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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 295

रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा ।
तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥ २२ ॥
उग्र तेजस्वी महामना अर्जुन वहाँ वनके रमणीय प्रदेशोंमें घूम-फिरकर बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २२ ॥
दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः ।
शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपयुक्तवान् ॥ २३ ॥
कुशाका ही चीर धारण किये तथा दण्ड और मृगचर्मसे विभूषित अर्जुन पृथ्वीपर गिरे हुए सूखे पत्तोंका ही भोजनके स्थानमें उपयोग करते थे ॥ २३ ॥
पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः ।
द्विगुणेन हि कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥ २४ ॥
एक मासतक वे तीन-तीन रातके बाद केवल फलाहार करके रहे। दूसरे मासको उन्होंने पहलेकी अपेक्षा दूने-दूने समयपर अर्थात् छः-छः रातके बाद फलाहार करके व्यतीत किया ॥ २४ ॥
तृतीयमपि मासं स पक्षेणाहारमाचरन् ।
चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते मासे भरतसत्तमः ॥ २५ ॥
वायुभक्षो महाबाहुरभवत् पाण्डुनन्दनः ।
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ २६ ॥
तीसरा महीना पंद्रह-पंद्रह दिनमें भोजन करके बिताया। चौथा महीना आनेपर भरतश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन केवल वायु पीकर रहने लगे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी सहारेके पैरके अंगूठेके अग्रभागके बलपर खड़े रहे ॥ २५-२६ ॥
सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः ।
विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ॥ २७ ॥
अमित तेजस्वी महात्मा अर्जुनके सिरकी जटाएँ नित्य स्नान करनेके कारण विद्युत् और कमलोंके समान हो गयी थीं ॥ २७ ॥
ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् ।
निवेदयिषवः पार्थं तपस्युग्रे समास्थितम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर भयंकर तपस्यामें लगे हुए अर्जुनके विषयमें कुछ निवेदन करनेकी इच्छासे वहाँ रहनेवाले सभी महर्षि पिनाकधारी महादेवजीकी सेवामें गये ॥ २८ ॥
तं प्रणम्य महादेवं शशंसुः पार्थकर्म तत् ।
एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमास्थितः ॥ २९ ॥
उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमायन् दिशः ।
तस्य देवेश न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् ॥ ३० ॥