महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११३-
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना
विभाण्डक उवाच
रक्षांसि चैतानि चरन्ति पुत्र
रूपेण तेनाद्भुतदर्शनेन ।
अतुल्यवीर्याण्यभिरूपवन्ति
विघ्नं सदा तपसश्चिन्तयन्ति ॥ १ ॥
विभाण्डकने कहा— बेटा! इस प्रकार अद्भुत दर्शनीय रूप धारण करके तो राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं। ये अनुपम पराक्रमी और मनोहर रूप धारण करनेवाले होते हैं, तथा ऋषि-मुनियोंकी तपस्यामें सदा विघ्न डालनेका ही उपाय सोचते रहते हैं ॥ १ ॥
सुरूपरूपाणि च तानि तात
प्रलोभयन्ते विविधैरुपायैः ।
सुखाच्च लोकाच्च निपातयन्ति
तान्युग्ररूपाणि मुनीन् वनेषु ॥ २ ॥
तात! वे मनोहर रूपधारी राक्षस नाना प्रकारके उपायोंद्वारा मुनिलोगोंको प्रलोभनमें डालते रहते हैं। फिर वे ही भयानक रूप धारण करके वनमें निवास करनेवाले मुनियोंको आनन्दमय लोकोंसे नीचे गिरा देते हैं ॥ २ ॥
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा
सतां लोकान् प्रार्थयानः कथंचित् ।
कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते
पापाचारास्तापसस्तान् न पश्येत् ॥ ३ ॥
अतः जो साधु पुरुषोंको मिलनेवाले पुण्यलोकोंको पाना चाहता है, वह मुनि मनको संयममें रखकर उन राक्षसोंका (जो मोहक रूप बनाकर धोखा देनेके लिये आते हैं) किसी प्रकार सवेन न करे। वे पापाचारी निशाचर तपस्वी मुनियोंके तपमें विघ्न डालकर प्रसन्न होते हैं, अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं ॥ ३ ॥
असज्जनेनाचरितानि पुत्र
पापान्यपेयानि मधूनि तानि ।
माल्यानि चैतानि न वै मुनीनां
स्मृतानि चित्रोज्ज्वलगन्धवन्ति ॥ ४ ॥
वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था। वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिये। दुष्ट पुरुष उसका उपयोग करते हैं तथा ये विचित्र, उज्ज्वल और सुगन्धित पुष्पमालाएँ भी मुनियोंके योग्य नहीं बतायी गयी हैं ॥ ४ ॥
रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं
विभाण्डकस्तां मृगयाम्बभूव ।
नासादयामास यदा त्र्यहेण
तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय ॥ ५ ॥
'ऐसी वस्तुएँ लानेवाले राक्षस ही हैं।' ऐसा कहकर विभाण्डक मुनिने पुत्रको उससे मिलने-जुलनेसे मना कर दिया और स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे। तीन दिनोंतक ढूँढ़नेपर भी जब वे उसका पता न लगा सके, तब आश्रमपर लौट आये ॥ ५ ॥
यदा पुनः काश्यपो वै जगाम
फलान्याहर्तुं विधिनाऽऽश्रमात् सः ।
तदा पुनर्लोभयितुं जगाम
सा वेशयोषा मुनिमृष्यशृङ्गम् ॥ ६ ॥
जब काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि आश्रमसे पुनः विधिके अनुसार फल लानेके लिये वनमें गये, तब वह वेश्या ऋष्यशृंग मुनिको लुभानेके लिये फिर उनके आश्रमपर आयी ॥ ६ ॥
दृष्ट्वैव तामृष्यशृङ्गः प्रहृष्टः
सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत् तदानीम् ।
प्रोवाच चैनां भवतः श्रमाय
गच्छाव यावन्न पिता ममैति ॥ ७ ॥
उसे देखते ही ऋष्यशृंग मुनि हर्ष-विभोर हो उठे और घबराकर तुरंत उसके पास दौड़ गये। निकट जाकर उन्होंने कहा—'ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जबतक लौटकर नहीं आते, तभीतक मैं और आप—दोनों आपके आश्रमकी ओर चल दें' ॥ ७ ॥
ततो राजन् काश्यपस्यैकपुत्रं
प्रवेश्य योगेन विमुच्य नावम् ।
प्रमोदयन्त्यो विविधैरुपायै-
राजग्मुरङ्गाधिपतेः समीपम् ॥ ८ ॥
राजन्! तदनन्तर विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको युक्तिसे नावमें ले जाकर वेश्याने नाव खोल दी। फिर सभी युवतियाँ भाँति-भाँतिके उपायोंद्वारा उनका मनोरंजन करती हुई अंगराजके समीप आयीं ॥ ८ ॥
संस्थाप्य तामाश्रमदर्शने तु
सन्तारितां नावमथातिशुभ्राम् ।
नीरादुपादाय तथैव चक्रे
नाव्याश्रमं नाम वनं विचित्रम् ॥ ९ ॥
नाविकोंद्वारा संचालित उस अत्यन्त उज्ज्वल नौकाको जलसे बाहर निकालकर राजाने एक स्थानपर स्थापित कर दिया और जितनी दूरीसे वह नौकागत आश्रम दिखायी देता था, उतनी दूरीके विस्तृत मैदानमें उन्होंने ऋष्यशृंग मुनिके आश्रम-जैसे ही एक विचित्र वनका निर्माण करा दिया, जो ‘नाव्याश्रम’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ९ ॥
अन्तःपुरे तं तु निवेश्य राजा
विभाण्डकस्यात्मजमेकपुत्रम् ।
ददर्श देवं सहसा प्रवृष्ट-
मापूर्यमाणं च जगज्जलेन ॥ १० ॥
राजा लोमपादने विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको महलके भीतर रनिवासमें ठहरा दिया और देखा, सहसा उसी क्षण इन्द्रदेवने वर्षा आरम्भ कर दी तथा सारा जगत् जलसे परिपूर्ण हो गया ॥ १० ॥
स लोमपादः परिपूर्णकामः
सुतां ददावृष्यशृङ्गाय शान्ताम् ।
क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे
गाश्चैव मार्गेषु च कर्षणानि ॥ ११ ॥
लोमपादकी कामना पूरी हुई। उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग मुनिको ब्याह दी। फिर विभाण्डक मुनिके क्रोधके निवारणका भी उपाय कर दिया। जिस रास्तेसे महर्षि आनेवाले थे, उसमें स्थान-स्थानपर बहुत-से गाय-बैल रखवा दिये और किसानोंद्वारा खेतोंकी जुताई आरम्भ करा दी ॥ ११ ॥
विभाण्डकस्याव्रजतः स राजा
पशून् प्रभूतान् पशूपांश्च वीरान् ।
समादिशत् पुत्रगृद्धी महर्षि-
र्विभाण्डकः परिपृच्छेद् यदा वः ॥ १२ ॥
स वक्तव्यः प्राञ्जलिभिर्भवद्भिः
पुत्रस्य ते पशवः कर्षणं च ।
किं ते प्रियं वै क्रियतां महर्षे
दासाः स्म सर्वे तव वाचि बद्धाः ॥ १३ ॥
राजाने विभाण्डक मुनिके आगमन-पथमें बहुत-से पशु तथा वीर पशुरक्षक भी नियुक्त कर दिये और सबको यह आदेश दे दिया था कि जब पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षि विभाण्डक तुमसे पूछें तब हाथ जोड़कर उन्हें इस प्रकार उत्तर देना—‘ये सब आपके पुत्रके
ही पशु हैं, ये खेत भी उन्हींके जोते जा रहे हैं। महर्षे! आज्ञा दें, हम आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें। हम सब लोग आपके आज्ञापालक दास हैं' ॥ १२-१३ ॥
अथोपायात् स मुनिश्चण्डकोपः
स्वमाश्रमं मूलफलं गृहीत्वा ।
अन्वेषमाणश्च न तत्र पुत्रं
ददर्श चुक्रोध ततो भृशं सः ॥ १४ ॥
इधर प्रचण्ड कोपधारी महात्मा विभाण्डक फल-मूल लेकर अपने आश्रमपर आये। वहाँ बहुत खोज करनेपर भी जब अपना पुत्र उन्हें दिखायी न दिया, तब वे अत्यन्त क्रोधमें भर गये ॥ १४ ॥
ततः स कोपेन विदीर्यमाण
आशङ्कमानो नृपतेर्विधानम् ।
जगाम चम्पां प्रति धक्ष्यमाण-
स्तमङ्गराजं सपुरं सराष्ट्रम् ॥ १५ ॥
कोपसे उनका हृदय विदीर्ण-सा होने लगा। उनके मनमें यह संदेह हुआ कि कहीं राजा लोमपादकी तो यह करतूत नहीं है। तब वे चम्पानगरीकी ओर चल दिये, मानो अंगराजको उनके राष्ट्र और नगरसहित जला देना चाहते हों ॥ १५ ॥
स वै श्रान्तः क्षुधितः काश्यपस्तान्
घोषान् समासादितवान् समृद्धान् ।
गोपैश्च तैर्विधिवत् पूज्यमानो
राजेव तां रात्रिमुवास तत्र ॥ १६ ॥
थककर भूखसे पीड़ित होनेपर विभाण्डक मुनि सायंकालमें उन्हीं समृद्धिशाली गोष्ठोंमें गये। गोपगणोंने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। वे राजाकी भाँति सुख-सुविधाके साथ वहीं रातभर रहे ॥ १६ ॥
अवाप्य सत्कारमतीव तेभ्यः
प्रोवाच कस्य प्रथिताः स्थ गोपाः ।
ऊचुस्ततस्तेऽभ्युपगम्य सर्वे
धनं तवेदं विहितं सुतस्य ॥ १७ ॥
गोपगणोंसे अत्यन्त सत्कार पाकर मुनिने पूछा—'तुम किसके गोपालक हो?' तब उन सबने निकट आकर कहा—'यह सारा धन आपके पुत्रका ही है' ॥
देशेषु देशेषु स पूज्यमान-
स्तांश्चैव शृण्वन् मधुरान् प्रलापान् ।
प्रशान्तभूयिष्ठरजाः प्रहृष्टः
समाससादाङ्गपतिं पुरस्थम् ॥ १८ ॥
देश-देशमें सम्मानित हो वे ही मधुर वचन सुनते-सुनते मुनिका रजोगुणजनित अत्यधिक क्रोध बिलकुल शान्त हो गया। वे प्रसन्नतापूर्वक राजधानीमें जाकर अंगराजसे मिले ॥ १८ ॥
स पूजितस्तेन नरर्षभेण
ददर्श पुत्रं दिवि देवं यथेन्द्रम् ।
शान्तां स्नुषां चैव ददर्श तत्र
सौदामनीमुच्चरन्तीं यथैव ॥ १९ ॥
नरश्रेष्ठ लोमपादसे पूजित हो मुनिने अपने पुत्रको उसी प्रकार ऐश्वर्यसम्पन्न देखा, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें देखे जाते हैं। पुत्रके पास ही उन्होंने बहू शान्ताको भी देखा, जो विद्युत्के समान उद्भासित हो रही थी ॥ १९ ॥
ग्रामांश्च घोषांश्च सुतस्य दृष्ट्वा
शान्तां च शान्तोऽस्य परः स कोपः ।
चकार तस्यैव परं प्रसादं
विभाण्डको भूमिपतेरनिन्द्र ॥ २० ॥
अपने पुत्रके अधिकारमें आये हुए ग्राम, घोष और बहू शान्ताको देखकर उनका महान्
कोप शान्त हो गया। युधिष्ठिर! उस समय विभाण्डक मुनिने राजा लोमपादपर बड़ी कृपा
की ॥ २० ॥
स तत्र निक्षिप्य सुतं महर्षि-
रुवाच सूर्याग्निसमप्रभावः ।
जाते च पुत्रे वनमेवाव्रजेथा
राज्ञः प्रियाण्यस्य सर्वाणि कृत्वा ॥ २१ ॥
सूर्य और अग्निके समान प्रभावशाली महर्षिने अपने पुत्रको वहीं छोड़ दिया और कहा
—'बेटा! पुत्र उत्पन्न हो जानेपर इन अंगराजके सारे प्रिय कार्य सिद्ध करके फिर वनमें ही
आ जाना' ॥ २१ ॥
स तद्वचः कृतवानृष्यशृङ्गो
ययौ च यत्रास्य पिता बभूव ।
शान्ता चैनं पर्यचरन्नरेन्द्र
खे रोहिणी सोममिवानुकूला ॥ २२ ॥
ऋष्यशृंगने पिताकी आज्ञाका अक्षरशः पालन किया। अन्तमें वे पुनः उसी आश्रममें
चले गये जहाँ उनके पिता रहते थे। नरेन्द्र! शान्ता उसी प्रकार अनुकूल रहकर उनकी सेवा
करती थी जैसे आकाशमें रोहिणी चन्द्रमाकी सेवा करती है ॥ २२ ॥
अरुन्धती वा सुभगा वसिष्ठं
लोपामुद्रा वा यथा ह्यगस्त्यम् ।
नलस्य वै दमयन्ती यथाभूद्
यथा शची वज्रधरस्य चैव ॥ २३ ॥
अथवा जैसे सौभाग्यशालिनी अरुन्धती वसिष्ठजीकी, लोपामुद्रा अगस्त्यजीकी,
दमयन्ती नलकी तथा शची वज्रधारी इन्द्रकी सेवा करती है ॥ २३ ॥
नारायणी चेन्द्रसेना बभूव
वश्या नित्यं मुद्गलस्याजमीढ ।
(यथा सीता दाशरथेर्महात्मनो
यथा तव द्रौपदी पाण्डुपुत्र ।)
तथा शान्ता ऋष्यशृङ्गं वनस्थं
प्रीत्या युक्ता पर्यचरन्नरेन्द्र ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर! जैसे नारायणी इन्द्रसेना सदा महर्षि मुद्गलके अधीन रहती थी तथा
पाण्डुनन्दन! जैसे सीता महात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अधीन रही हैं और द्रौपदी सदा
तुम्हारे वशमें रहती आयी है, उसी प्रकार शान्ता भी सदा अधीन रहकर वनवासी
ऋष्यशृंगकी प्रसन्नतापूर्वक सेवा करती थी ॥ २४ ॥
तस्याश्रमः पुण्य एषोऽवभाति
महाह्रदं शोभयन् पुण्यकीर्तिः ।
अत्र स्नातः कृतकृत्यो विशुद्ध-
स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंयाहि राजन् ॥ २५ ॥
उनका यह पुण्यमय आश्रम, जो पवित्र कीर्तिसे युक्त है, इस महान् कुण्डकी शोभा बढ़ाता हुआ प्रकाशित हो रहा है, राजन्! यहाँ स्नान करके शुद्ध एवं कृतकृत्य होकर अन्य तीर्थोंकी यात्रा करो ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृङ्गोपाख्या०नविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका आधा श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं)