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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1185, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1185

दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया। इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमशः उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया। जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी। नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया ।। ४-८ ।।
शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः।
न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वल च पावकः ॥ ९ ॥
पर्वत विदीर्ण होने लगे और हवाकी गति रुक गयी। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आगका जलना बंद हो गया ॥ ९ ॥
न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन
अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय ॥ १० ॥
पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन्
वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः ॥ ११ ॥
दह्यमानास्तदास्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम्
ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः ॥ १२ ॥
जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे
देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः ॥ १३ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः
खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥ १४ ॥
द्विजातियोंको किसी प्रकार भी वेदोंका भान नहीं हो पाता था। जनमेजय! भूमिके भीतर जो प्राणी निवास करते थे, वे भी पीड़ित हो उठे और अर्जुनको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये। उन सबके मुखपर विकृति आ गयी थी। वे हाथ जोड़े हुए थर-थर काँप रहे थे और अस्त्रोंके तेजसे संतप्त हो धनंजयसे प्राणोंकी भिक्षा माँग रहे थे। इसी समय ब्रह्मर्षि, सिद्ध महर्षि, समस्त जंगम प्राणी, श्रेष्ठ देवर्षि, देवता, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पक्षी तथा आकाशचारी प्राणी सभी वहाँ आकर उपस्थित हो गये ।। १०-१४ ।।
ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः
भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥ १५ ॥
इसके बाद ब्रह्माजी, समस्त लोकपाल तथा भगवान् महादेव अपने गणोंसहित वहाँ आये ।। १५ ।।
ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः
अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥ १६ ॥
महाराज! तदनन्तर वायुदेव पाण्डुनन्दन अर्जुनपर सब ओरसे विचित्र सुगन्धित दिव्य मालाओंकी वृष्टि करने लगे ।। १६ ।।
जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः