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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2016, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2016

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नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति

मार्कण्डेय उवाच

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले ।
कृतपौर्वाह्निकाः सर्वे समेयुस्ते तपोधनाः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**जब वह रात बीत गयी और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सब तपोधन ऋषिगण पूर्वाह्नकालका नित्यकृत्य पूरा करके पुनः उस आश्रममें एकत्र हुए ॥ १ ॥

तदेव सर्वं सावित्र्या महाभाग्यं महर्षयः ।
द्युमत्सेनाय नातृप्यन् कथयन्तः पुनः पुनः ॥ २ ॥
वे महर्षिगण राजा द्युमत्सेनसे सावित्रीके उस परम सौभाग्यका बारंबार वर्णन करते हुए भी तृप्त नहीं होते थे ॥ २ ॥

ततः प्रकृतयः सर्वाः शाल्वेभ्योऽभ्यागता नृप ।
आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं द्विषम् ॥ ३ ॥
राजन्! उसी समय शाल्वदेशसे वहाँकी सारी प्रजाओंने आकर महाराज द्युमत्सेनसे कहा—'प्रभो! आपका शत्रु अपने ही मन्त्रीके हाथों मारा गया है' ॥ ३ ॥

तं मन्त्रिणा हतं श्रुत्वा ससहायं सबान्धवम् ।
न्यवेदयन् यथावृत्तं विद्रुतं च द्विषद्बलम् ॥ ४ ॥
ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति ।
सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ॥ ५ ॥
उन्होंने यह भी निवेदन किया कि 'उसके सहायक और बन्धु-बान्धव भी मन्त्रीके ही हाथों मर चुके हैं। शत्रु की सारी सेना पलायन कर गयी है। यह यथावत् वृत्तान्त सुनकर सब लोगोंका एकमतसे यह निश्चय हुआ है कि हमें पूर्व नरेशपर ही विश्वास है। उन्हें दिखायी देता हो या न दीखता हो, वे ही हमारे राजा हों' ॥ ४-५ ॥