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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१७५-

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पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना

वैशम्पायन उवाच

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धर्मराजो युधिष्ठिरः
उत्थायावश्यककार्याणि कृतवान् भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब वह रात बीत गयी तब धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयोंसहित उठकर आवश्यक नित्यकर्म पूरे किये ॥ १ ॥

ततः संचोदयामास सोऽर्जुनं भ्रातृनन्दनम्
दर्शयास्त्राणि कौन्तेय यैर्जिता दानवास्त्वया ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने भाइयोंको सुख पहुँचानेवाले अर्जुनको आज्ञा दी—'कुन्तीनन्दन! अब तुम उन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कराओ जिनसे तुमने दानवोंपर विजय पायी है' ॥ २ ॥

ततो धनंजयो राजन् देवैर्दत्तानि पाण्डवः
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शयामास भारत ॥ ३ ॥
राजन्! तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने देवताओंके दिये हुए उन दिव्य अस्त्रोंको दिखानेका आयोजन किया ॥ ३ ॥

यथान्यायं महातेजाः शौचं परममास्थितः
(नमस्कृत्य त्रिनेत्राय वासवाय च पाण्डवः ।)
गिरिकूबरपादाक्षं शुभवेणु त्रिवेणुमत् ॥ ४ ॥
पार्थिवं रथमास्थाय शोभमानो धनंजयः
दिव्येन संवृतस्तेन कवचेन सुवर्चसा ॥ ५ ॥
धनुरादाय गाण्डीवं देवदत्तं स वारिजम्
शोशुभ्यमानः कौन्तेय आनुपूर्व्यान्महाभुजः ॥ ६ ॥
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे
अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै ॥ ७ ॥
समाक्रान्ता मही पद्भ्यां समकम्पत सद्रुमा
क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः ॥ ८ ॥
महातेजस्वी अर्जुन पहले तो विधिपूर्वक स्नान करके शुद्ध हुए। फिर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और इन्द्रको नमस्कार करके उन्होंने वह अत्यन्त तेजस्वी दिव्य कवच धारण किया। तत्पश्चात् वे पृथ्वीरूपी रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे। पर्वत ही उस रथका कूबर था, दोनों पैर ही पहिये थे और सुन्दर बाँसोंका वन ही त्रिवेणु (रथके अंगविशेष)-का काम देता था। तदनन्तर महाबाहु कुन्तीनन्दन अर्जुनने एक हाथमें गाण्डीव धनुष और

दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमशः उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी। नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया ।। ४-८ ।।
शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः।
न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वल च पावकः ॥ ९ ॥
पर्वत विदीर्ण होने लगे और हवाकी गति रुक गयी। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आगका जलना बंद हो गया ॥ ९ ॥
न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन
अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय ॥ १० ॥
पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन्
वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः ॥ ११ ॥
दह्यमानास्तदास्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम्
ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः ॥ १२ ॥
जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे
देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः ॥ १३ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः
खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥ १४ ॥
द्विजातियोंको किसी प्रकार भी वेदोंका भान नहीं हो पाता था। जनमेजय! भूमिके भीतर जो प्राणी निवास करते थे, वे भी पीड़ित हो उठे और अर्जुनको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये। उन सबके मुखपर विकृति आ गयी थी। वे हाथ जोड़े हुए थर-थर काँप रहे थे और अस्त्रोंके तेजसे संतप्त हो धनंजयसे प्राणोंकी भिक्षा माँग रहे थे। इसी समय ब्रह्मर्षि, सिद्ध महर्षि, समस्त जंगम प्राणी, श्रेष्ठ देवर्षि, देवता, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पक्षी तथा आकाशचारी प्राणी सभी वहाँ आकर उपस्थित हो गये ।। १०-१४ ।।
ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः
भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥ १५ ॥
इसके बाद ब्रह्माजी, समस्त लोकपाल तथा भगवान् महादेव अपने गणोंसहित वहाँ आये ।। १५ ।।
ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः
अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥ १६ ॥
महाराज! तदनन्तर वायुदेव पाण्डुनन्दन अर्जुनपर सब ओरसे विचित्र सुगन्धित दिव्य मालाओंकी वृष्टि करने लगे ।। १६ ।।
जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः

ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः
आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत
नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १९ ॥
नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे—‘अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो। भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥

अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो। कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्

बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव
भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
‘पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं। अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना। अजातशत्रु युधिष्ठिर! (आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें।) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा’ ॥ २२-२३ ॥

वैशम्पायन उवाच

निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम्
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥
तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥