महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1123)
स्तेनाप्रमेयेण समागतानाम् ।
स चापि तान् प्रेक्ष्य किरीटमाली
ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ॥ ६ ॥
अप्रमेय वीर अर्जुनसे मिलकर सब पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अर्जुन भी उन सबसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए तथा राजा युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६ ॥
यमास्थितः सप्त जघान पूगान्
दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता ।
तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः
प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥
नमुचिनाशक इन्द्रने जिसपर बैठकर दैत्योंके सात यूथोंका संहार किया था, उस इन्द्ररथके समीप जाकर उदार हृदयवाले कुन्तीपुत्रोंने उसकी परिक्रमा की ॥ ७ ॥
ते मातलेश्चक्रुरतीव हृष्टाः
सत्कारमग्र्यं सुरराजतुल्यम् ।
सर्वान् यथावच्च दिवौकसस्ते
पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ॥ ८ ॥
साथ ही, उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर मातलिके देवराज इन्द्रके समान सर्वोत्तम विधिसे सत्कार किया। इसके बाद उन पाण्डवोंने मातलिसे सम्पूर्ण देवताओंका यथावत् कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्दत्
पितेव पुत्राननुशिष्य पार्थान् ।
ययौ रथेनाप्रतिमप्रभेण
पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ॥ ९ ॥
मातलिने भी पाण्डवोंका अभिनन्दन किया और जैसे पिता पुत्रको उपदेश देता है, उसी प्रकार पाण्डवोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर वे पुनः अपने अनुपम कान्तिशाली रथके द्वारा स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्रके समीप चले गये ॥ ९ ॥
गते तु तस्मिन् नरदेववर्यः
शक्रात्मजः शक्ररिपुप्रमाथी ।
(साक्षात् सहस्राक्ष इव प्रतीतः
श्रीमान् स्वदेहादवमुच्य जिष्णुः ।)
शक्रेण दत्तानि ददौ महात्मा
महाधनान्युत्तमरूपवन्ति ॥ १० ॥
दिवाकराभाणि विभूषणानि
प्रियः प्रियायै सुतसोममात्रे ।
मातलिके चले जानेपर इन्द्रशत्रुओंका संहार करनेवाले देवेन्द्रकुमार नृपश्रेष्ठ महात्मा श्रीमान् अर्जुनने, जो साक्षात् सहस्रलोचन इन्द्रके समान प्रतीत होते थे, अपने शरीरसे उतारकर इन्द्रके दिये हुए बहुमूल्य, उत्तम तथा सूर्यके समान देदीप्यमान दिव्य आभूषण अपनी प्रियतमा सुतसोमकी माता द्रौपदीको समर्पित कर दिये।।
ततः स तेषां कुरुपुङ्गवानां
तेषां च सूर्याग्निसमप्रभाणाम् ॥ ११ ॥
विप्रर्षभाणामुपविश्य मध्ये
सर्वं यथावत् कथयांबभूव ।
एवं मयास्त्राण्युपशिक्षितानि
शक्राच्च वाताच्च शिवाच्च साक्षात् ॥ १२ ॥
तदनन्तर उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवों तथा सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंके बीचमें बैठकर अर्जुनने अपना सब समाचार यथावत् रूपसे कह सुनाया। 'मैंने अमुक प्रकारसे इन्द्र, वायु और साक्षात् शिवसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है ॥ ११-१२ ॥
तथैव शीलेन समाधिनाथ
प्रीताः सुरा मे सहिताः सहेन्द्राः ।
संक्षेपतो वै स विशुद्धकर्मा
तेभ्यः समाख्याय दिवि प्रवासम् ॥ १३ ॥
माद्रीसुताभ्यां सहितः किरीटी
सुष्वाप तामावसतिं प्रतीतः ॥ १४ ॥
'मेरे शील-स्वभाव तथा चित्तकी एकाग्रतासे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मुझपर बहुत प्रसन्न रहते थे। निर्दोष कर्म करनेवाले अर्जुनने अपने स्वर्गीय प्रवासका सब समाचार उन सबको संक्षेपसे बताकर नकुल-सहदेवके साथ निश्चिन्त होकर उस आश्रममें शयन किया ॥ १३-१४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनसमागमे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अर्जुनसमागमविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर १४ १/२ श्लोक हैं)