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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 796, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 796

तस्याश्रमः पुण्य एषोऽवभाति
महाह्रदं शोभयन् पुण्यकीर्तिः ।
अत्र स्नातः कृतकृत्यो विशुद्ध-
स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंयाहि राजन् ॥ २५ ॥
उनका यह पुण्यमय आश्रम, जो पवित्र कीर्तिसे युक्त है, इस महान् कुण्डकी शोभा बढ़ाता हुआ प्रकाशित हो रहा है, राजन्! यहाँ स्नान करके शुद्ध एवं कृतकृत्य होकर अन्य तीर्थोंकी यात्रा करो ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृङ्गोपाख्या०नविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका आधा श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं)