महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1124, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तेनाप्रमेयेण समागतानाम् ।
स चापि तान् प्रेक्ष्य किरीटमाली
ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ॥ ६ ॥
अप्रमेय वीर अर्जुनसे मिलकर सब पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अर्जुन भी उन सबसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए तथा राजा युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६ ॥
यमास्थितः सप्त जघान पूगान्
दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता ।
तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः
प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥
नमुचिनाशक इन्द्रने जिसपर बैठकर दैत्योंके सात यूथोंका संहार किया था, उस इन्द्ररथके समीप जाकर उदार हृदयवाले कुन्तीपुत्रोंने उसकी परिक्रमा की ॥ ७ ॥
ते मातलेश्चक्रुरतीव हृष्टाः
सत्कारमग्र्यं सुरराजतुल्यम् ।
सर्वान् यथावच्च दिवौकसस्ते
पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ॥ ८ ॥
साथ ही, उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर मातलिके देवराज इन्द्रके समान सर्वोत्तम विधिसे सत्कार किया। इसके बाद उन पाण्डवोंने मातलिसे सम्पूर्ण देवताओंका यथावत् कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्दत्
पितेव पुत्राननुशिष्य पार्थान् ।
ययौ रथेनाप्रतिमप्रभेण
पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ॥ ९ ॥
मातलिने भी पाण्डवोंका अभिनन्दन किया और जैसे पिता पुत्रको उपदेश देता है, उसी प्रकार पाण्डवोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर वे पुनः अपने अनुपम कान्तिशाली रथके द्वारा स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्रके समीप चले गये ॥ ९ ॥
गते तु तस्मिन् नरदेववर्यः
शक्रात्मजः शक्ररिपुप्रमाथी ।
(साक्षात् सहस्राक्ष इव प्रतीतः
श्रीमान् स्वदेहादवमुच्य जिष्णुः ।)
शक्रेण दत्तानि ददौ महात्मा
महाधनान्युत्तमरूपवन्ति ॥ १० ॥
दिवाकराभाणि विभूषणानि
प्रियः प्रियायै सुतसोममात्रे ।