हैं। नीचे चक्रमें देखिये—

कार्तिकमार्गशीर्षपौषमाघफाल्गुनचैत्रवैशाखज्येष्ठआषाढ़श्रावणभाद्रपदआश्विन
कृत्तिकामृगशिरापुनर्वसुआश्लेषापूर्वाफाल्गुनीचित्राविशाखाज्येष्ठापूर्वाषाढ़श्रवणशतभिषारेवती
रोहिणीआर्द्रापुष्यमघाउत्तराफाल्गुनी<br>हस्तस्वातीअनुराधामूलउत्तराषाढ़धनिष्ठापूर्व भाद्रपद<br>उत्तर भाद्रपदअश्विनी<br>भरणी
२२२२३२२२२२३३
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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    ३४३

बृहस्पति जब नक्षत्रोंके उत्तर होकर चलता है, तब संसारमें कल्याण, आरोग्य तथा सुभिक्ष करनेवाला होता है। जब नक्षत्रोंके दक्षिण होकर चलता है, तब विपरीत परिणाम (अशुभ, रोगवृद्धि तथा दुर्भिक्ष) उपस्थित करता है तथा जब मध्य होकर चलता है, उस समय मध्यम फल प्रस्तुत करता है। गुरुका विम्ब यदि पीतवर्ण, अग्निसदृश, श्याम, हरित और लाल दिखायी दे तो प्रजाजनोंमें क्रमशः व्याधि, अग्नि, चोर, शस्त्र और अस्त्र¹ का भय उपस्थित होता है। यदि गुरुका वर्ण धूएँके समान हो तो वह अनावृष्टिकारक होता है। यदि गुरु दिनमें (प्रातः-सायं छोड़कर) दृश्य हो तो राजाका नाश, रोगभय अथवा राष्ट्रका विनाश होता है। कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सरके शरीर हैं। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ ये दोनों नाभि हैं, आर्द्रा हृदय और मघा संवत्सरका पुष्प है। यदि शरीर पापग्रहसे पीड़ित हो तो दुर्भिक्ष, अग्नि और वायुका भय उपस्थित होता है। नाभि पापग्रहसे युक्त हो तो क्षुधा और तृषासे पीड़ा होती है। पुष्प पापग्रहसे आक्रान्त हो तो मूल और फलोंका नाश होता है। यदि हृदय-नक्षत्र पापग्रहसे पीडित हो तो अन्नादिका नाश होता है। शरीर आदि शुभग्रहसे संयुक्त हों तो सुभिक्ष और कल्याणादि शुभ फल प्राप्त होते हैं ॥ ५६-६१ ॥ यदि मघा आदि नक्षत्रोंमें बृहस्पति हो तो वह क्रमशः शस्य-वृद्धि, प्रजामें आरोग्य, युद्ध, अनावृष्टि, द्विजातियोंको पीड़ा, गौओंको सुख, राजाओंको सुख, स्त्री-समाजको सुख, वायुका अवरोध, अनावृष्टि, सर्पभय, सुवृष्टि, स्वास्थ्य, उत्सववृद्धि, महार्घ, सम्पत्तिकी वृद्धि, देशका नाश, अतिवृष्टि, निर्वैरता, रोग-वृद्धि, भयकी हानि, रोगभय, अन्नकी वृद्धि, वर्षा, रोगकी वृद्धि, धान्यकी वृद्धि और अनावृष्टिरूप फल देता है ॥ ६२-६४ ॥

(शुक्र-चार-फल-) शुक्रके तीन मार्ग हैं—सौम्य (उत्तरा), मध्य और याम्य (दक्षिण)। इनमेंसे प्रत्येकमें तीन-तीन वीथियाँ हैं और एक-एक वीथीमें बारी-बारीसे तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। इन नक्षत्रोंको अश्विनीसे आरम्भ करके जानना चाहिये। इस प्रकार उत्तरसे दक्षिणतक शुक्रके मार्गमें क्रमशः नाग, इभ, ऐरावत, वृष, उष्ट्र, खर, मृग, अज तथा दहन—ये नौ वीथियाँ हैं²॥ ६५-६६॥ उत्तरमार्गकी तीन वीथियोंमें विचरण करनेवाला शुक्र धान्य, धन, वृष्टि और शस्य (अन्नकी नस्ल)—इन सब वस्तुओंको पुष्ट एवं परिपूर्ण करता है। मध्यममार्गकी जो तीन वीथियाँ हैं, उनमें शुक्रके जानेसे सब अशुभ ही फल प्राप्त होते हैं। मघासे पाँच नक्षत्रोंमें जब शुक्र जाता है तो पूर्व दिशामें उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकारक तथा शुभप्रद होता है। स्वातीसे तीन नक्षत्रतक जब शुक्र रहता है तब पश्चिम दिशा (देश)-में मेघ सुवृष्टिकारक और शुभदायक होता है। शेष सब नक्षत्रोंमें उसका फल विपरीत (अनावृष्टि और दुर्भिक्ष करनेवाला) होता है। शुक्र जब बुधके


१. जो हाथमें धारण किये हुए ही चलाया जाता है, वह शस्त्र है; जैसे तलवार आदि; तथा जो हाथसे फेंककर चलाया जाता है, वह अस्त्र कहलाता है, जैसे बाण और बंदूककी गोली आदि।
२. शुक्रके ३ मार्ग और ९ वीथियाँ इस प्रकार हैं—

मार्गसौम्य १मध्यम २याम्य ३
नक्षत्रअश्विनी<br>भरणी<br>कृत्तिकारोहिणी<br>मृगशिरा<br>आर्द्रापुनर्वसु<br>पुष्य<br>आश्लेषामघा<br>पूर्वाफाल्गुनी<br>उत्तराफाल्गुनीहस्त<br>चित्रा<br>स्वातीविशाखा<br>अनुराधा<br>ज्येष्ठामूल<br>पूर्वाषाढ़<br>उत्तराषाढ़श्रवण<br>धनिष्ठा<br>शतभिषापूर्व भाद्रपद<br>उत्तर भाद्रपद<br>रेवती
वीथी१<br>नाग२<br>इभ३<br>ऐरावत४<br>वृष५<br>उष्ट्र६<br>खर७<br>मृग८<br>अज९<br>दहन
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३४४* संक्षिप्त नारदपुराण *

साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी, चतुर्दशी और अमावास्यामें यदि शुक्रका उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जलसे परिपूर्ण होती है। गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशिमें हों तथा एक पूर्व वीथीमें और दूसरा पश्चिम वीथीमें विद्यमान हो तो वे दोनों देशमें अनावृष्टि तथा दुर्भिक्ष लानेवाले और राजाओंमें परस्पर युद्ध करानेवाले होते हैं। मङ्गल, बुध, गुरु और शनि यदि शुक्रसे आगे होते हैं तो युद्ध, अतिवायु, दुर्भिक्ष और अनावृष्टि करनेवाले होते हैं ॥ ६७-७२ ॥ पूर्वाषाढ़, अनुराधा, उत्तराफाल्गुनी, आश्लेषा, ज्येष्ठा—इन नक्षत्रोंमें शुक्र हो तो वह सुभिक्षकारक होता है। मूलमें हो तो शस्त्रभय और अनावृष्टि देनेवाला होता है। उत्तर भाद्रपद और रेवतीमें शुक्रके रहनेपर भय प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥

(शनि-चार-फल—) श्रवण, स्वाती, हस्त, आर्द्रा, भरणी और पूर्वाफाल्गुनी—इन नक्षत्रोंमें विचरनेवाला शनि मनुष्योंके लिये सुभिक्ष, आरोग्य तथा खेतीकी उपज बढ़ानेवाला होता है॥७४॥ जन्मनक्षत्रसे प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि-चक्रके मुखमें एक, गुदामें दो, सिरमें तीन, नेत्रोंमें दो, हृदयमें पाँच, बायें हाथमें चार, बायें पैरमें तीन, दक्षिण पादमें तीन तथा दक्षिण हाथमें चार—इस तरह नक्षत्रोंकी स्थापना करे। शनिका वर्तमान नक्षत्र जिस अङ्गमें पड़े, उसका फल निम्नलिखितरूपसे जानना चाहिये। शनि-नक्षत्र मुखमें हो तो रोग, गुदामें हो तो लाभ, सिरमें हो तो हानि, नेत्रमें हो तो लाभ, हृदयमें हो तो सुख, बायें हाथमें हो तो बन्धन, बायें पैरमें हो तो परिश्रम, दाहिने पैरमें हो तो श्रेष्ठ यात्रा और दाहिने हाथमें हो तो धन-लाभ होता है। इस प्रकार क्रमशः फल कहे गये हैं॥७५-७७॥ बहुधा वक्रगामी होनेपर शनि इन फलोंकी प्राप्ति कराता ही है। यदि वह सम मार्गपर हो तो फल भी मध्यम होता है और यदि वह शीघ्रगति हो तो उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥ ७८ ॥

(राहु-चार-फल—) भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे राहुका मस्तक काट दिया तो भी अमृत पी लेनेके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई; अतः उसे ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥ ७९ ॥ वह ब्रह्माजीके वरसे सम्पूर्ण पर्वों (पूर्णिमा और अमावास्या)-के समय चन्द्रमा और सूर्यको पीड़ा देता है; किंतु 'शर' तथा 'अवनति' अधिक होनेके कारण वह उन दोनोंसे दूर ही रहता है ॥ ८० ॥ एक सूर्यग्रहणके बाद दूसरे सूर्यग्रहणका तथा एक चन्द्रग्रहणके बाद दूसरे चन्द्रग्रहणका विचार छः मासपर पुनः कर लेना चाहिये। प्रति छः मासपर क्रमशः ब्रह्मादि सात देवता पर्वेश (ग्रहणके अधिपति) होते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र, कुबेर, वरुण, अग्नि तथा यम। ब्राह्मपर्वमें ग्रहण होनेपर पशु, धान्य और द्विजोंकी वृद्धि होती है ॥ ८१-८२ ॥ चन्द्रपर्वमें ग्रहण हो तो भी ऐसा ही फल होता है; विशेषता इतनी ही है कि लोगोंको कफसे पीड़ा होती है। इन्द्रपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओंमें विरोध, जगत्में दुःख तथा खेती-बारीका नाश होता है। वारुणपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओंका अकल्याण और प्रजाजनोंका कल्याण होता है ॥ ८३-८४ ॥ अग्निपर्वमें ग्रहण हो तो वृष्टि, धान्यवृद्धि तथा कल्याणकी प्राप्ति होती है और यमपर्वमें ग्रहण होनेपर वर्षाका अभाव, खेतीकी हानि तथा दुर्भिक्षरूप फल प्राप्त होते हैं ॥ ८५ ॥ वेलाहीन समयमें अर्थात् वेलासे पहले ग्रहण हो तो खेतीकी हानि तथा राजाओंको दारुण भय प्राप्त होता है और 'अतिवेल' कालमें अर्थात् वेला बिताकर ग्रहण हो* तो फूलोंकी हानि होती है, जगत्में भय होता है और खेती


*गणितसे ग्रहणका जो समय प्राप्त होता हो उससे पहले ग्रहण होना 'वेलाहीन' है और उसे बिताकर जो ग्रहण होता है, वह 'अतिवेल' कहलाता है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३४५

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३४५

चौपट हो जाती है॥८६॥ जब एक ही मासमें चन्द्रमा-सूर्य-दोनोंका ग्रहण हो तो राजाओंमें विरोध होता है तथा धन और वृष्टिका विनाश होता है॥८७॥ ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्यका उदय अथवा अस्त हो तो वे राजाओं और धान्योंका विनाश करनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा और सूर्यका सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भुखमरी, रोग तथा अग्निका भय उपस्थित करनेवाले होते हैं॥८८॥ उत्तरायणमें ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी हानि होती है तथा दक्षिणायनमें ग्रहण होनेपर अन्य वर्णके लोगोंको हानि पहुँचती है। सूर्य या चन्द्रमाके विम्बके उत्तर, पूर्व आदि भागमें यदि राहुका दर्शन हो (स्पर्श देखनेमें आवे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंको हानि पहुँचाता है॥८९॥ इसी तरह ग्रहणके समय ग्रासके और मोक्षके भी दस-दस भेद होते हैं; जिनकी सूक्ष्म गतिको देवता भी नहीं जान सकते, फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है॥९०॥ गणितद्वारा ग्रहोंको लाकर उनके 'चार' (गतिमान, स्पर्श और मोक्ष कालकी स्थिति)-पर विचार करना चाहिये। जिससे उन ग्रहोंद्वारा ग्रहणकालके शुभ और अशुभ लक्षण (फल)-को हम देख और जान सकें॥९१॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अनुसंधान करे। धूम-केतु आदि तारोंका उदय और अस्त मनुष्योंके लिये उत्पातरूप होता है॥९२॥ वे उत्पात दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष भेदसे तीन प्रकारके हैं। वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके फल देनेवाले हैं। आकाशमें यज्ञकी ध्वजा, अस्त्र-शस्त्र, भवन और बड़े हाथीके सदृश तथा खंभा, त्रिशूल और अंकुश-इन वस्तुओंके समान जो केतु दिखायी देते हैं, उन्हें 'आन्तरिक्ष' उत्पात कहते हैं। साधारण ताराके समान उदित होकर किसी नक्षत्रके साथ केतु हो तो 'दिव्य' उत्पात कहा गया है। भूलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले (भूकम्प आदि) उत्पातोंको 'भौम' उत्पात कहते हैं॥९३-९४॥ केतुतारा एक होकर भी प्राणियोंको अशुभ फल देनेके लिये भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है। जितने दिनोंतक आकाशमें विविधरूपधारी केतु देखनेमें आता है, उतने ही मास या सौर वर्षोंतक वह अपना शुभाशुभ फल देता है। जो दिव्य केतु हैं, वे सदा प्राणियोंको विविध फल देनेवाले होते हैं॥९५-९६॥ ह्रस्व, चिकना और प्रसन्न (स्वच्छ) श्वेत रङ्गका केतु सुवृष्टि देता है। शीघ्र अस्त होनेवाला विशाल केतु अवृष्टि देता है॥९७॥ इन्द्रधनुषके समान कान्तिवाला धूमकेतु तारा अनिष्ट फल देता है। दो, तीन या चार रूपोंमें प्रकट त्रिशूलके समान आकारवाला केतु राष्ट्रका विनाशक होता है॥९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशामें सूर्य-सम्बन्धी केतु मणि, हार एवं सुवर्णके समान देदीप्यमान दिखायी दे तो उन दिशाओंके राजाओंकी हानि होती है॥९९॥ पलाश, विम्बफल, रक्त और तोतेकी चोंच आदिके समान वर्णका केतु अग्निकोणमें उदित हो तो शुभ फल देनेवाला होता है॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतुओंकी कान्ति जल एवं तेलके समान होती है। वे भुखमरीका भय देनेवाले हैं। चन्द्रजनित केतुओंका वर्ण श्वेत होता है। वे सुभिक्ष और कल्याण प्रदान करनेवाले होते हैं॥१०१॥ ब्रह्मदण्डसे उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओंसे युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष) केतु प्रजाओंका विनाश करनेवाला माना गया है॥१०२॥ यदि ईशानकोणमें श्वेतवर्णके शुक्रजनित केतु उदित हों तो वे अनिष्ट फल देनेवाले होते हैं। शिखारहित एवं कनकनामसे प्रसिद्ध शनैश्चरसम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं॥१०३॥ गुरुसम्बन्धी केतुओंकी विकच संज्ञा है। वे दक्षिण दिशामें प्रकट होनेपर भी अभीष्ट साधक माने गये हैं। उसी दिशामें सूक्ष्म तथा शुक्लवर्णवाले बुधसम्बन्धी केतु हों तो वे चोर तथा रोगका भय प्रदान करनेवाले हैं॥१०४॥

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३४६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कंकुमनामसे प्रसिद्ध मङ्गल-सम्बन्धी केतु लाल रंगके होते हैं। उनकी आकृति सूर्यके समान होती है। वे भी उक्त दिशामें उदित होनेपर अनिष्टदायक होते हैं। अग्निके समान कान्तिवाले अग्निसम्बन्धी केतु विश्वरूप नामसे प्रसिद्ध हैं। वे अग्निकोणमें उदित होनेपर सुखद होते हैं॥ १०५ ॥ श्याम वर्णवाले सूर्यसम्बन्धी केतु अरुण कहलाते हैं। वे पाप अर्थात् दुःख देनेवाले होते हैं। रीछके समान रंगवाले शुक्रसम्बन्धी केतु शुभदायक होते हैं॥ १०६॥ कृत्तिका तारामें उदित हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजाजनोंका नाश करता है। राजमहल, वृक्ष और पर्वतपर प्रकट हुआ केतु राजाओंका नाश करनेवाला होता है॥ १०७॥ कुमुद पुष्पके समान वर्णवाला कौमुद नामक केतु सुभिक्ष लानेवाला होता है। संध्याकालमें मस्तकसहित उदित हुआ गोलाकार केतु अनिष्ट फल देनेवाला होता है॥ १०८॥

(कालमान—) ब्राह्म, दैव, मानव, पित्र्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य—ये नौ मान होते हैं॥ १०९॥ इस लोकमें इन नौ मानोंमेंसे पाँचके ही द्वारा व्यवहार होता है। किंतु उन नवों मानोंका व्यवहारके अनुसार पृथक्-पृथक् कार्य बताया जायगा॥ ११०॥ सौर मानसे ग्रहोंकी सब प्रकारकी गति (भगणादि) जाननी चाहिये। वर्षाका समय तथा स्त्रीके प्रसवका समय सावन मानसे ही ग्रहण किया जाता है॥ १११॥ वर्षके भीतरका घटीमान आदि नाक्षत्र मानसे ही लिया जाता है। यज्ञोपवीत, मुण्डन, तिथि एवं वर्षेशका निर्णय तथा पर्व, उपवास आदिका निश्चय चन्द्र मानसे किया जाता है। बार्हस्पत्य मानसे प्रभवादि संवत्सरका स्वरूप ग्रहण किया जाता है॥ ११२-११३॥ उन-उन मानोंके अनुसार बारह महीनोंका उनका अपना-अपना विभिन्न वर्ष होता है। बृहस्पतिकी अपनी मध्यम गतिसे प्रभव आदि नामवाले साठ संवत्सर होते हैं॥ ११४॥ प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अङ्गिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवङ्ग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत्, परिभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिङ्गल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय—ये साठ संवत्सर जानने चाहिये। ये सभी अपने नामके अनुरूप फल देनेवाले हैं। पाँच वर्षोंका युग होता है। इस तरह साठ संवत्सरोंमें बारह युग होते हैं॥ ११५—१२१॥ उन युगोंके स्वामी क्रमशः इस प्रकार जानने चाहिये— विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेव, चन्द्रमा, इन्द्राग्नि, अश्विनीकुमार तथा भग। इसी प्रकार युगके भीतर जो पाँच वर्ष होते हैं, उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा और शिव हैं॥ १२२-१२३॥

संवत्सरके राजा, मन्त्री तथा धान्येशरूप ग्रहोंके बलाबलका विचार करके तथा उनकी तात्कालिक स्थितिको भी भलीभाँति जानकर संवत्सरका फल समझना चाहिये॥ १२४॥ मकरादि छः राशियोंमें छः मासतक सूर्यके भोगसे सौम्यायन (उत्तरायण) होता है। वह देवताओंका दिन और कर्कादि छः राशियोंमें छः मासतक सूर्यके भोगसे दक्षिणायन होता है, वह देवताओंकी रात्रि है॥ १२५॥ गृहप्रवेश, विवाह, प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभकर्म माघ आदि उत्तरायणके मासोंमें करने चाहिये॥ १२६॥ दक्षिणायनमें उक्त कार्य गर्हित (त्याज्य) माना गया है, अत्यन्त आवश्यकता हो तो उस समय पूजा आदि यत्न करनेसे शुभ होता है*। माघसे


* 'मार्गशीर्षमपीच्छन्ति विवाहे केऽपि कोविदाः।'
'कुछ विद्वान् अगहनमें भी विवाह होना ठीक मानते हैं' इस मान्यताके अनुसार 'अगहन' में दक्षिणायन होनेपर भी विवाह हो सकता है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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दो-दो मासोंकी शिशिरादि छः ऋतुएँ होती हैं॥ १२७॥ मकरसे दो-दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म—ये तीन ऋतुएँ उत्तरायणमें होती हैं और कर्कसे दो-दो राशियोंमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त—ये तीन ऋतुएँ दक्षिणायनमें होती हैं॥ १२८॥ शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे अमावास्यातक 'चान्द्र मास' होता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितक 'सौर मास' होता है। तीस दिनोंका एक 'सावन मास' होता है और चन्द्रमाद्वारा सब नक्षत्रोंके उपभोगमें जितने दिन लगते हैं, उतने अर्थात् २७ दिनोंका एक 'नाक्षत्र मास' होता है॥ १२९॥ मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इष, उर्ज, सहाः, सहस्य, तप और तपस्य—ये चैत्रादि बारह मासोंकी संज्ञाएँ हैं। जिस मासकी पौर्णमासी जिस नक्षत्रसे युक्त हो, उस नक्षत्रके नामसे ही उस मासका नामकरण होता है। (जैसे जिस मासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्रसे युक्त होती है, उस मासका नाम 'चैत्र' होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नामसे विख्यात होती है, जैसे चैत्री, वैशाखी आदि।) प्रत्येक मासके दो पक्ष क्रमशः देवपक्ष और पितृपक्ष हैं, अन्य विद्वान् उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं॥ १३०—१३२॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्योंमें सदा उपयुक्त माने जाते हैं। ब्रह्मा, अग्नि, विरञ्चि, विष्णु, गौरी, गणेश, यम, सर्प, चन्द्रमा, कार्तिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा, दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शंकर, कलाधर, यम, चन्द्रमा (विष्णु, काम और शिव)—ये सब शुक्ल प्रतिपदासे लेकर क्रमशः उनतीस तिथियोंके स्वामी होते हैं। अमावास्या नामक तिथिके स्वामी पितर माने गये हैं।

(तिथियोंकी नन्दादि पाँच संज्ञा—) प्रतिपदा आदि तिथियोंकी क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा—ये पाँच संज्ञाएँ मानी गयी हैं। पंद्रह तिथियोंमें इनकी तीन आवृत्ति करके इनका पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। शुक्लपक्षमें प्रथम आवृत्तिकी (१, २, ३, ४, ५—ये) तिथियाँ अधम द्वितीय आवृत्तिकी (६, ७, ८, ९, १०—ये) तिथियाँ मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी (११, १२, १३, १४, १५—ये) तिथियाँ शुभ होती हैं। इसी प्रकार कृष्णपक्षकी प्रथम आवृत्तिकी नन्दादि तिथियाँ इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृत्तिकी मध्यम और तृतीय आवृत्तिकी अनिष्टप्रद (अधम) होती हैं। दोनों पक्षोंकी ८, १२, ६, ४, ९, १४—ये तिथियाँ पक्षरन्ध्र कही गयी हैं। इन्हें अत्यन्त रूक्ष कहा गया है। इनमें क्रमशः आरम्भकी ४, १४, ९, ९, २५ और ५ घड़ियाँ सब शुभ कार्योंमें त्याग देने योग्य हैं। अमावास्या और नवमीको छोड़कर अन्य सब विषम तिथियाँ (३, ५, ७, ११, १३) सब कार्योंमें प्रशस्त हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा मध्यम है (कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा शुभ है)।

षष्ठीमें तैल, अष्टमीमें मांस* चतुर्दशीमें क्षौर एवं पूर्णिमा और अमावास्यामें स्त्रीका सेवन त्याग दे। अमावास्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी, सभी पर्व और नवमी—इन तिथियोंमें कभी दातौन नहीं करना चाहिये। व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पर्व, रवि और मङ्गलवार तथा षष्ठी तिथि और वैधृति-योगमें अभ्यञ्जन (उबटन)-का निषेध है। जो मनुष्य दशमी तिथिमें आँवलेसे स्नान करता है, उसको पुत्रकी हानि उठानी पड़ती है। त्रयोदशीको आँवलेसे स्नान करनेपर धनका नाश होता है और द्वितीयाको उससे स्नान करनेवालोंके धन और पुत्र दोनोंका नाश होता है। इसमें संशय नहीं है। अमावास्या, नवमी और सप्तमी—इन तीन तिथियोंमें आँवलेसे स्नान करनेवालोंके कुलका विनाश होता है॥ १३३—१४४ १/२ ॥

जो पूर्णिमा दिनमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो


*मांस तो सबके लिये सदा ही त्याज्य है, किंतु जो मांसाहारी हैं उन्हें भी अष्टमीको तो मांस त्याग ही देना चाहिये।