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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

(कैरातपर्व)

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(कैरातपर्व)

अष्टात्रिंशोऽध्यायः

अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप

जनमेजय उवाच

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।
विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलब्धवान् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**भगवन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनकी यह कथा मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ; उन्होंने किस प्रकार अस्त्र प्राप्त किये? ॥ १ ॥

यथा च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजयः ।
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ॥ २ ॥
पुरुषसिंह महाबाहु तेजस्वी धनंजय उस निर्जन वनमें निर्भयके समान कैसे चले गये थे? ॥ २ ॥

किं च तेन कृतं तत्र वसता ब्रह्मवित्तम ।
कथं च भगवान् स्थाणुर्देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उस वनमें रहकर पार्थने क्या किया? भगवान् शंकर तथा देवराज इन्द्रको कैसे संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद् द्विजोत्तम ।
त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ॥ ४ ॥
विप्रवर! मैं आपकी कृपासे ये सब बातें सुनना चाहता हूँ। सर्वज्ञ! आप दिव्य और मानुष सभी वृत्तान्तों-को जानते हैं ॥ ४ ॥

अत्यद्भुततमं ब्रह्मन् रोमहर्षणमर्जुनः ।
भवेन सह संग्रामं चकाराप्रतिमं किल ॥ ५ ॥
पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः संग्रामेष्वपराजितः ।
यच्छ्रुत्वा नरसिंहाना दैन्यहर्षातिविस्मयात् ॥ ६ ॥
शूराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे ।
यद् यच्च कृतवानन्यत् पार्थस्तदखिलं वद ॥ ७ ॥

ब्रह्मन्! मैंने सुना है, कभी संग्राममें परास्त न होनेवाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् शंकरके साथ अत्यन्त अद्भुत, अनुपम और रोमांचकारी युद्ध किया था, जिसे सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ शूरवीर कुन्तीपुत्रोंके हृदयोंमें भी दैन्य, हर्ष और विस्मयके कारण कँपकँपी छा गयी थी। अर्जुनने और भी जो-जो कार्य किये हों, वे सब भी मुझे बताइये ॥ ५—७ ॥
न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये ।
चरितं तस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय ॥ ८ ॥
शूरवीर अर्जुनका अत्यन्त सूक्ष्म चरित्र भी ऐसा नहीं दिखायी देता है, जिसमें थोड़ी-सी भी निन्दाके लिये स्थान हो; अतः वह सब मुझसे कहिये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

कथयिष्यामि ते तात कथामेतां महात्मनः ।
दिव्यां पौरवशार्दूल महतीमद्भुतोपमाम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— तात! पौरवश्रेष्ठ! महात्मा अर्जुनकी यह कथा दिव्य, अद्भुत और महत्त्वपूर्ण है; इसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥ ९ ॥
गात्रसंस्पर्शसम्बद्धां त्र्यम्बकेण सहानुघ ।
पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक् समागमम् ॥ १० ॥
अनघ! देवदेव महादेवजीके साथ अर्जुनके शरीरका जो स्पर्श हुआ था, उससे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा है। तुम उन दोनोंके मिलनका यह वृत्तान्त भलीभाँति सुनो ॥ १० ॥
युधिष्ठिरनियोगात् स जगामामितविक्रमः ।
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम् ॥ ११ ॥
दिव्यं तद् धनुरादाय खड्गं च कनकत्सरुम् ।
महाबलो महाबाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये ॥ १२ ॥
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति ।
ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन् सर्वलोकमहारथः ॥ १३ ॥
राजन्! अमित पराक्रमी, महाबली, महाबाहु, कुरुकुलभूषण, इन्द्रपुत्र अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी और सुस्थिर चित्तवाले थे, युधिष्ठिरकी आज्ञासे देवराज इन्द्र तथा देवाधिदेव भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कार्यकी सिद्धिका उद्देश्य लेकर अपने उस दिव्य (गाण्डीव) धनुष और सोनेकी मूँठवाले खड्गको हाथमें लिये उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतकी ओर चले ॥ ११—१३ ॥
त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः ।
वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत ॥ १४ ॥

तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके बड़ी उतावलीके साथ जाते हुए वे अकेले ही एक भयंकर कण्टकाकीर्ण वनमें पहुँचे ॥ १४ ॥
नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ १५ ॥
जो नाना प्रकारके फल-फूलोंसे भरा था, भाँति-भाँतिके पक्षी जहाँ कलरव कर रहे थे, अनेक जातियोंके मृग उस वनमें सब ओर विचरते रहते थे तथा कितने ही सिद्ध और चारण निवास कर रहे थे ॥ १५ ॥
ततः प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् ।
शङ्खानां पटहानां च शब्दः समभवद् दिवि ॥ १६ ॥
तदनन्तर कुन्तीनन्दन अर्जुनके उस निर्जन वनमें पहुँचते ही आकाशमें शंखों और नगाड़ोंका गम्भीर घोष गूँज उठा ॥ १६ ॥
पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले ।
मेघजालं च विततं छादयामास सर्वतः ॥ १७ ॥
सोऽतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरेः ।
शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ॥ १८ ॥
पृथ्वीपर फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। मेघोंकी घटा घिरकर आकाशमें सब ओर छा गयी। उन दुर्गम वनस्थलियोंको लाँघकर अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें एक महान् पर्वतके निकट निवास करते हुए शोभा पाने लगे ॥ १७-१८ ॥
तत्रापश्यद् द्रुमान् फुल्लान् विहगैर्वल्गुनादितान् ।
नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यविमलप्रभाः ॥ १९ ॥
वहाँ उन्होंने फूलोंसे सुशोभित बहुत-से वृक्ष देखे, जो पक्षियोंके मधुर शब्दसे गुंजायमान हो रहे थे। उन्होंने वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई शोभामयी कितनी ही नदियाँ देखीं, जिनमें बहुत-सी भँवरें उठ रही थीं ॥ १९ ॥
हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा ।
पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः ॥ २० ॥
हंस, कारण्डव तथा सारस आदि पक्षी वहाँ मीठी बोली बोलते थे। तटवर्ती वृक्षोंपर कोयल मनोहर शब्द बोल रही थी। क्रौंचके कलरव और मयूरोंकी केकाध्वनि भी वहाँ सब ओर गूँजती रहती थी ॥ २० ॥
मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः ।
पुण्यशीतामलजलाः पश्यन् प्रीतमनाभवत् ॥ २१ ॥
उन नदियोंके आस-पास मनोहर वनश्रेणी सुशोभित होती थी। हिमालयके उस शिखरपर पवित्र, शीतल और निर्मल जलसे भरी हुई उन सुन्दर सरिताओंका दर्शन करके अतिरथी अर्जुनका मन प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ २१ ॥

रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा ।
तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥ २२ ॥
उग्र तेजस्वी महामना अर्जुन वहाँ वनके रमणीय प्रदेशोंमें घूम-फिरकर बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २२ ॥
दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः ।
शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपयुक्तवान् ॥ २३ ॥
कुशाका ही चीर धारण किये तथा दण्ड और मृगचर्मसे विभूषित अर्जुन पृथ्वीपर गिरे हुए सूखे पत्तोंका ही भोजनके स्थानमें उपयोग करते थे ॥ २३ ॥
पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः ।
द्विगुणेन हि कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥ २४ ॥
एक मासतक वे तीन-तीन रातके बाद केवल फलाहार करके रहे। दूसरे मासको उन्होंने पहलेकी अपेक्षा दूने-दूने समयपर अर्थात् छः-छः रातके बाद फलाहार करके व्यतीत किया ॥ २४ ॥
तृतीयमपि मासं स पक्षेणाहारमाचरन् ।
चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते मासे भरतसत्तमः ॥ २५ ॥
वायुभक्षो महाबाहुरभवत् पाण्डुनन्दनः ।
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ २६ ॥
तीसरा महीना पंद्रह-पंद्रह दिनमें भोजन करके बिताया। चौथा महीना आनेपर भरतश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन केवल वायु पीकर रहने लगे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी सहारेके पैरके अंगूठेके अग्रभागके बलपर खड़े रहे ॥ २५-२६ ॥
सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः ।
विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ॥ २७ ॥
अमित तेजस्वी महात्मा अर्जुनके सिरकी जटाएँ नित्य स्नान करनेके कारण विद्युत् और कमलोंके समान हो गयी थीं ॥ २७ ॥
ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् ।
निवेदयिषवः पार्थं तपस्युग्रे समास्थितम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर भयंकर तपस्यामें लगे हुए अर्जुनके विषयमें कुछ निवेदन करनेकी इच्छासे वहाँ रहनेवाले सभी महर्षि पिनाकधारी महादेवजीकी सेवामें गये ॥ २८ ॥
तं प्रणम्य महादेवं शशंसुः पार्थकर्म तत् ।
एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमास्थितः ॥ २९ ॥
उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमायन् दिशः ।
तस्य देवेश न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् ॥ ३० ॥

उन्होंने महादेवजीको प्रणाम करके अर्जुनका वह तपरूप कर्म कह सुनाया। वे बोले—'भगवन्! ये महातेजस्वी कुन्तीपुत्र अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें स्थित हो अपार एवं उग्र तपस्यामें संलग्न हैं और सम्पूर्ण दिशाओंको धूमाच्छादित कर रहे हैं। देवेश्वर! वे क्या करना चाहते हैं, इस विषयमें हमलोगोंमेंसे कोई कुछ नहीं जानता है ।। २९-३० ।।
संतापयति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम् ।
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। ३१ ।।
उमापतिर्भूतपतिर्वाक्यमेतदुवाच ह ।
'वे अपनी तपस्याके संतापसे हम सब महर्षियोंको संतप्त कर रहे हैं। अतः आप उन्हें तपस्यासे सद्भावपूर्वक निवृत्त कीजिये।' पवित्र चित्तवाले उन महर्षियोंका यह वचन सुनकर भूतनाथ भगवान् शंकर इस प्रकार बोले— ।। ३१ १/२ ।।

महादेव उवाच

न वो विषादः कर्तव्यः फाल्गुनं प्रति सर्वशः ।। ३२ ।।
शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः ।
अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम् ।। ३३ ।।
**महादेवजीने कहा—**महर्षियो! तुम्हें अर्जुनके विषयमें किसी प्रकारका विषाद करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुरन्त आलस्यरहित हो शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये हो, वैसे ही लौट जाओ। अर्जुनके मनमें जो संकल्प है, मैं उसे भलीभाँति जानता हूँ ।। ३२-३३ ।।
नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य तथाऽऽयुषः ।
यत् तस्य काङ्क्षितं सर्वं तत् करिष्येऽहमद्य वै ।। ३४ ।।
उन्हें स्वर्गलोककी कोई इच्छा नहीं है, वे ऐश्वर्य तथा आयु भी नहीं चाहते। वे जो कुछ पाना चाहते हैं, वह सब मैं आज ही पूर्ण करूँगा ।। ३४ ।।

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा शर्ववचनमृषयः सत्यवादिनः ।
प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथा स्वान् पुनरालयान् ।। ३५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर वे सत्यवादी महर्षि प्रसन्नचित्त हो फिर अपने आश्रमोंको लौट गये ।। ३५ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि मुनिशङ्करसंवादे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महर्षियों तथा भगवान् शंकरके संवादसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।

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