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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 347 of 770

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Page 347
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३४५

चौपट हो जाती है॥८६॥ जब एक ही मासमें चन्द्रमा-सूर्य-दोनोंका ग्रहण हो तो राजाओंमें विरोध होता है तथा धन और वृष्टिका विनाश होता है॥८७॥ ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्यका उदय अथवा अस्त हो तो वे राजाओं और धान्योंका विनाश करनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा और सूर्यका सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भुखमरी, रोग तथा अग्निका भय उपस्थित करनेवाले होते हैं॥८८॥ उत्तरायणमें ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी हानि होती है तथा दक्षिणायनमें ग्रहण होनेपर अन्य वर्णके लोगोंको हानि पहुँचती है। सूर्य या चन्द्रमाके विम्बके उत्तर, पूर्व आदि भागमें यदि राहुका दर्शन हो (स्पर्श देखनेमें आवे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंको हानि पहुँचाता है॥८९॥ इसी तरह ग्रहणके समय ग्रासके और मोक्षके भी दस-दस भेद होते हैं; जिनकी सूक्ष्म गतिको देवता भी नहीं जान सकते, फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है॥९०॥ गणितद्वारा ग्रहोंको लाकर उनके 'चार' (गतिमान, स्पर्श और मोक्ष कालकी स्थिति)-पर विचार करना चाहिये। जिससे उन ग्रहोंद्वारा ग्रहणकालके शुभ और अशुभ लक्षण (फल)-को हम देख और जान सकें॥९१॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अनुसंधान करे। धूम-केतु आदि तारोंका उदय और अस्त मनुष्योंके लिये उत्पातरूप होता है॥९२॥ वे उत्पात दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष भेदसे तीन प्रकारके हैं। वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके फल देनेवाले हैं। आकाशमें यज्ञकी ध्वजा, अस्त्र-शस्त्र, भवन और बड़े हाथीके सदृश तथा खंभा, त्रिशूल और अंकुश-इन वस्तुओंके समान जो केतु दिखायी देते हैं, उन्हें 'आन्तरिक्ष' उत्पात कहते हैं। साधारण ताराके समान उदित होकर किसी नक्षत्रके साथ केतु हो तो 'दिव्य' उत्पात कहा गया है। भूलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले (भूकम्प आदि) उत्पातोंको 'भौम' उत्पात कहते हैं॥९३-९४॥ केतुतारा एक होकर भी प्राणियोंको अशुभ फल देनेके लिये भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है। जितने दिनोंतक आकाशमें विविधरूपधारी केतु देखनेमें आता है, उतने ही मास या सौर वर्षोंतक वह अपना शुभाशुभ फल देता है। जो दिव्य केतु हैं, वे सदा प्राणियोंको विविध फल देनेवाले होते हैं॥९५-९६॥ ह्रस्व, चिकना और प्रसन्न (स्वच्छ) श्वेत रङ्गका केतु सुवृष्टि देता है। शीघ्र अस्त होनेवाला विशाल केतु अवृष्टि देता है॥९७॥ इन्द्रधनुषके समान कान्तिवाला धूमकेतु तारा अनिष्ट फल देता है। दो, तीन या चार रूपोंमें प्रकट त्रिशूलके समान आकारवाला केतु राष्ट्रका विनाशक होता है॥९८॥ पूर्व तथा पश्चिम दिशामें सूर्य-सम्बन्धी केतु मणि, हार एवं सुवर्णके समान देदीप्यमान दिखायी दे तो उन दिशाओंके राजाओंकी हानि होती है॥९९॥ पलाश, विम्बफल, रक्त और तोतेकी चोंच आदिके समान वर्णका केतु अग्निकोणमें उदित हो तो शुभ फल देनेवाला होता है॥१००॥ भूमिसम्बन्धी केतुओंकी कान्ति जल एवं तेलके समान होती है। वे भुखमरीका भय देनेवाले हैं। चन्द्रजनित केतुओंका वर्ण श्वेत होता है। वे सुभिक्ष और कल्याण प्रदान करनेवाले होते हैं॥१०१॥ ब्रह्मदण्डसे उत्पन्न तथा तीन रंग और तीन अवस्थाओंसे युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष) केतु प्रजाओंका विनाश करनेवाला माना गया है॥१०२॥ यदि ईशानकोणमें श्वेतवर्णके शुक्रजनित केतु उदित हों तो वे अनिष्ट फल देनेवाले होते हैं। शिखारहित एवं कनकनामसे प्रसिद्ध शनैश्चरसम्बन्धी केतु भी अनिष्ट फलदायक हैं॥१०३॥ गुरुसम्बन्धी केतुओंकी विकच संज्ञा है। वे दक्षिण दिशामें प्रकट होनेपर भी अभीष्ट साधक माने गये हैं। उसी दिशामें सूक्ष्म तथा शुक्लवर्णवाले बुधसम्बन्धी केतु हों तो वे चोर तथा रोगका भय प्रदान करनेवाले हैं॥१०४॥