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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

रावण और सीताका संवाद

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एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

रावण और सीताका संवाद

मार्कण्डेय उवाच

ततस्तां भर्तृशोकार्तां दीनां मलिनवाससम् ।
मणिशेषाभ्यलङ्कारां रुदतीं च पतिव्रताम् ॥ १ ॥
राक्षसीभिरुपास्यन्तीं समासीनां शिलातले ।
रावणः कामबाणार्तो ददर्शोपससर्प च ॥ २ ॥
देवदानवगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषैर्युधि ।
अजितोऽशोकवनिकां ययौ कन्दर्पपीडितः ॥ ३ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन जब पतिव्रता सीता स्वामीके वियोगके दुःखसे पीड़ित हो मैले कपड़े पहने केवल चूड़ामणिमात्र आभूषण धारण किये राक्षसियोंसे घिरी हुई एक शिलापर बैठी दीनभावसे रो रही थीं, उसी समय देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और किम्पुरुष किसीसे कभी युद्धमें परास्त न होनेवाला रावण कामबाणसे पीड़ित हो अशोकवाटिकामें गया। वहाँ उसने सीताको देखा और कामवेदनासे व्यथित होकर वह उनके समीप चला गया ॥ १—३ ॥

दिव्याम्बरधरः श्रीमान् सुमृष्टमणिकुण्डलः ।
विचित्रमाल्यमुकुटो वसन्त इव मूर्तिमान् ॥ ४ ॥

रावणने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। उसके कानोंमें सुन्दर मणिमय कुण्डल झलक रहे थे। वह विचित्र माला और मुकुट पहने मूर्तिमान् वसन्तके समान शोभासम्पन्न जान पड़ता था ॥ ४ ॥

न कल्पवृक्षसदृशो यत्नादपि विभूषितः ।
श्मशानचैत्यद्रुमवद् भूषितोऽपि भयंकरः ॥ ५ ॥

उसने बड़े यत्नसे अपने-आपको वस्त्राभूषणोंद्वारा सजा रखा था, तो भी कल्पवृक्षके समान आह्लादजनक नहीं जान पड़ता था; अपितु श्मशानभूमिके चैत्यवृक्षकी भाँति भूषित होनेपर भी भयानक प्रतीत होता था ॥ ५ ॥

स तस्यास्तनुमध्यायाः समीपे रजनीचरः ।
ददृशे रोहिणीमेत्य शनैश्चर इव ग्रहः ॥ ६ ॥

सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली सीताके समीप खड़ा हुआ वह राक्षस रोहिणी नक्षत्रके निकट पहुँचे हुए शनैश्चर ग्रहके समान भयंकर दिखायी देता था ॥ ६ ॥

स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतः ।
इदमित्यब्रवीद् वाक्यं त्रस्तां रौहीमिवाबलाम् ॥ ७ ॥

कामदेवके बाणोंसे घायल हुआ रावण मृगीके समान भयभीत हुई उस सुन्दरी अबलाको सम्बोधित करके इस प्रकार बोला— ।। ७ ।।

सीते पर्याप्तमेतावत् कृतो भर्तुरनुग्रहः ।
प्रसादं कुरु तन्वङ्गि क्रियतां परिकर्म ते ।। ८ ।।
‘सीते! आजतक तुमने जो अपने पतिपर इतना अनुग्रह दिखाया, यह बहुत हुआ। तन्वंगि! अब मुझपर कृपा करो, जिससे तुम्हें शृंगार धारण कराया जाय ।। ८ ।।

भजस्व मां वरारोहे महार्हाभरणाम्बरा ।
भव मे सर्वनारीणामुत्तमा वरवर्णिनी ।। ९ ।।
‘वरारोहे! मुझे अंगीकार करो और बहुमूल्य वस्त्राभूषणोंसे भूषित हो मेरी सब स्त्रियोंमें श्रेष्ठ तथा सुन्दरी पटरानी बनो ।। ९ ।।

सन्ति मे देवकन्याश्च गन्धर्वाणां च योषितः ।
सन्ति दानवकन्याश्च दैत्यानां चापि योषितः ।। १० ।।
‘मेरे महलमें देवताओंकी कन्याएँ, गन्धर्वोंकी युवती स्त्रियाँ, दानवकिशोरियाँ तथा दैत्योंकी रमणियाँ मेरी भार्याओंके रूपमें विद्यमान हैं ।। १० ।।

चतुर्दश पिशाचानां कोट्यो मे वचने स्थिताः ।
द्विस्तावत् पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ।। ११ ।।
‘चौदह करोड़ पिशाच मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं। इनसे दूने नरभक्षी राक्षस मेरे सेवक हैं, जो अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाले हैं ।। ११ ।।

ततो मे त्रिगुणा यक्षा ये मद्धचनकारिणः ।
केचिदेव धनाध्यक्षं भ्रातरं मे समाश्रिताः ।। १२ ।।
‘इनकी अपेक्षा तिगुनी संख्या मेरे आज्ञापालक यक्षोंकी है। यक्षोंमेंसे कुछ ही मेरे भाई धनाध्यक्ष कुबेरकी सेवामें रहते हैं ।। १२ ।।

गन्धर्वाप्सरसो भद्रे मामापानगतं सदा ।
उपतिष्ठन्ति वामोरु यथैव भ्रातरं मम ।। १३ ।।
‘भद्रे! वामोरु! जब मैं मधुपानकी गोष्ठीमें बैठता हूँ, उस समय मेरे भाईकी ही भाँति मेरी सेवामें भी गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उपस्थित होती हैं ।। १३ ।।

पुत्रोऽहमपि विप्रर्षेः साक्षाद् विश्रवसो मुनेः ।
पञ्चमो लोकपालानामिति मे प्रथितं यशः ।। १४ ।।
‘मैं भी कुबेरके ही समान साक्षात् ब्रह्मर्षि विश्रवा मुनिका पुत्र हूँ। (इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर—इन चार लोकपालोंके सिवा) पाँचवें लोकपालके रूपमें मेरा सुयश सर्वत्र फैला हुआ है ।। १४ ।।

दिव्यानि भक्ष्यभोज्यानि पानानि विविधानि च ।
यथैव त्रिदशेशस्य तथैव मम भाविनि ।। १५ ।।

‘भामिनि! देवराज इन्द्रकी भाँति मुझे भी दिव्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थ तथा नाना प्रकारके पेय रस उपलब्ध होते हैं।। १५ ।।
क्षीयतां दुष्कृतं कर्म वनवासकृतं तव ।
भार्या मे भव सुश्रोणि यथा मन्दोदरी तथा ।। १६ ।।
‘सुश्रोणि! वनवासका कष्ट प्रदान करनेवाले तुम्हारे पूर्वकृत दुष्कर्मकी समाप्ति हो जानी चाहिये; इसके लिये तुम मन्दोदरीकी भाँति मेरी भार्या हो जाओ’ ।। १६ ।।
इत्युक्ता तेन वैदेही परिवृत्य शुभानना ।
तृणमन्तरतः कृत्वा तमुवाच निशाचरम् ।। १७ ।।
अशिवेनातिवामोरूरजस्रं नेत्रवारिणा ।
स्तनावपतितौ बाला संहतावभिवर्षती ।। १८ ।।
उवाच वाक्यं तं क्षुद्रं वैदेही पतिदेवता ।
रावणके ऐसा कहनेपर परम सुन्दर जाँघोंसे सुशोभित, पतिको ही देवता माननेवाली विदेहराजकुमारी सुमुखी सीता अपना मुँह फेरकर बीचमें तिनकेकी ओट करके राक्षसोंके लिये अमंगलसूचक आँसुओंद्वारा अपने पीन एवं उन्नत स्तनोंको निरन्तर भिगोती हुई उस नीच निशाचरसे इस प्रकार बोलीं— ।। १७-१८ १/२ ।।
असकृद् वदतो वाक्यमीदृशं राक्षसेश्वर ।। १९ ।।
विषादयुक्तमेतत् ते मया श्रुतमभाग्यया ।
तद् भद्रसुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम् ।। २० ।।
‘राक्षसराज! तुम्हारे मुखसे ऐसी दुःखदायिनी बातें अनेक बार निकली हैं और मुझ अभागिनीको वे सारी बातें बार-बार सुननी पड़ी हैं। भद्रसुख! तुम्हारा भला हो। तुम अपना मन मेरी ओरसे हटा लो ।। १९-२० ।।
परदारास्म्यलभ्या च सततं च पतिव्रता ।
न चैवोपयिकी भार्या मानुषी कृपणा तव ।। २१ ।।
‘मैं परायी स्त्री हूँ, पतिव्रता हूँ। तुम कभी किसी तरह मुझे नहीं पा सकते। एक दीन मानवकन्या होनेके कारण मैं तुम-जैसे निशाचरकी भार्या होने योग्य नहीं हूँ ।। २१ ।।
विवशां धर्षयित्वा च कां त्वं प्रीतिमवाप्स्यसि ।
प्रजापतिसमो विप्रो ब्रह्मयोनिः पिता तव ।। २२ ।।
‘मुझ विवश अबलाको बलपूर्वक अपमानित करके तुम्हें क्या सुख मिलेगा? तुम्हारे पिता ब्राह्मण हैं। ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण वे ब्रह्माके ही समान हैं ।। २२ ।।
न च पालयसे धर्मं लोकपालसमः कथम् ।
भ्रातरं राजराजानं महेश्वरसखं प्रभुम् ।। २३ ।।
धनेश्वरं व्यपदिशन् कथं त्विह न लज्जसे ।

'तुम भी लोकपालोंके समान हो, फिर धर्मका पालन क्यों नहीं करते? महेश्वरके सखा राजराज धनाध्यक्ष प्रभु कुबेरको अपना भाई बता रहे हो, तो भी यहाँ ऐसा बर्ताव करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?' ॥ २३ १/२ ॥
इत्युक्त्वा प्रारुदत् सीता कम्पयन्ती पयोधरौ ॥ २४ ॥
शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्य वाससा ।
ऐसा कहकर तन्वंगी सीता अपनी गर्दन और मुखको कपड़ेसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं। उस समय छाती धड़कनेके कारण उनके स्तन काँप रहे थे ॥ २४ १/२ ॥
तस्या रुदत्या भाविन्या दीर्घा वेणी सुसंयता ॥ २५ ॥
ददृशे स्वसिता स्निग्धा काली व्यालीव मूर्धनि ।
अच्छी तरह रोती हुई भामिनी सीताके मस्तकपर बँधी हुई स्निग्ध, असित एवं विशाल वेणी काली नागिनके समान दिखायी देती थी ॥ २५ १/२ ॥
श्रुत्वा तद् रावणो वाक्यं सीतयोक्तं सुनिष्ठुरम् ॥ २६ ॥
प्रत्याख्यातोऽपि दुर्मेधाः पुनरेवाब्रवीद् वचः ।
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वजः ॥ २७ ॥
न त्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीम् ।
सीताके मुखसे यह अत्यन्त निष्ठुर वचन सुनकर और उनके द्वारा कोरा उत्तर पाकर भी दुर्बुद्धि रावण पुनः इस प्रकार कहने लगा—'सीते! भले ही कामदेव मेरे शरीरको पीड़ा देता रहे, परंतु मैं तुम-जैसी मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी युवतीको राजी किये बिना तुम्हारे साथ समागम नहीं करूँगा ॥ २६-२७ १/२ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् त्वमद्यापि मानुषम् ॥ २८ ॥
आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ॥ २९ ॥
'तुम आज भी उस मनुष्य रामके प्रति ही, जो हम लोगोंका आहार है, अनुराग दिखाती जा रही हो; ऐसी दशामें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ २८-२९ ॥
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसमहेश्वरः ।
तत्रैवान्तर्हितो भूत्वा जगामाभिमतां दिशम् ॥ ३० ॥
अनिन्द्य अंगोंवाली सीतासे ऐसा कहकर राक्षसराज रावण वहीं अन्तर्धान हो अभीष्ट दिशाकी ओर चल दिया ॥
राक्षसीभिः परिवृता वैदेही शोककर्शिता ।
सेव्यमाना त्रिजटया तत्रैव न्यवसत् तदा ॥ ३१ ॥
इधर शोकसे दुबली हुई सीता राक्षसियोंसे घिरकर त्रिजटासे सुसेवित हो अशोकवाटिकामें ही रहने लगीं ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि सीतारावणसंवादे एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें सीता-रावणसंवादविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८१ ॥