महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२९९-
नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति
मार्कण्डेय उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले ।
कृतपौर्वाह्निकाः सर्वे समेयुस्ते तपोधनाः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**जब वह रात बीत गयी और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सब तपोधन ऋषिगण पूर्वाह्नकालका नित्यकृत्य पूरा करके पुनः उस आश्रममें एकत्र हुए ॥ १ ॥
तदेव सर्वं सावित्र्या महाभाग्यं महर्षयः ।
द्युमत्सेनाय नातृप्यन् कथयन्तः पुनः पुनः ॥ २ ॥
वे महर्षिगण राजा द्युमत्सेनसे सावित्रीके उस परम सौभाग्यका बारंबार वर्णन करते हुए भी तृप्त नहीं होते थे ॥ २ ॥
ततः प्रकृतयः सर्वाः शाल्वेभ्योऽभ्यागता नृप ।
आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं द्विषम् ॥ ३ ॥
राजन्! उसी समय शाल्वदेशसे वहाँकी सारी प्रजाओंने आकर महाराज द्युमत्सेनसे कहा—'प्रभो! आपका शत्रु अपने ही मन्त्रीके हाथों मारा गया है' ॥ ३ ॥
तं मन्त्रिणा हतं श्रुत्वा ससहायं सबान्धवम् ।
न्यवेदयन् यथावृत्तं विद्रुतं च द्विषद्बलम् ॥ ४ ॥
ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति ।
सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ॥ ५ ॥
उन्होंने यह भी निवेदन किया कि 'उसके सहायक और बन्धु-बान्धव भी मन्त्रीके ही हाथों मर चुके हैं। शत्रु की सारी सेना पलायन कर गयी है। यह यथावत् वृत्तान्त सुनकर सब लोगोंका एकमतसे यह निश्चय हुआ है कि हमें पूर्व नरेशपर ही विश्वास है। उन्हें दिखायी देता हो या न दीखता हो, वे ही हमारे राजा हों' ॥ ४-५ ॥
अनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप ।
प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है। ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरंगिणी सेना भी सेवामें उपस्थित है’ ॥ ६ ॥
प्रयाहि राजन् भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः ।
अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥ ७ ॥
‘राजन्! आपका कल्याण हो। अब अपने राज्यमें पधारिये। नगरमें आपकी विजय घोषित कर दी गयी है। आप दीर्घकालतक अपने बाप-दादोंके राज्यपर प्रतिष्ठित रहें’ ॥ ७ ॥
चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् ।
मूर्ध्ना निपतिताः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् राजा द्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ८ ॥
ततोऽभिवाद्य तान् वृद्धान् द्विजानाश्रमवासिनः ।
तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥ ९ ॥
इसके बाद राजाने आश्रममें रहनेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणोंका अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानीकी ओर चले ॥ ९ ॥
शैब्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा ।
नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥ १० ॥
शैब्या भी अपनी बहू सावित्रीके साथ सुन्दर बिछावनसे युक्त तेजस्वी शिबिकापर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ हो सेनासे घिरी हुई चल दी ॥ १० ॥
ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः ।
पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ११ ॥
वहाँ पहुँचनेपर पुरोहितोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्युमत्सेनका राज्याभिषेक किया। साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवान्को भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ११ ॥
ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् ।
तद् वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् सावित्रीके गर्भसे उसकी कीर्ति बढ़ानेवाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब शूरवीर तथा संग्राममें कभी पीछे न हटनेवाले थे ॥ १२ ॥
भ्रातॄणां सोदराणां च तथैवास्याभवच्छतम् ।
मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहद् बलम् ॥ १३ ॥
इसी प्रकार मद्राज अश्वपतिके भी मालवीके गर्भसे सावित्रीके सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे ॥ १३ ॥
एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च ।
भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात् समुद्धृतम् ॥ १४ ॥
इस तरह सावित्रीने अपने आपको, पिता-माताको, सास-ससुरको तथा पतिके समस्त कुलको भी भारी संकटसे बचा लिया था ॥ १४ ॥
तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता ।
तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥ १५ ॥
सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना ।
विशोको विज्वरो राजन् काम्यके न्यवसत् तदा ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेयजीके समझाने-बुझाने और आश्वासन देनेपर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्तासे रहित हो काम्यकवनमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १६ ॥
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् ।
स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥ १७ ॥
जो इस परम उत्तम सावित्री-उपाख्यानको भक्तिभावसे सुनेगा, वह मनुष्य सदा अपने समस्त मनोरथोंके सिद्ध होनेसे सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-उपाख्यानविषयक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९९ ॥