महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1885, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'तुम भी लोकपालोंके समान हो, फिर धर्मका पालन क्यों नहीं करते? महेश्वरके सखा राजराज धनाध्यक्ष प्रभु कुबेरको अपना भाई बता रहे हो, तो भी यहाँ ऐसा बर्ताव करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?' ॥ २३ १/२ ॥
इत्युक्त्वा प्रारुदत् सीता कम्पयन्ती पयोधरौ ॥ २४ ॥
शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्य वाससा ।
ऐसा कहकर तन्वंगी सीता अपनी गर्दन और मुखको कपड़ेसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं। उस समय छाती धड़कनेके कारण उनके स्तन काँप रहे थे ॥ २४ १/२ ॥
तस्या रुदत्या भाविन्या दीर्घा वेणी सुसंयता ॥ २५ ॥
ददृशे स्वसिता स्निग्धा काली व्यालीव मूर्धनि ।
अच्छी तरह रोती हुई भामिनी सीताके मस्तकपर बँधी हुई स्निग्ध, असित एवं विशाल वेणी काली नागिनके समान दिखायी देती थी ॥ २५ १/२ ॥
श्रुत्वा तद् रावणो वाक्यं सीतयोक्तं सुनिष्ठुरम् ॥ २६ ॥
प्रत्याख्यातोऽपि दुर्मेधाः पुनरेवाब्रवीद् वचः ।
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वजः ॥ २७ ॥
न त्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीम् ।
सीताके मुखसे यह अत्यन्त निष्ठुर वचन सुनकर और उनके द्वारा कोरा उत्तर पाकर भी दुर्बुद्धि रावण पुनः इस प्रकार कहने लगा—'सीते! भले ही कामदेव मेरे शरीरको पीड़ा देता रहे, परंतु मैं तुम-जैसी मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी युवतीको राजी किये बिना तुम्हारे साथ समागम नहीं करूँगा ॥ २६-२७ १/२ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् त्वमद्यापि मानुषम् ॥ २८ ॥
आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ॥ २९ ॥
'तुम आज भी उस मनुष्य रामके प्रति ही, जो हम लोगोंका आहार है, अनुराग दिखाती जा रही हो; ऐसी दशामें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ २८-२९ ॥
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसमहेश्वरः ।
तत्रैवान्तर्हितो भूत्वा जगामाभिमतां दिशम् ॥ ३० ॥
अनिन्द्य अंगोंवाली सीतासे ऐसा कहकर राक्षसराज रावण वहीं अन्तर्धान हो अभीष्ट दिशाकी ओर चल दिया ॥
राक्षसीभिः परिवृता वैदेही शोककर्शिता ।
सेव्यमाना त्रिजटया तत्रैव न्यवसत् तदा ॥ ३१ ॥
इधर शोकसे दुबली हुई सीता राक्षसियोंसे घिरकर त्रिजटासे सुसेवित हो अशोकवाटिकामें ही रहने लगीं ॥